श्री कमलापत्यष्टकं
भुजगतल्पगतं घनसुंदरं
गरुडवाहनमंबुजलोचनं |
नळिनचक्रगदाकरमव्ययं
भजत रे मनुजाः कमलापतिं || 1 ||
अलिकुलासितकोमलकुंतलं
विमलपीतदुकूलमनोहरं |
जलधिजाश्रितवामकलेवरं
भजत रे मनुजाः कमलापतिं || 2 ||
किमु जपैश्च तपोभिरुताध्वरै-
-रपि किमुत्तमतीर्थनिषेवणैः |
किमुत शास्त्रकदंबविलोकनै-
-र्भजत रे मनुजाः कमलापतिं || 3 ||
मनुजदेहमिमं भुवि दुर्लभं
समधिगम्य सुरैरपि वांछितं |
विषयलंपटतामपहाय वै
भजत रे मनुजाः कमलापतिं || 4 ||
न वनिता न सुतो न सहोदरो
न हि पिता जननी न च बांधवाः |
व्रजति साकमनेन जनेन वै
भजत रे मनुजाः कमलापतिं || 5 ||
सकलमेव चलं सचराचरं
जगदिदं सुतरां धनयौवनं |
समवलोक्य विवेकदृशा द्रुतं
भजत रे मनुजाः कमलापतिं || 6 ||
विविधरोगयुतं क्षणभंगुरं
परवशं नवमार्गमलाकुलं |
परिनिरीक्ष्य शरीरमिदं स्वकं
भजत रे मनुजाः कमलापतिं || 7 ||
मुनिवरैरनिशं हृदि भावितं
शिवविरिंचिमहेंद्रनुतं सदा |
मरणजन्मजराभयमोचनं
भजत रे मनुजाः कमलापतिं || 8 ||
हरिपदाष्टकमेतदनुत्तमं
परमहंसजनेन समीरितं |
पठति यस्तु समाहितचेतसा
व्रजति विष्णुपदं स नरो ध्रुवं || 9 ||
इति श्रीमत्परमहंस स्वामि ब्रह्मानंद विरचितं श्री कमलापत्यष्टकं ||
अर्थ
श्री कमलापत्यष्टकं भगवान श्रीहरि की महिमा का सुंदर वर्णन करता है, मनुष्य के जीवन की क्षणभंगुरता को याद दिलाता है और यह सिखाता है कि कमलापति (लक्ष्मीपति) के चरणों की सेवा में ही शाश्वत शांति निहित है। पहला श्लोक ही यह बताता है कि गरुड़ पर विराजमान, सर्प-शय्या पर शयन करने वाले, कमल-नेत्रों वाले, चक्र-शंख-गदा धारण करने वाले नारायण का मन से भजन करना चाहिए। देवताओं को भी दुर्लभ वह रूप यदि मन में बस जाए, तो भक्ति की नींव मजबूत होती है। यह स्तोत्र भगवान के दिव्य सौंदर्य और गुणों की प्रशंसा करते हुए, सांसारिक मोह-माया से दूर रहकर मोक्ष के मार्ग का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करता है।
निर्मल पीतांबर से सुशोभित, कोमल केशों वाले, और लक्ष्मी देवी को अपने वाम भाग में धारण किए हुए श्रीहरि का सौंदर्य मन को परमानंदित करता है। उनका स्मरण ही समस्त तपस्याओं, यज्ञों, तीर्थयात्राओं और शास्त्र-अध्ययन से भी श्रेष्ठ है। क्योंकि हरि का नाम और हरि का ध्यान मनुष्य को सीधे मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है। इस अष्टक का मुख्य संदेश यह है कि भगवान के नाम का स्मरण किसी भी कर्मकांड से अधिक फलदायी है और सीधे आध्यात्मिक उत्थान की ओर ले जाता है।
मनुष्य का जन्म अत्यंत दुर्लभ है; देवता भी इस जन्म की कामना करते हैं। ऐसा अनमोल शरीर प्राप्त होने पर, इंद्रिय-भोगों में न फंसकर, कमलापति का भजन करना श्रेयस्कर है। धन, यौवन, संबंधी – कोई भी हमारे साथ नहीं जाता; मृत्यु के समय एकमात्र परमेश्वर ही शरण देने वाले हैं। यह अष्टक इस सत्य को उजागर करता है कि इस संसार में हम जो कुछ भी प्राप्त करते हैं, वह सब अस्थायी है और संबंध भी क्षणिक हैं।
सृष्टि की हर वस्तु चंचल है; क्षणिक होने के साथ-साथ शरीर भी रोगों से भरा है, और कमजोर पड़ने वाला है। ऐसे अस्थिर शरीर को देखकर, मन को शीघ्र ही कमलापति के चरणों में पहुंच जाना चाहिए। उनका ध्यान मुनि और देवता निरंतर करते हैं। जन्म-मृत्यु-जरा के भय से मुक्ति देने वाले वे ही हैं। ऐसे देव-स्वरूप हरि के पाद-अष्टक का श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाले को विष्णुलोक की प्राप्ति निश्चित है।
लाभ (Benefits):
- पाप-क्षय और मानसिक शांति: इस अष्टक के पाठ से समस्त पापों का नाश होता है और मन को गहरी शांति तथा संतोष प्राप्त होता है।
- भक्ति और सद्बुद्धि में वृद्धि: कमलापति के प्रति भक्ति, ध्यान और सही-गलत का विवेक बढ़ता है, जिससे आध्यात्मिक मार्ग स्पष्ट होता है।
- आध्यात्मिक चेतना का विकास: शारीरिक और मानसिक बल में वृद्धि होती है, जिससे आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है और आत्मिक उन्नति होती है।
- भय-मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति: जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था के भय से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
- समस्त सौभाग्य की प्राप्ति: भगवान के आशीर्वाद से जीवन में सभी प्रकार के सौभाग्य प्राप्त होते हैं और सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री कमलापत्यष्टकं क्या है?
श्री कमलापत्यष्टकं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री कमलापत्यष्टकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
श्री कमलापत्यष्टकं का पाठ कौन कर सकता है?
श्री कमलापत्यष्टकं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री कमलापत्यष्टकं का उद्गम या रचयिता कौन हैं?
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