श्री लक्ष्मी हयग्रीव पंचरत्नं
ज्ञानानंदामलात्मा कलिकलुषमहातूलवातूलनामा
सीमातीतात्मभूमा मम हयवदना देवता धावितारिः |
याता श्वेताब्जमध्यं प्रविमलकमल स्रग्धरा दुग्धराशिः
स्मेरा सा राजराजप्रभृति नुतिपदं संपदं संविधत्तां || 1 ||
तारा ताराधिनाथस्फटिकमणिसुधा हीरहाराभिरामा
रामा रत्नाब्धिकन्याकुचलिकुच परीरंभसंरंभधन्या |
मान्याऽनन्यार्हदास्यप्रणततति परित्राणसत्रात्तदीक्षा
दक्षा साक्षात्कृतैषा सपदि हयमुखो देवता साऽवतान्नः || 2 ||
अंतर्ध्वांतस्य कल्यं निगमहृदसुरध्वंसनैकांतकल्यं
कल्याणानां गुणानां जलधिमभिनमद्बांधवं सैंधवास्यं |
शुभ्रांशु भ्राजमानं दधतमरिदरौ पुस्तकं हस्तकंजैः
भद्रां व्याख्यानमुद्रामपि हृदि शरणं याम्युदारं सदारं || 3 ||
वंदे तं देवमाद्यं नमदमरमहारत्नकोटीरकोटी-
-वाटीनिर्यत्ननिर्यद्घृणिगणमसृणीभूत पादांशुजातं |
श्रीमद्रामानुजार्यश्रुतिशिखरगुरु ब्रह्मतंत्रस्वतंत्रैः
पूज्यं प्राज्यं सभाज्यं कलिरिपुगुरुभिः शश्वदश्वोत्तमांगं || 4 ||
विद्या हृद्याऽनवद्या यदनघ करुणासारसारप्रसारात्
धीराधाराधरायामजनि जनिमतां तापनिर्वापयित्री |
श्रीकृष्णब्रह्मतंत्रादिमपदकलिजित् संयमींद्रार्चितं तत्
श्रीमद्धामातिभूम प्रथयतु कुशलं श्रीहयग्रीवनाम || 5 ||
इति श्री लक्ष्मी हयग्रीव पंचरत्नं |
अर्थ
श्री लक्ष्मी हयग्रीव पंचरत्नं, महान आचार्य श्री वेदान्त देशिक द्वारा रचित पाँच अनमोल श्लोकों का एक संग्रह है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के हयग्रीव स्वरूप और महालक्ष्मी देवी के संयुक्त दिव्य रूप की महिमा का वर्णन करता है। यह दिव्य रूप मन को ज्ञान, धन, करुणा, शुभता और समृद्धि प्रदान करने की शक्ति रखता है। यह पंचरत्न पूरी तरह से ज्ञान, दया, प्रकाश और कल्याणकारी गुणों का गायन है, जो कलियुग के दोषों को दूर कर भक्तों को आध्यात्मिक उत्थान प्रदान करता है।
पहले श्लोक में, भगवान हयग्रीव को ज्ञान और आनंद के शुद्ध स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है, जो कलियुग के पापों और अज्ञानता को दूर करने की महान शक्ति रखते हैं। महालक्ष्मी देवी क्षीरसागर से उत्पन्न हुई हैं, जो कमल की सुगंध से परिपूर्ण एक सुंदर रूप में श्वेतपद्म पर विराजमान हैं। उन्हें राज-महाराजाओं द्वारा भी पूजित समृद्धि और शुभता प्रदान करने वाली देवी के रूप में स्तुति की जाती है।
दूसरे श्लोक में, श्री देवी की महिमा का गुणगान किया गया है। वे स्फटिक मणि के समान पवित्र हैं, रत्नाभूषणों से सुशोभित हैं, वेदों का स्वरूप हैं और भगवान रामचन्द्र की प्रियतमा हैं। रत्नसागर की कन्या के रूप में, वे हयग्रीव के साथ एकात्मकता में हैं और भक्तों की रक्षा के लिए दिव्य दीक्षा के साथ खड़ी हैं। भक्तों की शरणागति को स्वीकार करने वाली करुणा की मूर्ति, वे ज्ञान और समृद्धि के मिलन का प्रतिनिधित्व करती हैं।
तीसरे श्लोक में, हयग्रीव को वेदमय, अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाला परम ज्योति बताया गया है। उनके हाथों में पुस्तक और व्याख्यान मुद्रा होने के कारण, वे भक्तों के हृदय में विद्या, बोध, विवेक और सत्य ज्ञान को स्थापित करते हैं। चौथा श्लोक करोड़ों रत्नजड़ित मुकुटों से सुशोभित देवताओं द्वारा पूजे जाने वाले महिमामयी स्वरूप का वर्णन करता है। उन्हें वेदान्त गुरुओं, शास्त्र तपस्वियों और श्री रामानुजाचार्य जैसे महान गुरुओं द्वारा भी आराध्य बताया गया है, जो उन्हें ज्ञान का परम स्रोत मानते हैं। उनका स्वरूप कलियुग का संहार करने वाली महाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है।
पाँचवें श्लोक में, यह उद्घोषणा की गई है कि श्री लक्ष्मी हयग्रीव का दिव्य नाम विद्या को प्रिय बनाता है, अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान की ज्योति फैलाता है। यह शांति, धैर्य और परिपक्वता प्रदान करने वाला एक महिमामयी स्तोत्र है। यह पंचरत्नं पूर्ण ज्ञान, भक्ति, शांति, ऐश्वर्य और दिव्य अनुग्रह प्रदान करने वाला अत्यंत पावन स्तोत्र है।
लाभ (Benefits):
- ज्ञान और विवेक में वृद्धि: इस स्तोत्र का पाठ करने से ज्ञान, बुद्धि, विवेक और वाक्पटुता बढ़ती है, विशेष रूप से छात्रों को उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त होते हैं।
- शिक्षा में सफलता: शैक्षणिक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने, बेहतर ग्रहण शक्ति और स्मरण शक्ति पाने में यह सहायक है। परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त करने में मदद करता है।
- अज्ञान और बाधाओं का निवारण: मन के अज्ञान, माया, मानसिक क्लेशों और बाधाओं को दूर करके स्पष्ट सोच का मार्ग प्रशस्त करता है।
- धन और समृद्धि: महालक्ष्मी की कृपा से आर्थिक स्थिति सुधरती है, धन, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। दया और करुणा के गुण बढ़ते हैं।
- सुरक्षा और स्थिरता: भक्तों को सुरक्षा, चित्तशुद्धि, धैर्य और जीवन में स्थिरता प्रदान करता है। आध्यात्मिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री लक्ष्मी हयग्रीव पंचरत्नं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री लक्ष्मी हयग्रीव पंचरत्नं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या इसके रचयिता कौन हैं?
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