क

श्री कमला स्तोत्रं 2

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री कमला स्तोत्रं 2

श्रीशंकर उवाच |
अथातः संप्रवक्ष्यामि लक्ष्मीस्तोत्रमनुत्तमं |
पठनाच्छ्रवणाद्यस्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् || 1 ||

गुह्याद्गुह्यतरं पुण्यं सर्वदेवनमस्कृतं |
सर्वमंत्रमयं साक्षाच्छृणु पर्वतनंदिनि || 2 ||

अनंतरूपिणी लक्ष्मीरपारगुणसागरी |
अणिमादिसिद्धिदात्री शिरसा प्रणमाम्यहं || 3 ||

आपदुद्धारिणी त्वं हि आद्या शक्तिः शुभा परा |
आद्या आनंददात्री च शिरसा प्रणमाम्यहं || 4 ||

इंदुमुखी इष्टदात्री इष्टमंत्रस्वरूपिणी |
इच्छामयी जगन्मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 5 ||

उमा उमापतेस्त्वंतु ह्युत्कंठाकुलनाशिनी |
उर्वीश्वरी जगन्मातर्लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 6 ||

ऐरावतपतिपूज्या ऐश्वर्याणां प्रदायिनी |
औदार्यगुणसंपन्ना लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 7 ||

कृष्णवक्षःस्थिता देवि कलिकल्मषनाशिनी |
कृष्णचित्तहरा कर्त्री शिरसा प्रणमाम्यहं || 8 ||

कंदर्पदमना देवि कल्याणी कमलानना |
करुणार्णवसंपूर्णा शिरसा प्रणमाम्यहं || 9 ||

खंजनाक्षी खगनासा देवि खेदविनाशिनी |
खंजरीटगतिश्चैव शिरसा प्रणमाम्यहं || 10 ||

गोविंदवल्लभा देवी गंधर्वकुलपावनी |
गोलोकवासिनी मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 11 ||

ज्ञानदा गुणदा देवि गुणाध्यक्षा गुणाकरी |
गंधपुष्पधरा मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 12 ||

घनश्यामप्रिया देवि घोरसंसारतारिणी |
घोरपापहरा चैव शिरसा प्रणमाम्यहं || 13 ||

चतुर्वेदमयी चिंत्या चित्तचैतन्यदायिनी |
चतुराननपूज्या च शिरसा प्रणमाम्यहं || 14 ||

चैतन्यरूपिणी देवि चंद्रकोटिसमप्रभा |
चंद्रार्कनखरज्योतिर्लक्ष्मि देवि नमाम्यहं || 15 ||

चपला चतुराध्यक्षी चरमे गतिदायिनी |
चराचरेश्वरी लक्ष्मि शिरसा प्रणमाम्यहं || 16 ||

छत्रचामरयुक्ता च छलचातुर्यनाशिनी |
छिद्रौघहारिणी मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 17 ||

जगन्माता जगत्कर्त्री जगदाधाररूपिणी |
जयप्रदा जानकी च शिरसा प्रणमाम्यहं || 18 ||

जानकीशप्रिया त्वं हि जनकोत्सवदायिनी |
जीवात्मनां च त्वं मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 19 ||

झिंजीरवस्वना देवि झंझावातनिवारिणी |
झर्झरप्रियवाद्या च शिरसा प्रणमाम्यहं || 20 ||

टंककदायिनी त्वं हि त्वं च ठक्काररूपिणी | [अर्थप्रदायिनीं]
ढक्कादिवाद्यप्रणया डंफवाद्यविनोदिनी |
डमरुप्रणया मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 21 ||

तप्तकांचनवर्णाभा त्रैलोक्यलोकतारिणी |
त्रिलोकजननी लक्ष्मि शिरसा प्रणमाम्यहं || 22 ||

त्रैलोक्यसुंदरी त्वं हि तापत्रयनिवारिणी |
त्रिगुणधारिणी मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 23 ||

त्रैलोक्यमंगळा त्वं हि तीर्थमूलपदद्वया |
त्रिकालज्ञा त्राणकर्त्री शिरसा प्रणमाम्यहं || 24 ||

दुर्गतिनाशिनी त्वं हि दारिद्र्यापद्विनाशिनी |
द्वारकावासिनी मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 25 ||

देवतानां दुराराध्या दुःखशोकविनाशिनी |
दिव्याभरणभूषांगी शिरसा प्रणमाम्यहं || 26 ||

दामोदरप्रिया त्वं हि दिव्ययोगप्रदर्शिनी |
दयामयी दयाध्यक्षी शिरसा प्रणमाम्यहं || 27 ||

ध्यानातीता धराध्यक्षा धनधान्यप्रदायिनी |
धर्मदा धैर्यदा मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 28 ||

नवगोरोचना गौरी नंदनंदनगेहिनी |
नवयौवनचार्वंगी शिरसा प्रणमाम्यहं || 29 ||

नानारत्नादिभूषाढ्या नानारत्नप्रदायिनी |
नितंबिनी नलिनाक्षी लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 30 ||

निधुवनप्रेमानंदा निराश्रयगतिप्रदा |
निर्विकारा नित्यरूपा लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 31 ||

पूर्णानंदमयी त्वं हि पूर्णब्रह्मसनातनी |
पराशक्तिः पराभक्तिर्लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 32 ||

पूर्णचंद्रमुखी त्वं हि परानंदप्रदायिनी |
परमार्थप्रदा लक्ष्मि शिरसा प्रणमाम्यहं || 33 ||

पुंडरीकाक्षिणी त्वं हि पुंडरीकाक्षगेहिनी |
पद्मरागधरा त्वं हि शिरसा प्रणमाम्यहं || 34 ||

पद्मा पद्मासना त्वं हि पद्ममालाविधारिणी |
प्रणवरूपिणी मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 35 ||

फुल्लेंदुवदना त्वं हि फणिवेणि विमोहिनी |
फणिशायिप्रिया मातः शिरसा प्रणमाम्यहं || 36 ||

विश्वकर्त्री विश्वभर्त्री विश्वत्रात्री विश्वेश्वरी |
विश्वाराध्या विश्वबाह्या लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 37 ||

विष्णुप्रिया विष्णुशक्तिर्बीजमंत्रस्वरूपिणी |
वरदा वाक्यसिद्धा च शिरसा प्रणमाम्यहं || 38 ||

वेणुवाद्यप्रिया त्वं हि वंशीवाद्यविनोदिनी |
विद्युद्गौरी महादेवि लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 39 ||

भुक्तिमुक्तिप्रदा त्वं हि भक्तानुग्रहकारिणी |
भवार्णवत्राणकर्त्री लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 40 ||

भक्तप्रिया भागीरथी भक्तमंगळदायिनी |
भयदाऽभयदात्री च लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 41 ||

मनोऽभीष्टप्रदा त्वं हि महामोहविनाशिनी |
मोक्षदा मानदात्री च लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 42 ||

महाधन्या महामान्या माधवमनमोहिनी |
मुखराप्राणहंत्री च लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 43 ||

यौवनपूर्णसौंदर्या योगमाया योगेश्वरी |
युग्मश्रीफलवृक्षा च लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 44 ||

युग्मांगदविभूषाढ्या युवतीनां शिरोमणिः |
यशोदासुतपत्नी च लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 45 ||

रूपयौवनसंपन्ना रत्नालंकारधारिणी |
राकेंदुकोटिसौंदर्या लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 46 ||

रमा रामा रामपत्नी राजराजेश्वरी तथा |
राज्यदा राज्यहंत्री च लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 47 ||

लीलालावण्यसंपन्ना लोकानुग्रहकारिणी |
ललना प्रीतिदात्री च लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 48 ||

विद्याधरी तथा विद्या वसुदा त्वं हि वंदिता |
विंध्याचलवासिनी च लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 49 ||

शुभ्रकांचनगौरांगी शंखकंकणधारिणी |
शुभदा शीलसंपन्ना लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 50 ||

षट्चक्रभेदिनी त्वं हि षडैश्वर्यप्रदायिनी |
षोडशी वयसा त्वं हि लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 51 ||

सदानंदमयी त्वं हि सर्वसंपत्तिदायिनी |
संसारतारिणी देवि शिरसा प्रणमाम्यहं || 52 ||

सुकेशी सुखदा देवि सुंदरी सुमनोरमा |
सुरेश्वरी सिद्धिदात्री शिरसा प्रणमाम्यहं || 53 ||

सर्वसंकटहंत्री त्वं सत्यसत्त्वगुणान्विता |
सीतापतिप्रिया देवि शिरसा प्रणमाम्यहं || 54 ||

हेमांगिनी हास्यमुखी हरिचित्तविमोहिनी |
हरिपादप्रिया देवि शिरसा प्रणमाम्यहं || 55 ||

क्षेमंकरी क्षमादात्री क्षौमवासविधारिणी |
क्षीणमध्या च क्षेत्रांगी लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते || 56 ||

श्रीशंकर उवाच |
अकारादि क्षकारांतं लक्ष्मीदेव्याः स्तवं शुभं |
पठितव्यं प्रयत्नेन त्रिसंध्यं च दिने दिने || 57 ||

पूजनीया प्रयत्नेन कमला करुणामयी |
वांछाकल्पलता साक्षाद्भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी || 58 ||

इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु शृणुयाच्छ्रावयेदपि |
इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्य सत्यं सत्यं हि पार्वति || 59 ||

इदं स्तोत्रं महापुण्यं यः पठेद्भक्तिसंयुतः |
तं च दृष्ट्वा भवेन्मूको वादी सत्यं न संशयः || 60 ||

शृणुयाच्छ्रावयेद्यस्तु पठेद्वा पाठयेदपि |
राजानो वशमायांति तं दृष्ट्वा गिरिनंदिनि || 61 ||

तं दृष्ट्वा दुष्टसंघाश्च पलायंते दिशो दश |
भूतप्रेतग्रहा यक्षा राक्षसाः पन्नगादयः |
विद्रवंति भयार्ता वै स्तोत्रस्यापि च कीर्तनात् || 62 ||

सुराश्च असुराश्चैव गंधर्वाः किन्नरादयः |
प्रणमंति सदा भक्त्या तं दृष्ट्वा पाठकं मुदा || 63 ||

धनार्थी लभते चार्थं पुत्रार्थी च सुतं लभेत् |
राज्यार्थी लभते राज्यं स्तवराजस्य कीर्तनात् || 64 ||

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वंगनागमः |
महापापोपपापं च तरंति स्तवकीर्तनात् || 65 ||

गद्यपद्यमयी वाणी मुखात्तस्य प्रजायते |
अष्टसिद्धिमवाप्नोति लक्ष्मीस्तोत्रस्य कीर्तनात् || 66 ||

वंध्या चापि लभेत् पुत्रं गर्भिणी प्रसवेत्सुतं |
पठनात् स्मरणात् सत्यं वच्मि ते गिरिनंदिनि || 67 ||

भूर्जपत्रे समालिख्य रोचनाकुंकुमेन तु |
भक्त्या संपूजयेद्यस्तु गंधपुष्पाक्षतैस्तथा || 68 ||

धारयेद्दक्षिणे बाहौ पुरुषः सिद्धिकांक्षया |
योषिद्वामभुजे धृत्वा सर्वसौख्यमयी भवेत् || 69 ||

विषं निर्विषतां याति अग्निर्याति च शीततां |
शत्रवो मित्रतां यांति स्तवस्यास्य प्रसादतः || 70 ||

बहुना किमिहोक्तेन स्तवस्यास्य प्रसादतः |
वैकुंठे च वसेन्नित्यं सत्यं वच्मि सुरेश्वरि || 71 ||

इति रुद्रयामले शिवगौरीसंवादे अकारादिक्षकारांतवर्णग्रथितं श्री कमला स्तवः |

अर्थ

श्री कमला स्तोत्रं 2, देवी महालक्ष्मी, जिन्हें कमला के नाम से भी जाना जाता है, की स्तुति में एक अत्यंत शक्तिशाली और गहन स्तोत्र है। आदि शंकराचार्य द्वारा उपदिष्ट माना जाने वाला यह स्तोत्र, देवी के सार्वभौमिक, उद्धारकर्ता और संरक्षक स्वरूप का वर्णन करता है, जो भक्तों को मोक्ष और समृद्धि प्रदान करती हैं। इस स्तोत्र का पाठ केवल भौतिक लाभ ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान भी प्रदान करता है, जिससे भक्त अज्ञान और दुखों से मुक्त होते हैं।

यह स्तोत्र देवी कमला को केवल धन की देवी के रूप में ही नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के मूल, आदि शक्ति और परब्रह्म के रूप में भी चित्रित करता है। उन्हें ॐकार स्वरूपिणी, सर्वमंत्रमयी और अनंत गुणों का सागर बताया गया है। वे अणिमादि अष्ट सिद्धियाँ प्रदान करने वाली, आपदाओं को हरने वाली, आनंद देने वाली और इच्छाओं को पूर्ण करने वाली हैं। उन्हें जगन्माता और सभी जीवों की पोषक कहा गया है। उनके स्मरण से भक्त सभी बंधनों से मुक्त हो जाते हैं और कल्याण, धन, वाक् सिद्धि, विद्या, सामर्थ्य तथा योग सुख प्राप्त करते हैं।

स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक देवी कमला के विभिन्न रूपों और गुणों का महिमामंडन करता है। उदाहरण के लिए, उन्हें "अनंतरूपिणी" कहा गया है, जिसका अर्थ है अनंत रूपों वाली। "आपदुद्धारिणी" का अर्थ है संकटों से उद्धार करने वाली, "इन्दुमुखी" का अर्थ है चंद्रमा के समान मुख वाली, और "इष्टदात्री" का अर्थ है इच्छाओं को पूर्ण करने वाली। "उमा" और "ऐश्वर्याणां प्रदायिनी" के संबोधन से, शिव की पत्नी पार्वती के रूप में और सभी ऐश्वर्यों की दात्री के रूप में उनकी महिमा को उजागर किया गया है। "कृष्णवक्षःस्थिता" विष्णु के हृदय में निवास करने वाले उनके रूप को इंगित करता है, जो सभी पापों को नष्ट करने और भक्तों के चित्त को आकर्षित करने की शक्ति को दर्शाता है। "कल्याणी" और "करुणार्णवसंपूर्णा" शब्द उनके शुभ स्वरूप और अपार करुणा को दर्शाते हैं।

इस स्तोत्र का भक्ति और श्रद्धा से पाठ करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। कहा जाता है कि भोजपत्र पर रोचना या कुमकुम से लिखकर, इसे पुरुष अपने दाहिने हाथ पर और स्त्रियाँ अपने बाएँ हाथ पर धारण कर सकती हैं, जिससे यह कवच की तरह सुरक्षा प्रदान करता है। प्रतिदिन तीनों संध्याकालों (सुबह, दोपहर, शाम) में इसका पाठ करने से देवी की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से ज्वर का भय दूर होता है, शत्रु मित्र बन जाते हैं, विष का प्रभाव निष्क्रिय हो जाता है और वैकुंठ प्राप्त करने का पुण्य मिलता है। यह रोगों से मुक्ति, शत्रुओं का शमन, धन-संपत्ति और आध्यात्मिक मुक्ति प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • समृद्धि और ऐश्वर्य: भौतिक धन, ऐश्वर्य, धन लाभ और जीवन में समग्र समृद्धि प्राप्त होती है।
  • वाक् सिद्धि और ज्ञान: वाणी में प्रवीणता, कलात्मक क्षमता, विद्या और बुद्धि का विकास होता है।
  • संतान लाभ और पारिवारिक सुख: संतानहीन दंपत्तियों को संतान प्राप्ति होती है, साथ ही पारिवारिक शांति और आनंद प्राप्त होता है।
  • स्वास्थ्य और सुरक्षा: रोगों से मुक्ति, ज्वर का भय नाश, विष के प्रभावों का निष्क्रिय होना और शत्रु बाधा से सुरक्षा मिलती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष: मानसिक शांति, मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, आध्यात्मिक प्रगति और योग सुखों की प्राप्ति होती है। अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति भी संभव है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री कमला स्तोत्रं 2 क्या है?
यह देवी महालक्ष्मी (कमला) की स्तुति में एक शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा उपदिष्ट माना जाता है। यह देवी के सार्वभौमिक, संरक्षक और मोक्षदायक स्वरूप का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन तीनों संध्याकालों (सुबह, दोपहर, शाम) में भक्ति और श्रद्धा से करना चाहिए। भोजपत्र पर रोचना या कुमकुम से लिखकर धारण करने से सुरक्षा मिलती है।
श्री कमला स्तोत्रं 2 के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इसके पाठ से धन, ऐश्वर्य, वाक् सिद्धि, संतान लाभ, रोगों से मुक्ति, शत्रु शमन और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
धन, ज्ञान, संतान, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक शांति की इच्छा रखने वाला कोई भी भक्त, बिना किसी लिंग भेद के, इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
इस स्toत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
पूर्ण फल प्राप्ति के लिए, प्रतिदिन तीनों संध्याकालों (सुबह, दोपहर, शाम) में कम से कम एक बार पाठ करना उचित है। अपनी सुविधानुसार अधिक बार भी पाठ किया जा सकता है।
श्री कमला स्तोत्रं 2 का उद्गम क्या है?
यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा अपने शिष्यों को उपदिष्ट माना जाता है। यह महालक्ष्मी के विभिन्न रूपों और गुणों का विस्तृत वर्णन करता है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...