श्री कमला कवचं
ईश्वर उवाच |
अथ वक्ष्ये महेशानि कवचं सर्वकामदं |
यस्य विज्ञानमात्रेण भवेत्साक्षात्सदाशिवः || 1 ||
नार्चनं तस्य देवेशि मंत्रमात्रं जपेन्नरः |
स भवेत्पार्वतीपुत्रः सर्वशास्त्रेषु पारगः |
विद्यार्थिना सदा सेव्या विशेषे विष्णुवल्लभा || 2 ||
अस्याश्चतुरक्षरिविष्णुवनितारूपायाः कवचस्य श्रीभगवान् शिव ऋषिरनुष्टुप्छंदो, वाग्भवी देवता, वाग्भवं बीजं, लज्जा शक्तिः, रमा कीलकं, कामबीजात्मकं कवचं, मम सुपांडित्य कवित्व सर्वसिद्धिसमृद्धये जपे विनियोगः ||
अथ कवचं |
ऐंकारी मस्तके पातु वाग्भवी सर्वसिद्धिदा |
ह्रीं पातु चक्षुषोर्मध्ये चक्षुर्युग्मे च शांकरी || 1 ||
जिह्वायां मुखवृत्ते च कर्णयोर्गंडयोर्नसि |
ओष्ठाधरे दंतपंक्तौ तालुमूले हनौ पुनः || 2 ||
पातु मां विष्णुवनिता लक्ष्मीः श्रीवर्णरूपिणी |
कर्णयुग्मे भुजद्वंद्वे स्तनद्वंद्वे च पार्वती || 3 ||
हृदये मणिबंधे च ग्रीवायां पार्श्वयोः पुनः |
सर्वांगे पातु कामेशी महादेवी समुन्नतिः || 4 ||
व्युष्टिः पातु महामाया उत्कृष्टिः सर्वदाऽवतु |
संधिं पातु सदा देवी सर्वत्र शंभुवल्लभा || 5 ||
वाग्भवी सर्वदा पातु पातु मां हरिगेहिनी |
रमा पातु सदा देवी पातु माया स्वराट् स्वयं || 6 ||
सर्वांगे पातु मां लक्ष्मीर्विष्णुमाया सुरेश्वरी |
विजया पातु भवने जया पातु सदा मम || 7 ||
शिवदूती सदा पातु सुंदरी पातु सर्वदा |
भैरवी पातु सर्वत्र भैरुंडा सर्वदाऽवतु || 8 ||
त्वरिता पातु मां नित्यमुग्रतारा सदाऽवतु |
पातु मां कालिका नित्यं कालरात्रिः सदाऽवतु || 9 ||
नवदुर्गा सदा पातु कामाख्या सर्वदाऽवतु |
योगिन्यः सर्वदा पांतु मुद्राः पांतु सदा मम || 10 ||
मातरः पांतु देव्यश्च चक्रस्था योगिनीगणाः |
सर्वत्र सर्वकार्येषु सर्वकर्मसु सर्वदा || 11 ||
पातु मां देवदेवी च लक्ष्मीः सर्वसमृद्धिदा |
इति ते कथितं दिव्यं कवचं सर्वसिद्धये || 12 ||
यत्र तत्र न वक्तव्यं यदीच्छेदात्मनो हितं |
शठाय भक्तिहीनाय निंदकाय महेश्वरि || 13 ||
न्यूनांगे अतिरिक्तांगे दर्शयेन्न कदाचन |
न स्तवं दर्शयेद्दिव्यं संदर्श्य शिवहा भवेत् || 14 ||
कुलीनाय महोच्छ्राय दुर्गाभक्तिपराय च |
वैष्णवाय विशुद्धाय दद्यात्कवचमुत्तमं || 15 ||
निजशिष्याय शांताय धनिने ज्ञानिने तथा |
दद्यात्कवचमित्युक्तं सर्वतंत्रसमन्वितं || 16 ||
विलिख्य कवचं दिव्यं स्वयंभुकुसुमैः शुभैः |
स्वशुक्रैः परशुक्रैश्च नानागंधसमन्वितैः || 17 ||
गोरोचनाकुंकुमेन रक्तचंदनकेन वा |
सुतिथौ शुभयोगे वा श्रवणायां रवेर्दिने || 18 ||
अश्विन्यां कृत्तिकायां वा फल्गुन्यां वा मघासु च |
पूर्वभाद्रपदायोगे स्वात्यां मंगळवासरे || 19 ||
विलिखेत् प्रपठेत् स्तोत्रं शुभयोगे सुरालये |
आयुष्मत्प्रीतियोगे च ब्रह्मयोगे विशेषतः || 20 ||
इंद्रयोगे शुभयोगे शुक्रयोगे तथैव च |
कौलवे बालवे चैव वणिजे चैव सत्तमः || 21 ||
शून्यागारे श्मशाने वा विजने च विशेषतः |
कुमारीं पूजयित्वादौ यजेद्देवीं सनातनीं || 22 ||
मत्स्यमांसैः शाकसूपैः पूजयेत्परदेवतां |
घृताद्यैः सोपकरणैः पूपसूपैर्विशेषतः || 23 ||
ब्राह्मणान्भोजायित्वादौ प्रीणयेत्परमेश्वरीं |
बहुना किमिहोक्तेन कृते त्वेवं दिनत्रयं || 24 ||
तदाधरेन्महारक्षां शंकरेणाभिभाषितं |
मारणद्वेषणादीनि लभते नात्र संशयः || 25 ||
स भवेत्पार्वतीपुत्रः सर्वशास्त्रविशारदः |
गुरुर्देवो हरः साक्षात्पत्नी तस्य हरप्रिया || 26 ||
अभेदेन भजेद्यस्तु तस्य सिद्धिरदूरतः |
सर्वदेवमयीं देवीं सर्वमंत्रमयीं तथा || 27 ||
सुभक्त्या पूजयेद्यस्तु स भवेत्कमलाप्रियः |
रक्तपुष्पैस्तथा गंधैर्वस्त्रालंकरणैस्तथा || 28 ||
भक्त्या यः पूजयेद्देवीं लभते परमां गतिं |
नारी वा पुरुषो वापि यः पठेत्कवचं शुभं |
मंत्रसिद्धिः कार्यसिद्धिर्लभते नात्र संशयः || 29 ||
पठति य इह मर्त्यो नित्यमार्द्रांतरात्मा
जपफलमनुमेयं लप्स्यते यद्विधेयं |
स भवति पदमुच्चैः संपदां पादनम्रः
क्षितिपमुकुटलक्ष्मीर्लक्षणानां चिराय || 30 ||
इति श्रीविश्वसारतंत्रोक्तं चतुरक्षरी विष्णुवनिता कवचं नाम श्री कमला कवचं |
अर्थ
श्री कमला कवचम् (जिसे विष्णुवनिता कवचम् भी कहा जाता है) एक संक्षिप्त, फिर भी अत्यंत शक्तिशाली मंत्र-कवच है। यह श्री शंकराचार्य की शिक्षा परंपरा में प्रकट हुआ है और श्री महालक्ष्मी (कमला या विष्णुवनिता) के दिव्य संरक्षण का सार प्रस्तुत करता है। यह कवच केवल एक स्तोत्र नहीं है, बल्कि भक्त के शरीर के प्रत्येक अंग, सूक्ष्म केंद्रों और संवेदी अंगों पर देवी कमला के विशिष्ट बीज अक्षरों और दिव्य गुणों को आरोपित करके, उसे बहुस्तरीय सुरक्षा और सशक्तिकरण प्रदान करने की एक गहन प्रणाली है। कमला देवी धन, समृद्धि, ज्ञान और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी हैं, और इस कवच के पाठ से उनकी पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
इस कवच की विशिष्टता इसमें निहित चतुरक्षर (ऐं/ह्रीं/श्रीं/क्लीं) बीज-अक्षरों में है। ये बीज-अक्षर शरीर के प्रमुख केंद्रों, संवेदी अंगों और सूक्ष्म ऊर्जा बिंदुओं से जुड़े होते हैं, जिससे भक्त को गहरी सुरक्षा मिलती है। उदाहरण के लिए, 'ऐं' सिर की रक्षा करता है, 'ह्रीं' आँखों की और 'श्रीं' जिह्वा तथा मुख की रक्षा करता है। इस प्रकार, प्रत्येक अक्षर एक विशिष्ट दिव्य गुण का प्रतिनिधित्व करता है और भक्त के संपूर्ण अस्तित्व को आच्छादित करता है। कवच में कमला रूपिणी लक्ष्मी को भाग्यदाता, वाग्धात्री, यज्ञप्रमुखरूपा, मंत्रसिद्धि प्रदाता और पापनाशिनी जैसे अनेक गुणों से वर्णित किया गया है, जो उनकी सर्वव्यापक शक्ति को दर्शाता है।
कवच में केवल बीज-अक्षर ही नहीं, बल्कि लक्ष्मी के विभिन्न रूपों, दुर्गा के स्वरूपों, भैरवी के संदर्भों और अन्य सहयोगी देवियों का भी आह्वान किया गया है। ये सभी विभिन्न दिशाओं (अष्टदिग्पाल) और भिन्न परिस्थितियों में रक्षक के रूप में खड़े होते हैं। त्रैलोक्य रक्षा का भाव इस कवच का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो यह आश्वासन देता है कि भक्त न केवल भौतिक लोक में, बल्कि सूक्ष्म और आध्यात्मिक लोकों में भी सुरक्षित रहेगा। यह समग्र सुरक्षा प्रणाली भक्त को एकात्मता के साथ शक्तिशाली बनाती है और उसे सभी प्रकार के भय तथा बाधाओं से मुक्ति दिलाती है।
इस कवच के पाठ के लिए विशिष्ट भक्तिपूर्ण आचरणों का पालन करने का निर्देश दिया गया है। इसे शुद्ध मन से, पूजा विधियों के साथ, और गोरचन (कुमकुम/रक्तचंदन) जैसी पवित्र सामग्रियों का उपयोग करके पढ़ना चाहिए। शुभ योगों और विशिष्ट नक्षत्रों में पाठ करना अधिक फलदायी माना गया है। शास्त्रों में यह भी चेतावनी दी गई है कि इस कवच का पाठ गोपनीय रूप से, श्रद्धा के साथ और गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। अश्रद्धालुओं या इसका दुरुपयोग करने वालों को यह फल नहीं देता। उचित दीक्षा और अनुशासन इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाता है।
लाभ (Benefits):
- धन और समृद्धि: इस कवच के नियमित पाठ से भक्त को धन-संपत्ति, भोग-सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
- शत्रु शांति और सुरक्षा: शत्रुओं से होने वाले उपद्रवों, शस्त्रों से होने वाले खतरों, विष भय और अन्य विपत्तियों से पूर्ण सुरक्षा मिलती है, जिससे जीवन में शांति स्थापित होती है।
- वाक् सिद्धि और मंत्र सिद्धि: भक्तों को वाणी में स्पष्टता, प्रभाव और सत्यता (वाक् सिद्धि) प्राप्त होती है। मंत्रों के पाठ में सिद्धि तथा विद्या और काव्य रचना में प्रवाहशीलता आती है।
- संतान और सौभाग्य: निःसंतान व्यक्तियों को संतान प्राप्ति का सौभाग्य मिलता है, साथ ही पारिवारिक सुख और समग्र सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
- बाधा निवारण और आध्यात्मिक प्रगति: जीवन में आने वाली बाधाएं, रोग और दुर्गति से मुक्ति मिलती है, आध्यात्मिक अभ्यास मजबूत होते हैं और देवी का अनुग्रह प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री कमला कवचम् क्या है?
श्री कमला कवचम् का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
श्री कमला कवचम् का पाठ कौन कर सकता है?
श्री कमला कवचम् का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री कमला कवचम् का मूल स्रोत क्या है?
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