श्रीमन्नारायणाष्टाक्षरी स्तुति
ॐ नमः प्रणवार्थार्थ स्थूल सूक्ष्म क्षराक्षर |
व्यक्ताव्यक्त कळातीत ओंकाराय नमो नमः || 1 ||
नमो देवादिदेवाय देहसंचारहेतवे |
दैत्यसंघविनाशाय नकाराय नमो नमः || 2 ||
मोहनं विश्वरूपं च शिष्टाचारसुपोषितं |
मोहविध्वंसकं वंदे मोकाराय नमो नमः || 3 ||
नारायणाय नव्याय नरसिंहाय नामिने |
नादाय नादिने तुभ्यं नाकाराय नमो नमः || 4 ||
रामचंद्रं रघुपतिं पित्राज्ञापरिपालकं |
कौसल्यातनयं वंदे राकाराय नमो नमः || 5 ||
यज्ञाय यज्ञगम्याय यज्ञरक्षाकराय च |
यज्ञांगरूपिणे तुभ्यं यकाराय नमो नमः || 6 ||
णाकारं लोकविख्यातं नानाजन्मफलप्रदं |
नानाभीष्टप्रदं वंदे णाकाराय नमो नमः || 7 ||
यज्ञकर्त्रे यज्ञभर्त्रे यज्ञरूपाय ते नमः |
सुज्ञानगोचरायाऽस्तु यकाराय नमो नमः || 8 ||
नारायणः परं ब्रह्म नारायणः परंतपः |
नारायणः परो देवः सर्वं नारायणः सदा ||
इति श्री नारायण अष्टाक्षरी स्तुतिः |
अर्थ
श्रीमन्नारायणाष्टाक्षरी स्तुति 'ॐ नमो नारायणाय' नामक अष्टाक्षर मंत्र के प्रत्येक अक्षर को भक्तिपूर्वक नमन करने वाली एक महान स्तुति है। यह मंत्र सृष्टि, स्थिति और लय के रहस्यों को, नारायण के परब्रह्म स्वरूप को और शरणागति के तत्व को प्रकट करता है। यह भगवान के अनंत गुणों का स्मरण करने और उनकी कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत शक्तिशाली मार्ग है।
पहला श्लोक प्रणवार्थ की स्तुति से आरंभ होता है। 'ॐ' स्थूल-सूक्ष्म, क्षर-अक्षर, व्यक्त-अव्यक्त से परे परब्रह्म स्वरूप है। यह समस्त जगत का आदि नाद, आदि चैतन्य है। ओंकार समस्त सृष्टि का मूल है और भगवान का साक्षात् स्वरूप है। इसके बाद 'न'कार देवादिदेव को नमन करता है। वे शरीरों में जीवशक्ति रखने का मूल कारण हैं; दैत्यगणों के अहंकार को नष्ट करने वाली शक्ति हैं।
'म'कार विश्वरूप नारायण की महिमा गाता है। वे मोह उत्पन्न करने वाले और मोह का नाश करने वाले, दोनों द्वंद्व स्वरूपों में विद्यमान हैं। शिष्टाचार का पोषण करने वाले धर्मरूप भी वही हैं। 'ना'कार नारायण, नरसिंह और नादस्वरूप भगवान की प्रशंसा करता है। वे ही नादबिंदु, नादकला, और सर्वप्रपंच के आधारभूत शक्ति हैं।
'रा'कार रामचंद्र, रघुपति, पितृ आज्ञा का महानता से पालन करने वाले धर्मपति, और कौसल्यानंदन की स्तुति करता है। भगवान राम परम धर्म के प्रतीक हैं। 'य'कार यज्ञस्वरूप, यज्ञ के गंतव्य, और यज्ञ की रक्षा करने वाले भगवान को दर्शाता है। वे समस्त दैवी कर्मों के मूलरूप यज्ञ के अंगमूर्ति हैं।
'णा'कार लोक में विख्यात अक्षर के रूप में प्रशंसित है; यह अनेक जन्मों के फल प्रदान करने वाला; भक्त की इच्छाओं को पूरा करने वाला वरदायक स्वरूप है। अंतिम 'य'कार यज्ञकर्ता, यज्ञभर्ता, और यज्ञरूप नारायण को नमन करता है। वे परमज्ञान से ग्रहण करने योग्य आध्यात्मिकता प्रदान करने वाले देव हैं।
अंत में महावाक्य - 'नारायण परब्रह्म हैं, नारायण परंतप हैं, नारायण परमदेव हैं, सर्वं नारायण ही हैं सदा' - अष्टाक्षर मंत्र के तत्व को पूर्णतः प्रकट करता है। यह भगवान की सर्वोच्चता और सर्वव्यापकता को उद्घोषित करता है, जिससे भक्त को यह बोध होता है कि सब कुछ नारायणमय है।
लाभ (Benefits):
- अष्टाक्षर मंत्र की शक्ति की प्राप्ति: इस स्तुति के निरंतर पाठ से 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र की पूर्ण शक्ति और आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होता है। यह मंत्र के गूढ़ अर्थ को समझने में सहायक है।
- मोह, अज्ञान और पापों का नाश: नारायण की महिमा का स्मरण करने से मन का मोह, अज्ञान और संचित पाप नष्ट होते हैं, जिससे आध्यात्मिक शुद्धि मिलती है। यह मन को निर्मल बनाता है।
- मनःशांति और भक्ति में वृद्धि: भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति का भाव विकसित होता है, जिससे मन को शांति, धैर्य, गहरी भक्ति और आत्मबल प्राप्त होता है। यह आंतरिक स्थिरता प्रदान करता है।
- करुणा और धर्मबल की प्राप्ति: भगवान की करुणा के पात्र बनकर धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यह धर्मनिष्ठ जीवन के लिए प्रेरणा देता है।
- आध्यात्मिक उत्थान: अंततः, यह स्तुति भक्तों को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करती है और परमात्मा में लीन होने की परम आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करती है। यह आत्म-साक्षात्कार में सहायक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्रीमन्नारायणाष्टाक्षरी स्तुति क्या है?
इस स्तुति का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तुति का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तुति का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तुति का मूल स्रोत क्या है?
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