श्री कामकळाकाळी संजीवन गद्य स्तोत्रं
महाकाल उवाच |
अथ वक्ष्ये महेशानि महापातकनाशनं |
गद्यं सहस्रनाम्नस्तु संजीवनतया स्थितं || 1 ||
पठन् यत्सफलं कुर्यात् प्राक्तनं सकलं प्रिये |
अपठन् विफलं तत्तत्तद्वस्तु कथयामि ते || 2 ||
ॐ फ्रें जय जय कामकळाकाळि कपालिनि सिद्धिकराळि सिद्धिविकराळि महावळिनि त्रिशुलिनि नरमुंडमालिनि शववाहिनि कात्यायनि महाट्टहासिनि सृष्टिस्थितिप्रळयकारिणि दितिदनुजमारिणि श्मशानचारिणि | महाघोररावे अध्यासितदावे अपरिमितबलप्रभावे | भैरवीयोगिनीडाकिनीसहवासिनि जगद्धासिनि स्वपदप्रकाशिनि | पापौघहारिणि आपदुद्धारिणि अपमृत्युवारिणि | बृहन्मद्यमानोदरि सकलसिद्धिकरि चतुर्दशभुवनेश्वरि | गुणातीतपरमसदाशिवमोहिनि अपवर्गरसदोहिनि रक्तार्णवलोहिनि | अष्टनागराजभूषितभुजदंडे आकृष्टकोदंडे परमप्रचंडे | मनोवागगोचरे मखकोटिमंत्रमयकलेवरे महाभीषणतरे प्रचलजटाभारभास्वरे सजलजलदमेदुरे जन्ममृत्युपाशभिदुरे सकलदैवतमयसिंहासनाधिरूढे गुह्यातिगुह्य परापरशक्तितत्त्वरूढे वाङ्मयीकृतमूढे | प्रकृत्यपरशिवनिर्वाणसाक्षिणि त्रिलोकीरक्षणि दैत्यदानवभक्षिणि | विकटदीर्घदंष्ट्र संचूर्णितकोटिब्रह्मकपाले चंद्रखंडांकितभाले देहप्रभाजितमेघजाले | नवपंचचक्रनयिनि महाभीमषोडशशयिनि सकलकुलाकुलचक्रप्रवर्तिनि निखिलरिपुदलकर्तिनि महामारीभयनिवर्तिनि लेलिहानरसनाकराळिनि त्रिलोकीपालिनि त्रयस्त्रिंशत्कोटिशस्त्रास्त्रशालिनि | प्रज्वलप्रज्वलनलोचने भवभयमोचने निखिलागमादेशितष्ठुसुरोचने | प्रपंचातीतनिष्कळतुरीयाकारे अखंडानंदाधारे निगमागमसारे | महाखेचरीसिद्धिविधायिनि निजपदप्रदायिनि महामायिनि घोराट्टहाससंत्रासितत्रिभुवने चरणकमलद्वयविन्यासखर्वीकृतावने विहितभक्तावने |
ॐ क्लीं क्रों स्फ्रों हूं ह्रीं छ्रीं स्त्रीं फ्रें भगवति प्रसीद प्रसीद जय जय जीव जीव ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हस हस नृत्य नृत्य क छ भगमालिनि भगप्रिये भगातुरे भगांकिते भगरूपिणि भगप्रदे भगलिंगद्राविणि | संहारभैरवसुरतरसलोलुपे व्योमकेशि पिंगकेशि महाशंखसमाकुले खर्परविहस्तहस्ते रक्तार्णवद्वीपप्रिये मदनोन्मादिनि | शुष्कनरकपालमालाभरणे विद्युत्कोटिसमप्रभे नरमांसखंडकवलिनि | वमदग्निमुखि फेरुकोटिपरिवृते करताळिकात्रासितत्रिविष्टपे | नृत्य प्रसारितपादाघातपरिवर्तितभूवलये | पदभारावनम्रीकृतकमठशेषाभोगे | कुरुकुल्ले कुंचतुंडि रक्तमुखि यमघंटे चर्चिके | दैत्यासुर दैत्यराक्षस दानव कुष्मांड प्रेत भूत डाकिनी विनायक स्कंद घोणक क्षेत्रपाल पिशाच ब्रह्मराक्षस वेताल गुह्यक सर्पनाग ग्रहनक्षत्रोत्पात चौराग्नि स्वापदयुद्धवज्रोपलाशनि वर्षविद्युन्मेघविषोपविष कपटकृत्याभिचार द्वेषवशीकरणोच्चाटनोन्मादापस्मार भूतप्रेतपिशाचावेश नदनदी समुद्रावर्तकांतार घोरांधकार महामारी बालग्रह हिंस्र सर्वस्वापहारि मायाविद्युद्दस्युवंचक दिवाचर रात्रिंचर संध्याचर शृंगिनखि दंष्ट्रि विद्युदुल्कारण्यदरप्रांतरादि नानाविधमहोपद्रवभंजनि | सर्वमंत्रतंत्रयंत्र कुप्रयोगप्रमर्दिनि | षडाम्नाय समय विद्याप्रकाशिनि श्मशानाध्यासिनि | निजबल प्रभाव पराक्रम गुणवशीकृत कोटिब्रह्मांडवर्ति भूतसंघे | विराड्रूपिणि सर्वदेवमहेश्वरि सर्वजनमनोरंजनि सर्वपापप्रणाशिनि अध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकादि विविधहृदयाधिनिर्दळिनि कैवल्यनिर्वाणवलिनि दक्षिणकाळि भद्रकाळि चंडकाळि कामकळाकाळि कौलाचारव्रतिनि कौलाचारकूजिनि कुलधर्मसाधनि जगत्कारणकारिणि महारौद्रि रौद्रावतारे अबीजे नानाबीजे जगद्बीजे काळेश्वरि कालातीते त्रिकालस्थायिनि महाभैरवे भैरवगृहिणि जननि जनजनननिवर्तिनि प्रळयानलज्वालाजालजिह्वे विखर्वोरु फेरुपोतलालिनि मृत्युंजयहृदयानंदकरि विलोलव्यालकुंडल उलूकपक्षच्छत्रमहाडामरि नियुतवक्त्रबाहुचरणे सर्वभूतदमनि नीलांजनसमप्रभे योगींद्र हृदयांबुजासनस्थित नीलकंठ देहार्धहारिणि षोडश कळांतवासिनि हकारार्धचारिणि कालसंकर्षिणि कपालहस्ते मदघूर्णितलोचने निर्वाणदीक्षाप्रसादप्रदे निंदानंदाधिकारिणि मातृगणमध्यचारिणि त्रयस्त्रिंशत्कोटित्रिदश तेजोमयविग्रहे प्रळयाग्निरोचिनि विश्वकर्त्रि विश्वाराध्ये विश्वजननि विश्वसंहारिणि विश्वव्यापिके विश्वेश्वरि निरुपमे निर्विकारे निरंजने निरीहे निस्तरंगे निराकारे परमेश्वरि परमानंदे परापरे प्रकृतिपुरुषात्मिके प्रत्ययगोचरे प्रमाणभूते प्रणवस्वरूपे संसारसारे सच्चिदानंदे सनातनि सकले सकलकळातीते सामरस्यसमयिनि केवले कैवल्यरूपे कल्पनातिगे काललोपिनि कामरहिते कामकळाकाळि भगवति ||
ॐ ख्फ्रें ह्सौः सौः श्रीं ऐं ह्रौं क्रों स्फ्रों सर्वसिद्धिं देहि देहि मनोरथान् पूरय पूरय मुक्तिं नियोजय नियोजय भवपाशं समुन्मूलय समुन्मूलय जन्ममृत्यू तारय तारय परविद्यां प्रकाशय प्रकाशय अपवर्गं निर्माहि निर्माहि संसारदुःखं यातनां विच्छेदय विच्छेदय पापानि संशमय संशमय चतुर्वर्गं साधय साधय ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं यान् वयं द्विष्मो ये चास्मान् विद्विषंति तान् सर्वान् विनाशय विनाशय मारय मारय शोषय शोषय क्षोभय क्षोभय मयि कृपां निवेशय निवेशय फ्रें ख्फ्रें हस्फ्रें ह्स्ख्फ्रें हूं स्फ्रों क्लीं ह्रीं जय जय चराचरात्मक ब्रह्मांडोदरवर्ति भूतसंघाराधिते प्रसीद प्रसीद तुभ्यं देवि नमस्ते नमस्ते नमस्ते ||
इतीदं गद्यमुदितं मंत्ररूपं वरानने |
सहस्रनामस्तोत्रस्य आदावंते च योजयेत् || 3 ||
अशक्नुवानौ द्वौ वारौ पठेच्छेष इमं स्तवं |
सहस्रनामस्तोत्रस्य तदैव प्राप्यते फलं || 4 ||
अपठन् गद्यमेतत्तु तत्फलं न समाप्नुयात् |
यत्फलं स्तोत्रराजस्य पाठेनाप्नोति साधकः |
तत्फलं गद्यपाठेन लभते नात्र संशयः || 5 ||
इति महाकालसंहितायां द्वादशतमः पटले श्री कामकळाकाळी संजीवन गद्य स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री कामकळाकाळी संजीवन गद्य स्तोत्रं महाकाल द्वारा स्वयं महेशाणी को उपदेशित एक अत्यंत गोपनीय, महापातकनाशक, शत्रुनिग्रहक और संजीवनी प्रदान करने वाला स्तोत्र है। यह कोई साधारण स्तोत्र नहीं है, बल्कि कामकळाकाळी देवी के सहस्रनाम के समान शक्ति से परिपूर्ण एक गद्य-रूप स्तुति है। महाकाल घोषणा करते हैं कि इसे पढ़ने से साधक को अपने पूर्व के सभी पूजाओं, जपों, होमों और अनुष्ठानों का फल एक ही स्थान पर प्राप्त हो जाता है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस गद्य का पाठ किए बिना सहस्रनाम स्तोत्र पढ़ने से पूर्ण फल नहीं मिलता। यह स्तोत्र भक्तों को संजीवनी, सुरक्षा, मोक्ष और असीम शक्ति प्रदान करता है।
इस गद्य स्तोत्र में कामकळाकाळी देवी के अनेक उग्र, रहस्यमय और महाशक्तिशाली रूपों का आह्वान किया जाता है। वह कपालमालिनी, शववाहिनी, अष्टनागों से भूषित भुजाओं वाली महाप्रचंड रूपिणी, त्रिशूलधारिणी और श्मशानचारिणी हैं। वह सृष्टि, स्थिति और प्रलय की कारिणी हैं, अगम-निगम सारस्वरूपिणी हैं। इस स्तोत्र का प्रत्येक नाम देवी के अनिर्वचनीय तेज, शक्ति, उग्रता, करुणा और परम तत्व को दर्शाता है। उनके घोर अट्टहास से तीनों लोकों का भय दूर होता है। शवभूत संसार में योगिनी-डाकिनीयों के साथ विचरण करती हुई, वह भक्त के कर्मबंधनों का विच्छेदन करती हैं। देवी त्रिलोकरक्षिणी, दैत्य-दानवभक्षिणी, ब्रह्मकपालसंचूर्णकारिणी और महाप्रलयाग्निज्वालारूपिणी हैं।
देवी की शक्ति को अखण्डानंदाधार, तुरीयस्वरूप, निष्कल तत्व, प्रणवस्वरूप, जगत्बीज और सर्वप्राणाधार के रूप में वर्णित किया गया है। स्तोत्र में देवी का आह्वान करने वाले बीजाक्षर – “ॐ फ्रें, ॐ क्लीं, क्रों, ह्रीं, छ्रीं, स्फ्रोम्…” – ये सभी साधक के चक्रों को शुद्ध करते हैं, जीवशक्ति को जागृत करते हैं और बाधाओं को भस्म करते हैं। ये मंत्र असीम शक्ति के स्रोत हैं, जिनके पाठ से आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक उत्थान संभव होता है। कामकळाकाळी देवी काल की अधिपति, प्रकृति की नियंत्रक और समस्त ब्रह्मांड की आधारशक्ति हैं।
अंत में, भक्त कामकळाकाळी देवी से शत्रु नाश, माया निवारण, पाप क्षय, कर्म शुद्धि, मुक्ति, सिद्धि, ध्यान शक्ति और चतुर्वर्ग सिद्धि (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का वरदान प्राप्त करने की प्रार्थना करता है। इस गद्य स्तोत्र का पाठ अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है और पूर्ण आयु तथा समृद्धि प्रदान करता है। देवी की कृपा से भक्त सभी भयों से मुक्त होकर आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति करता है। इस स्तोत्र का प्रत्येक शब्द देवी की अपार शक्ति का प्रतीक है, जो सच्ची भक्ति से पाठ करने वालों को तत्काल फल प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- कर्मबंधों का विनाश और पापों का क्षय: इस स्तोत्र के पाठ से पूर्वजन्म के कर्मबंध नष्ट होते हैं और सभी पापों का क्षय होता है, जिससे आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त होती है।
- शत्रु-दोष-अभिचार-दृष्टि का पूर्ण निवारण: सभी प्रकार के शत्रुओं से उत्पन्न बाधाएं, नजर दोष और अभिचार प्रयोगों से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
- सर्वसिद्धि, ऐश्वर्य, शक्ति, ध्यान सामर्थ्य की प्राप्ति: अष्ट सिद्धियां, अपार धन-संपत्ति, दैवीय शक्ति और गहन ध्यान करने की क्षमता साधक को प्राप्त होती है।
- भय, व्याधियाँ और आत्मदौर्बल्य का नाश: सभी प्रकार के भय, घातक रोग और मानसिक कमजोरियां नष्ट होती हैं, जिससे मन शांत और बलवान बनता है।
- मुक्ति मार्ग की स्पष्टता और आंतरिक शांति: मोक्ष का मार्ग स्पष्ट होता है और आंतरिक रूप से शांति, सुकून तथा परमानंद की प्राप्ति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री कामकळाकाळी संजीवन गद्य स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री कामकळाकाळी संजीवन गद्य स्तोत्रं के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
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