श्री कमला सहस्रनाम स्तोत्रं
तामाह्वयामि सुभगां लक्ष्मीं त्रैलोक्यपूजितां |
एह्येहि देवि पद्माक्षि पद्माकरकृतालये || 1 ||
आगच्छागच्छ वरदे पश्य मां स्वेन चक्षुषा |
आयाह्यायाहि धर्मार्थकाममोक्षमये शुभे || 2 ||
एवं विधैः स्तुतिपदैः सत्यैः सत्यार्थसंस्तुता |
कनीयसी महाभागा चंद्रेण परमात्मना || 3 ||
निशाकरश्च सा देवी भ्रातरौ द्वौ पयोनिधेः |
उत्पन्नमात्रौ तावास्तां शिवकेशवसंश्रितौ || 4 ||
सनत्कुमारस्तमृषिं समाभाष्य पुरातनं |
प्रोक्तवानितिहासं तु लक्ष्म्याः स्तोत्रमनुत्तमं || 5 ||
अथेदृशान्महाघोराद्दारिद्र्यान्नरकात्कथं |
मुक्तिर्भवति लोकेऽस्मिन् दारिद्र्यं याति भस्मतां || 6 ||
सनत्कुमार उवाच |
पूर्वं कृतयुगे ब्रह्मा भगवान् सर्वलोककृत् |
सृष्टिं नानाविधां कृत्वा पश्चाच्चिंतामुपेयिवान् || 7 ||
किमाहाराः प्रजास्त्वेताः संभविष्यंति भूतले |
तथैव चासां दारिद्र्यात्कथमुत्तरणं भवेत् || 8 ||
दारिद्र्यान्मरणं श्रेयस्त्विति संचिंत्य चेतसि |
क्षीरोदस्योत्तरे कूले जगाम कमलोद्भवः || 9 ||
तत्र तीव्रं तपस्तप्त्वा कदाचित्परमेश्वरं |
ददर्श पुंडरीकाक्षं वासुदेवं जगद्गुरुं || 10 ||
सर्वज्ञं सर्वशक्तीनां सर्वावासं सनातनं |
सर्वेश्वरं वासुदेवं विष्णुं लक्ष्मीपतिं प्रभुं || 11 ||
सोमकोटिप्रतीकाशं क्षीरोदविमले जले |
अनंतभोगशयनं विश्रांतं श्रीनिकेतनं || 12 ||
कोटिसूर्यप्रतीकाशं महायोगेश्वरेश्वरं |
योगनिद्रारतं श्रीशं सर्वावासं सुरेश्वरं || 13 ||
जगदुत्पत्तिसंहारस्थितिकारणकारणं |
लक्ष्म्यादिशक्तिकरणं जातमंडलमंडितं || 14 ||
आयुधैर्देहवद्भिश्च चक्राद्यैः परिवारितं |
दुर्निरीक्ष्यं सुरैः सिद्धैर्महायोनिशतैरपि || 15 ||
आधारं सर्वशक्तीनां परं तेजः सुदुस्सहं |
प्रबुद्धं देवमीशानं दृष्ट्वा कमलसंभवः || 16 ||
शिरस्यंजलिमाधाय स्तोत्रं पूर्वमुवाच ह |
मनोवांछितसिद्धिं त्वं पूरयस्व महेश्वर || 17 ||
जितं ते पुंडरीक्ष नमस्ते विश्वभावन |
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज || 18 ||
सर्वेश्वर जयानंद सर्वावास परात्पर |
प्रसीद मम भक्तस्य छिंधि संदेहजं तमः || 19 ||
एवं स्तुतः स भगवान् ब्रह्मणाऽव्यक्तजन्मना |
प्रसादाभिमुखः प्राह हरिर्विश्रांतलोचनः || 20 ||
श्रीभगवानुवाच |
हिरण्यगर्भ तुष्टोऽस्मि ब्रूहि यत्तेऽभिवांछितं |
तद्वक्ष्यामि न संदेहो भक्तोऽसि मम सुव्रत || 21 ||
केशवाद्वचनं श्रुत्वा करुणाविष्टचेतनः |
प्रत्युवाच महाबुद्धिर्भगवंतं जनार्दनं || 22 ||
चतुर्विधं भवस्यास्य भूतसर्गस्य केशव |
परित्राणाय मे ब्रूहि रहस्यं परमाद्भुतं || 23 ||
दारिद्र्यशमनं धन्यं मनोज्ञं पावनं परं |
सर्वेश्वर महाबुद्धे स्वरूपं भैरवं महत् || 24 ||
श्रियः सर्वातिशायिन्यास्तथा ज्ञानं च शाश्वतं |
नामानि चैव मुख्यानि यानि गौणानि चाच्युत || 25 ||
त्वद्वक्त्रकमलोत्थानि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः |
इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रतिवाक्यमुवाच सः || 26 ||
श्रीभगवानुवाच |
महाविभूतिसंयुक्ता षाड्गुण्यवपुषः प्रभो |
भगवद्वासुदेवस्य नित्यं चैषाऽनपायिनी || 27 ||
एकैव वर्ततेऽभिन्ना ज्योत्स्नेव हिमदीधितेः |
सर्वशक्त्यात्मिका चैव विश्वं व्याप्य व्यवस्थिता || 28 ||
सर्वैश्वर्यगुणोपेता नित्यशुद्धस्वरूपिणी |
प्राणशक्तिः परा ह्येषा सर्वेषां प्राणिनां भुवि || 29 ||
शक्तीनां चैव सर्वासां योनिभूता परा कला |
अहं तस्याः परं नाम्नां सहस्रमिदमुत्तमं || 30 ||
शृणुष्वावहितो भूत्वा परमैश्वर्यभूतिदं |
देव्याख्यास्मृतिमात्रेण दारिद्र्यं याति भस्मतां || 31 ||
अथ स्तोत्रं ||
ॐ श्रीः पद्मा प्रकृतिः सत्त्वा शांता चिच्छक्तिरव्यया |
केवला निष्कला शुद्धा व्यापिनी व्योमविग्रहा || 32 ||
व्योमपद्मकृताधारा परा व्योमा मतोद्भवा |
निर्व्योमा व्योममध्यस्था पंचव्योमपदाश्रिता || 33 ||
अच्युता व्योमनिलया परमानंदरूपिणी |
नित्यशुद्धा नित्यतृप्ता निर्विकारा निरीक्षणा || 34 ||
ज्ञानशक्तिः कर्तृशक्तिर्भोक्तृशक्तिः शिखावहा |
स्नेहाभासा निरानंदा विभूतिर्विमला चला || 35 ||
अनंता वैष्णवी व्यक्ता विश्वानंदा विकाशिनी |
शक्तिर्विभिन्नसर्वार्तिः समुद्रपरितोषिणी || 36 ||
मूर्तिः सनातनी हार्दी निस्तरंगा निरामया |
ज्ञानज्ञेया ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेयविकासिनी || 37 ||
स्वच्छंदशक्तिर्गहना निष्कंपार्चिः सुनिर्मला |
स्वरूपा सर्वगाऽपारा बृंहिणी सुगुणोर्जिता || 38 ||
अकळंका निराधारा निस्संकल्पा निराश्रया |
असंकीर्णा सुशांता च शाश्वती भासुरी स्थिरा || 39 ||
अनौपम्या निर्विकल्पा निर्यंत्रा यंत्रवाहिनी |
अभेद्या भेदिनी भिन्ना भारती वैखरी खगा || 40 ||
अग्राह्या ग्राहिका गूढा गंभीरा विश्वगोपिनी |
अनिर्देश्याऽप्रतिहता निर्बीजा पावनी परा || 41 ||
अप्रतर्क्याऽपरिमिता भवभ्रांतिविनाशिनी |
एका द्विरूपा त्रिविधा असंख्याता सुरेश्वरी || 42 ||
सुप्रतिष्ठा महाधात्री स्थितिर्वृद्धिर्ध्रुवा गतिः |
ईश्वरी महिमा ऋद्धिः प्रमोदा उज्ज्वलोद्यमा || 43 ||
अक्षया वर्धमाना च सुप्रकाशा विहंगमा |
नीरजा जननी नित्या जया रोचिष्मती शुभा || 44 ||
तपोनुदा च ज्वाला च सुदीप्तिश्चांशुमालिनी |
अप्रमेया त्रिधा सूक्ष्मा परा निर्वाणदायिनी || 45 ||
अवदाता सुशुद्धा च अमोघाख्या परंपरा |
संधानकी शुद्धविद्या सर्वभूतमहेश्वरी || 46 ||
लक्ष्मीस्तुष्टिर्महाधीरा शांतिरापूरणेनवा |
अनुग्रहाशक्तिराद्या जगज्ज्येष्ठा जगद्विधिः || 47 ||
सत्या प्रह्वा क्रियायोग्या ह्यपर्णा ह्लादिनी शिवा |
संपूर्णाह्लादिनी शुद्धा ज्योतिष्मत्यमतावहा || 48 ||
रजोवत्यर्कप्रतिभाऽऽकर्षिणी कर्षिणी रसा |
परा वसुमती देवी कांतिः शांतिर्मतिः कला || 49 ||
कला कलंकरहिता विशालोद्दीपनी रतिः |
संबोधिनी हारिणी च प्रभावा भवभूतिदा || 50 ||
अमृतस्यंदिनी जीवा जननी खंडिका स्थिरा |
धूमा कलावती पूर्णा भासुरा सुमती रसा || 51 ||
शुद्धा ध्वनिः सृतिः सृष्टिर्विकृतिः कृष्टिरेव च |
प्रापणी प्राणदा प्रह्वा विश्वा पांडुरवासिनी || 52 ||
अवनिर्वज्रनलिका चित्रा ब्रह्मांडवासिनी |
अनंतरूपाऽनंतात्माऽनंतस्थाऽनंतसंभवा || 53 ||
महाशक्तिः प्राणशक्तिः प्राणदात्री रतिंभरा |
महासमूहा निखिला इच्छाधारा सुखावहा || 54 ||
प्रत्यक्षलक्ष्मीर्निष्कंपा प्ररोहा बुद्धिगोचरा |
नानादेहा महावर्ता बहुदेहविकासिनी || 55 ||
सहस्राणी प्रधाना च न्यायवस्तुप्रकाशिका |
सर्वाभिलाषपूर्णेच्छा सर्वा सर्वार्थभाषिणी || 56 ||
नानास्वरूपचिद्धात्री शब्दपूर्वा पुरातना |
व्यक्ताऽव्यक्ता जीवकेशा सर्वेच्छापरिपूरिता || 57 ||
संकल्पसिद्धा सांख्येया तत्त्वगर्भा धरावहा |
भूतरूपा चित्स्वरूपा त्रिगुणा गुणगर्विता || 58 ||
प्रजापतीश्वरी रौद्री सर्वाधारा सुखावहा |
कल्याणवाहिका कल्या कलिकल्मषनाशिनी || 59 ||
नीरूपोद्भिन्नसंताना सुयंत्रा त्रिगुणालया |
महामाया योगमाया महायोगेश्वरी प्रिया || 60 ||
महास्त्री विमला कीर्तिर्जया लक्ष्मीर्निरंजना |
प्रकृतिर्भगवन्मायाशक्तिर्निद्रा यशस्करी || 61 ||
चिंता बुद्धिर्यशः प्रज्ञा शांतिराप्रीतिवर्धिनी |
प्रद्युम्नमाता साध्वी च सुखसौभाग्यसिद्धिदा || 62 ||
काष्ठा निष्ठा प्रतिष्ठा च ज्येष्ठा श्रेष्ठा जयावहा |
सर्वातिशायिनी प्रीतिर्विश्वशक्तिर्महाबला || 63 ||
वरिष्ठा विजया वीरा जयंती विजयप्रदा |
हृद्गृहा गोपिनी गुह्या गणगंधर्वसेविता || 64 ||
योगीश्वरी योगमाया योगिनी योगसिद्धिदा |
महायोगेश्वरवृता योगा योगेश्वरप्रिया || 65 ||
ब्रह्मेंद्ररुद्रनमिता सुरासुरवरप्रदा |
त्रिवर्त्मगा त्रिलोकस्था त्रिविक्रमपदोद्भवा || 66 ||
सुतारा तारिणी तारा दुर्गा संतारिणी परा |
सुतारिणी तारयंती भूरितारेश्वरप्रभा || 67 ||
गुह्यविद्या यज्ञविद्या महाविद्या सुशोभिता |
अध्यात्मविद्या विघ्नेशी पद्मस्था परमेष्ठिनी || 68 ||
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दंडनीतिर्नयात्मिका |
गौरी वागीश्वरी गोप्त्री गायत्री कमलोद्भवा || 69 ||
विश्वंभरा विश्वरूपा विश्वमाता वसुप्रदा |
सिद्धिः स्वाहा स्वधा स्वस्तिः सुधा सर्वार्थसाधिनी || 70 ||
इच्छा सृष्टिर्द्युतिर्भूतिः कीर्तिः श्रद्धा दया मतिः |
श्रुतिर्मेधा धृतिर्ह्रीः श्रीर्विद्या विबुधवंदिता || 71 ||
अनसूया घृणा नीतिर्निर्वृतिः कामधुक्करा |
प्रतिज्ञा संततिर्भूतिर्द्यौः प्रज्ञा विश्वमानिनी || 72 ||
स्मृतिर्वाग्विश्वजननी पश्यंती मध्यमा समा |
संध्या मेधा प्रभा भीमा सर्वाकारा सरस्वती || 73 ||
कांक्षा माया महामाया मोहिनी माधवप्रिया |
सौम्याभोगा महाभोगा भोगिनी भोगदायिनी || 74 ||
सुधौतकनकप्रख्या सुवर्णकमलासना |
हिरण्यगर्भा सुश्रोणी हारिणी रमणी रमा || 75 ||
चंद्रा हिरण्मयी ज्योत्स्ना रम्या शोभा शुभावहा |
त्रैलोक्यमंडना नारीनरेश्वरवरार्चिता || 76 ||
त्रैलोक्यसुंदरी रामा महाविभववाहिनी |
पद्मस्था पद्मनिलया पद्ममालाविभूषिता || 77 ||
पद्मयुग्मधरा कांता दिव्याभरणभूषिता |
विचित्ररत्नमुकुटा विचित्रांबरभूषणा || 78 ||
विचित्रमाल्यगंधाढ्या विचित्रायुधवाहना |
महानारायणी देवी वैष्णवी वीरवंदिता || 79 ||
कालसंकर्षिणी घोरा तत्त्वसंकर्षिणी कला |
जगत्संपूरणी विश्वा महाविभवभूषणा || 80 ||
वारुणी वरदा व्याख्या घंटाकर्णविराजिता |
नृसिंही भैरवी ब्राह्मी भास्करी व्योमचारिणी || 81 ||
ऐंद्री कामधनुः सृष्टिः कामयोनिर्महाप्रभा |
दृष्टा काम्या विश्वशक्तिर्बीजगत्यात्मदर्शना || 82 ||
गरुडारूढहृदया चांद्री श्रीर्मधुरानना |
महोग्ररूपा वाराही नारसिंही हतासुरा || 83 ||
युगांतहुतभुग्ज्वाला कराला पिंगला कला |
त्रैलोक्यभूषणा भीमा श्यामा त्रैलोक्यमोहिनी || 84 ||
महोत्कटा महारक्ता महाचंडा महासना |
शंखिनी लेखिनी स्वस्था लिखिता खेचरेश्वरी || 85 ||
भद्रकाली चैकवीरा कौमारी भगमालिनी |
कल्याणी कामधुग्ज्वालामुखी चोत्पलमालिका || 86 ||
बालिका धनदा सूर्या हृदयोत्पलमालिका |
अजिता वर्षिणी रीतिर्भेरुंडा गरुडासना || 87 ||
वैश्वानरी महामाया महाकाली विभीषणा |
महामंदारविभवा शिवानंदा रतिप्रिया || 88 ||
उद्रीतिः पद्ममाला च धर्मवेगा विभावनी |
सत्क्रिया देवसेना च हिरण्यरजताश्रया || 89 ||
सहसावर्तमाना च हस्तिनादप्रबोधिनी |
हिरण्यपद्मवर्णा च हरिभद्रा सुदुर्धरा || 90 ||
सूर्या हिरण्यप्रकटसदृशी हेममालिनी |
पद्मानना नित्यपुष्टा देवमाताऽमृतोद्भवा || 91 ||
महाधना च या शृंगी कर्दमी कंबुकंधरा |
आदित्यवर्णा चंद्राभा गंधद्वारा दुरासदा || 92 ||
वरार्चिता वरारोहा वरेण्या विष्णुवल्लभा |
कल्याणी वरदा वामा वामेशी विंध्यवासिनी || 93 ||
योगनिद्रा योगरता देवकीकामरूपिणी |
कंसविद्राविणी दुर्गा कौमारी कौशिकी क्षमा || 94 ||
कात्यायनी कालरात्रिर्निशितृप्ता सुदुर्जया |
विरूपाक्षी विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणी || 95 ||
बहुरूपा स्वरूपा च विरूपा रूपवर्जिता |
घंटानिनादबहुला जीमूतध्वनिनिस्स्वना || 96 ||
महादेवेंद्रमथिनी भ्रुकुटीकुटिलानना |
सत्योपयाचिता चैका कौबेरी ब्रह्मचारिणी || 97 ||
आर्या यशोदासुतदा धर्मकामार्थमोक्षदा |
दारिद्र्यदुःखशमनी घोरदुर्गार्तिनाशिनी || 98 ||
भक्तार्तिशमनी भव्या भवभर्गापहारिणी |
क्षीराब्धितनया पद्मा कमला धरणीधरा || 99 ||
रुक्मिणी रोहिणी सीता सत्यभामा यशस्विनी |
प्रज्ञाधाराऽमितप्रज्ञा वेदमाता यशोवती || 100 ||
समाधिर्भावना मैत्री करुणा भक्तवत्सला |
अंतर्वेदी दक्षिणा च ब्रह्मचर्यपरागतिः || 101 ||
दीक्षा वीक्षा परीक्षा च समीक्षा वीरवत्सला |
अंबिका सुरभिः सिद्धा सिद्धविद्याधरार्चिता || 102 ||
सुदीप्ता लेलिहाना च कराला विश्वपूरका |
विश्वसंहारिणी दीप्तिस्तापनी तांडवप्रिया || 103 ||
उद्भवा विरजा राज्ञी तापनी बिंदुमालिनी |
क्षीरधारासुप्रभावा लोकमाता सुवर्चसा || 104 ||
हव्यगर्भा चाज्यगर्भा जुह्वतो यज्ञसंभवा |
आप्यायनी पावनी च दहनी दहनाश्रया || 105 ||
मातृका माधवी मुच्या मोक्षलक्ष्मीर्महर्धिदा |
सर्वकामप्रदा भद्रा सुभद्रा सर्वमंगळा || 106 ||
श्वेता सुशुक्लवसना शुक्लमाल्यानुलेपना |
हंसा हीनकरी हंसी हृद्या हृत्कमलालया || 107 ||
सितातपत्रा सुश्रोणी पद्मपत्रायतेक्षणा |
सावित्री सत्यसंकल्पा कामदा कामकामिनी || 108 ||
दर्शनीया दृशा दृश्या स्पृश्या सेव्या वरांगना |
भोगप्रिया भोगवती भोगींद्रशयनासना || 109 ||
आर्द्रा पुष्करिणी पुण्या पावनी पापसूदनी |
श्रीमती च शुभाकारा परमैश्वर्यभूतिदा || 110 ||
अचिंत्यानंतविभवा भवभावविभावनी |
निश्रेणिः सर्वदेहस्था सर्वभूतनमस्कृता || 111 ||
बला बलाधिका देवी गौतमी गोकुलालया |
तोषिणी पूर्णचंद्राभा एकानंदा शतानना || 112 ||
उद्याननगरद्वारहर्म्योपवनवासिनी |
कूष्मांडी दारुणा चंडा किराती नंदनालया || 113 ||
कालायना कालगम्या भयदा भयनाशिनी |
सौदामिनी मेघरवा दैत्यदानवमर्दिनी || 114 ||
जगन्माताऽभयकरी भूतधात्री सुदुर्लभा |
काश्यपी शुभदाना च वनमाला शुभा वरा || 115 ||
धन्या धन्येश्वरी धन्या रत्नदा वसुवर्धिनी |
गांधर्वी रेवती गंगा शकुनी विमलानना || 116 ||
इडा शांतिकरी चैव तामसी कमलालया |
आज्यपा वज्रकौमारी सोमपा कुसुमाश्रया || 117 ||
जगत्प्रिया च सरथा दुर्जया खगवाहना |
मनोभवा कामचारा सिद्धचारणसेविता || 118 ||
व्योमलक्ष्मीर्महालक्ष्मीस्तेजोलक्ष्मीः सुजाज्वला |
रसलक्ष्मीर्जगद्योनिर्गंधलक्ष्मीर्वनाश्रया || 119 ||
श्रवणा श्रावणी नेत्री रसनाप्राणचारिणी |
विरिंचिमाता विभवा वरवारिजवाहना || 120 ||
वीर्या वीरेश्वरी वंद्या विशोका वसुवर्धिनी |
अनाहता कुंडलिनी नलिनी वनवासिनी || 121 ||
गांधारिणींद्रनमिता सुरेंद्रनमिता सती |
सर्वमंगळ्यमांगळ्या सर्वकामसमृद्धिदा || 122 ||
सर्वानंदा महानंदा सत्कीर्तिः सिद्धसेविता |
सिनीवाली कुहू राका अमा चानुमतिर्द्युतिः || 123 ||
अरुंधती वसुमती भार्गवी वास्तुदेवता |
मयूरी वज्रवेताली वज्रहस्ता वरानना || 124 ||
अनघा धरणिर्धीरा धमनी मणिभूषणा |
राजश्रीरूपसहिता ब्रह्मश्रीर्ब्रह्मवंदिता || 125 ||
जयश्रीर्जयदा ज्ञेया सर्गश्रीः स्वर्गतिः सतां |
सुपुष्पा पुष्पनिलया फलश्रीर्निष्कलप्रिया || 126 ||
धनुर्लक्ष्मीस्त्वमिलिता परक्रोधनिवारिणी |
कद्रूर्धनायुः कपिला सुरसा सुरमोहिनी || 127 ||
महाश्वेता महानीला महामूर्तिर्विषापहा |
सुप्रभा ज्वालिनी दीप्तिस्तृप्तिर्व्याप्तिः प्रभाकरी || 128 ||
तेजोवती पद्मबोधा मदलेखारुणावती |
रत्ना रत्नावलीभूता शतधामा शतापहा || 129 ||
त्रिगुणा घोषिणी रक्ष्या नर्दिनी घोषवर्जिता |
साध्याऽदितिर्दितिर्देवी मृगवाहा मृगांकगा || 130 ||
चित्रनीलोत्पलगता वृषरत्नकराश्रया |
हिरण्यरजतद्वंद्वा शंखभद्रासनस्थिता || 131 ||
गोमूत्रगोमयक्षीरदधिसर्पिर्जलाश्रया |
मरीचिश्चीरवसना पूर्णचंद्रार्कविष्टरा || 132 ||
सुसूक्ष्मा निर्वृतिः स्थूला निवृत्तारातिरेव च |
मरीचिज्वालिनी धूम्रा हव्यवाहा हिरण्यदा || 133 ||
दायिनी कालिनी सिद्धिः शोषिणी संप्रबोधिनी |
भास्वरा संहतिस्तीक्ष्णा प्रचंडज्वलनोज्ज्वला || 134 ||
सांगा प्रचंडा दीप्ता च वैद्युतिः सुमहाद्युतिः |
कपिला नीलरक्ता च सुषुम्ना विस्फुलिंगिनी || 135 ||
अर्चिष्मती रिपुहरा दीर्घा धूमावली जरा |
संपूर्णमंडला पूषा स्रंसिनी सुमनोहरा || 136 ||
जया पुष्टिकरी छाया मानसा हृदयोज्ज्वला |
सुवर्णकरणी श्रेष्ठा मृतसंजीवनी रणे || 137 ||
विशल्यकरणी शुभ्रा संधिनी परमौषधिः |
ब्रह्मिष्ठा ब्रह्मसहिता ऐंदवी रत्नसंभवा || 138 ||
विद्युत्प्रभा बिंदुमती त्रिस्वभावगुणांबिका |
नित्योदिता नित्यदृष्टा नित्यकामकरीषिणी || 139 ||
पद्मांका वज्रचिह्ना च वक्रदंडविभासिनी |
विदेहपूजिता कन्या माया विजयवाहिनी || 140 ||
मानिनी मंगळा मान्या मानिनी मानदायिनी |
विश्वेश्वरी गणवती मंडला मंडलेश्वरी || 141 ||
हरिप्रिया भौमसुता मनोज्ञा मतिदायिनी |
प्रत्यंगिरा सोमगुप्ता मनोऽभिज्ञा वदन्मतिः || 142 ||
यशोधरा रत्नमाला कृष्णा त्रैलोक्यबंधिनी |
अमृता धारिणी हर्षा विनता वल्लकी शची || 143 ||
संकल्पा भामिनी मिश्रा कादंबर्यमृता प्रभा |
आगता निर्गता वज्रा सुहिता सहिताऽक्षता || 144 ||
सर्वार्थसाधनकरी धातुर्धारणिकाऽमला |
करुणाधारसंभूता कमलाक्षी शशिप्रिया || 145 ||
सौम्यरूपा महादीप्ता महाज्वाला विकासिनी |
माला कांचनमाला च सद्वज्रा कनकप्रभा || 146 ||
प्रक्रिया परमा योक्त्री क्षोभिका च सुखोदया |
विजृंभणा च वज्राख्या शृंखला कमलेक्षणा || 147 ||
जयंकरी मधुमती हरिता शशिनी शिवा |
मूलप्रकृतिरीशानी योगमाता मनोजवा || 148 ||
धर्मोदया भानुमती सर्वाभासा सुखावहा |
धुरंधरा च बाला च धर्मसेव्या तथागता || 149 ||
सुकुमारा सौम्यमुखी सौम्यसंबोधनोत्तमा |
सुमुखी सर्वतोभद्रा गुह्यशक्तिर्गुहालया || 150 ||
हलायुधा च कावीरा सर्वशास्त्रसुधारिणी |
व्योमशक्तिर्महादेहा व्योमगा मधुमन्मयी || 151 ||
गंगा वितस्ता यमुना चंद्रभागा सरस्वती |
तिलोत्तमोर्वशी रंभा स्वामिनी सुरसुंदरी || 152 ||
बाणप्रहरणा बाला बिंबोष्ठी चारुहासिनी |
ककुद्मिनी चारुपृष्ठा दृष्टादृष्टफलप्रदा || 153 ||
काम्यचारी च काम्या च कामाचारविहारिणी |
हिमशैलेंद्रसंकाशा गजेंद्रवरवाहना || 154 ||
अशेषसुखसौभाग्यसंपदां योनिरुत्तमा |
सर्वोत्कृष्टा सर्वमयी सर्वा सर्वेश्वरप्रिया || 155 ||
सर्वांगयोनिः साऽव्यक्ता संप्रधानेश्वरेश्वरी |
विष्णुवक्षःस्थलगता किमतः परमुच्यते || 156 ||
परा निर्महिमा देवी हरिवक्षःस्थलाश्रया |
सा देवी पापहंत्री च सान्निध्यं कुरुतान्मम || 157 ||
इति नाम्नां सहस्रं तु लक्ष्म्याः प्रोक्तं शुभावहं |
परावरेण भेदेन मुख्यगौणेन भागतः || 158 ||
यश्चैतत्कीर्तयेन्नित्यं शृणुयाद्वापि पद्मज |
शुचिः समाहितो भूत्वा भक्तिश्रद्धासमन्वितः || 159 ||
श्रीनिवासं समभ्यर्च्य पुष्पधूपानुलेपनैः |
भोगैश्च मधुपर्काद्यैर्यथाशक्ति जगद्गुरुं || 160 ||
तत्पार्श्वस्थां श्रियं देवीं संपूज्य श्रीधरप्रियां |
ततो नामसहस्रेण तोषयेत्परमेश्वरीं || 161 ||
नामरत्नावलीस्तोत्रमिदं यः सततं पठेत् |
प्रसादाभिमुखी लक्ष्मीः सर्वं तस्मै प्रयच्छति || 162 ||
यस्या लक्ष्म्याश्च संभूताः शक्तयो विश्वगाः सदा |
कारणत्वं न तिष्ठंति जगत्यस्मिंश्चराचरे || 163 ||
तस्मात्प्रीता जगन्माता श्रीर्यस्याच्युतवल्लभा |
सुप्रीताः शक्तयस्तस्य सिद्धिमिष्टां दिशंति हि || 164 ||
एक एव जगत्स्वामी शक्तिमानच्युतः प्रभुः |
तदंशशक्तिमंतोऽन्ये ब्रह्मेशानादयो यथा || 168 ||
तथैवैका परा शक्तिः श्रीस्तस्य करुणाश्रया |
ज्ञानादिषाड्गुण्यमयी या प्रोक्ता प्रकृतिः परा || 166 ||
एकैकशक्तिः श्रीस्तस्या द्वितीयात्मनि वर्तते |
परा परेशी सर्वेशी सर्वाकारा सनातनी || 167 ||
अनंतनामधेया च शक्तिचक्रस्य नायिका |
जगच्चराचरमिदं सर्वं व्याप्य व्यवस्थिता || 168 ||
तस्मादेकैव परमा श्रीर्ज्ञेया विश्वरूपिणी |
सौम्या सौम्येन रूपेण संस्थिता नटजीववत् || 169 ||
यो यो जगति पुंभावः स विष्णुरिति निश्चयः |
या या तु नारीभावस्था तत्र लक्ष्मीर्व्यवस्थिता || 170 ||
प्रकृतेः पुरुषाच्चान्यस्तृतीयो नैव विद्यते |
अथ किं बहुनोक्तेन नरनारीमयो हरिः || 171 ||
अनेकभेदभिन्नस्तु क्रियते परमेश्वरः |
महाविभूतिं दयितां ये स्तुवंत्यच्युतप्रियां || 172 ||
ते प्राप्नुवंति परमां लक्ष्मीं संशुद्धचेतसः |
पद्मयोनिरिदं प्राप्य पठन् स्तोत्रमिदं क्रमात् || 173 ||
दिव्यमष्टगुणैश्वर्यं तत्प्रसादाच्च लब्धवान् |
सकामानां च फलदामकामानां च मोक्षदां || 174 ||
पुस्तकाख्यां भयत्रात्रीं सितवस्त्रां त्रिलोचनां |
महापद्मनिषण्णां तां लक्ष्मीमजरतां नमः || 175 ||
करयुगळगृहीतं पूर्णकुंभं दधाना
क्वचिदमलगतस्था शंखपद्माक्षपाणिः |
क्वचिदपि दयितांगे चामरव्यग्रहस्ता
क्वचिदपि सृणिपाशं बिभ्रती हेमकांतिः || 176 ||
इति पद्मपुराणे काश्मीरवर्णने हिरण्यगर्भहृदये सर्वकामप्रदायकं पुरुषोत्तमप्रोक्तं श्री लक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री कमला सहस्रनाम स्तोत्रं, पद्म पुराण पर आधारित, श्री महालक्ष्मी के एक हजार नामों का विस्तृत गुणगान है। यह स्तोत्र देवी कमलांबिका के विभिन्न रूपों, विशेषताओं, स्वभाव, कार्यों और प्रकृति के साथ उनके विशेष गुणों को प्रस्तुत करता है। ब्रह्मा जी, सनत्कुमार और परमेश्वर के संवाद के माध्यम से यह स्तोत्र प्रकट होता है, जो भक्तों को देवी की महिमा को सोपान मार्ग से समझाता है और उन्हें श्रद्धा की ओर अग्रसर करता है।
यह स्तोत्र लक्ष्मी देवी को अंतःशक्ति, आनंद, ऐश्वर्य, संपदा, विजय और परम संतोष की प्रदाता के रूप में चित्रित करता है। वह केवल भौतिक धन की देवी नहीं हैं, बल्कि आध्यात्मिक समृद्धि, ज्ञान और शुद्धता की प्रतीक भी हैं। कमला देवी सृष्टि, स्थिति और लय का कारण बनने वाली परब्रह्म स्वरूपिणी हैं, जो ब्रह्मांड को बनाए रखने वाली शक्ति हैं और सभी जीवों का कल्याण करती हैं।
स्तोत्र का प्रत्येक नाम देवी के एक अद्वितीय गुण या उनकी दिव्य लीला का वर्णन करता है। यह उनके कमल जैसे नेत्रों, कमल जैसे हाथों, कमलासन और कमल से युक्त निवास का महिमामंडन करता है। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक चार पुरुषार्थों को प्रदान करने वाली हैं। दारिद्र्य से मुक्ति, धन की प्राप्ति, पारिवारिक सुख-शांति, और सभी मनोकामनाओं की सिद्धि जैसे फल इस स्तोत्र द्वारा प्रतिपादित हैं, जो जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिलाते हैं।
इस स्तोत्र का नित्य पाठ, विशेष रूप से नवरात्रों में, दीपावली जैसे त्योहारों पर, या किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में भक्ति और श्रद्धा के साथ करना अत्यंत शुभ फलदायक होता है। नियमित पाठ से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सभी ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है, जिससे जीवन सुखमय और समृद्ध बनता है।
लाभ (Benefits):
- दारिद्र्य का नाश: इस स्तोत्र के निष्ठावान पाठ से दारिद्र्य पूरी तरह से नष्ट हो जाता है और व्यक्ति आर्थिक कठिनाइयों से मुक्त हो जाता है।
- धन और समृद्धि की प्राप्ति: भक्तों को अपार धन-संपदा, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी कमला प्रदान करती हैं, जिससे भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।
- पारिवारिक सुख और संतान प्राप्ति: परिवार में शांति, सद्भाव स्थापित होता है, और संतानहीन लोगों को पुत्र-पौत्रादि सहित सभी सुख प्राप्त होते हैं।
- सफलता और विजय: मुकदमों, प्रतियोगिताओं या किसी भी कार्य में सफलता और विजय प्राप्त करने में यह सहायक है, सभी बाधाएं दूर होती हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष: निष्ठावान पाठकों को आध्यात्मिक प्रगति, भक्ति में वृद्धि और अंततः मोक्ष का मार्ग सुगम होता है, जिससे परम शांति मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री कमला सहस्रनाम स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री कमला सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करने से क्या लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या आधार क्या है?
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