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श्री काळिका स्वरूप स्तुतिः

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स्तोत्र
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श्री काळिका स्वरूप स्तुतिः

सिततरसंविदवाप्यं सदसत्कलनाविहीनमनुपाधि |
जयति जगत्त्रयरूपं नीरूपं देवि ते रूपं || 1 ||

एकमनेकाकारं प्रसृतजगद्व्याप्तिविकृतिपरिहीनं |
जयति तवाद्वयरूपं विमलमलं चित्स्वरूपाख्यं || 2 ||

जयति तवोच्छलदंतः स्वच्छेच्छायाः स्वविग्रहग्रहणं |
किमपि निरुत्तरसहजस्वरूपसंवित्प्रकाशमयं || 3 ||

वांत्वा समस्तकालं भूत्या झंकारघोरमूर्तिमपि |
निग्रहमस्मिन् कृत्वानुग्रहमपि कुर्वती जयसि || 4 ||

कालस्य कालि देहं विभज्य मुनिपंचसंख्यया भिन्नं |
स्वस्मिन् विराजमानं तद्रूपं कुर्वती जयसि || 5 ||

भैरवरूपी कालः सृजति जगत्कारणादिकीटांतं |
इच्छावशेन यस्याः सा त्वं भुवनांबिका जयसि || 6 ||

जयति शशांकदिवाकरपावकधामत्रयांतरव्यापि |
जननि तव किमपि विमलं स्वरूपरूपं परंधाम || 7 ||

एकं स्वरूपरूपं प्रसरस्थितिविलयभेदस्त्रिविधं |
प्रत्येकमुदयसंस्थितिलयविश्रमतश्चतुर्विधं तदपि || 8 ||

इति वसुपंचकसंख्यं विधाय सहजस्वरूपमात्मीयं |
विश्वविवर्तावर्तप्रवर्तक जयति ते रूपं || 9 ||

सदसद्विभेदसूतेर्दलनपरा कापि सहजसंवित्तिः |
उदिता त्वमेव भगवति जयसि जयाद्येन रूपेण || 10 ||

जयति समस्तचराचरविचित्रविश्वप्रपंचरचनोर्मि |
अमलस्वभावजलधौ शांतं कांतं च ते रूपं || 11 ||

सहजोल्लासविकासप्रपूरिताशेषविश्वविभवैषा |
पूर्णा तवांब मूर्तिर्जयति परानंदसंपूर्णा || 12 ||

कवलितसकलजगत्रयविकटमहाकालकवलनोद्युक्ता |
उपभुक्तभावविभवप्रभवापि कृशोदरी जयसि || 13 ||

रूपत्रयपरिवर्जितमसमं रूपत्रयांतरव्यापि |
अनुभवरूपमरूपं जयति परं किमपि ते रूपं || 14 ||

अव्ययमकुलममेयं विगलितसदसद्विवेककल्लोलं |
जयति प्रकाशविभवस्फीतं काल्याः परं धाम || 15 ||

ऋतुमुनिसंख्यं रूपं विभज्य पंचप्रकारमेकैकं |
दिव्यौघमुद्गिरंती जयति जगत्तारिणी जननी || 16 ||

भूदिग्गोखगदेवीचक्रसंज्ञानविभवपरिपूर्णं |
निरुपमविश्रांतिमयं श्रीपीठं जयति ते रूपं || 17 ||

प्रलयलयांतरभूमौ विलसितसदसत्प्रपंचपरिहीनां |
देवि निरुत्तरतरां नौमि सदा सर्वतः प्रकटां || 18 ||

यादृङ्महाश्मशाने दृष्टं देव्याः स्वरूपमकुलस्थं |
तादृग् जगत्रयमिदं भवतु तवांब प्रसादेन || 19 ||

इत्थं स्वरूपस्तुतिरभ्यधायि
सम्यक्समावेशदशावशेन |
मया शिवेनास्तु शिवाय सम्यक्
ममैव विश्वस्य तु मंगळाय || 20 ||

इति श्रीश्रीज्ञाननेत्रपाद रचितं श्री काळिका स्वरूप स्तुतिः |

अर्थ

श्री कालिका स्वरूप स्तुति ज्ञानानेत्रपाद महर्षि द्वारा रचित एक अत्यंत शक्तिशाली और गहन आध्यात्मिक स्तोत्र है। यह स्तुति काली देवी के परमतत्व स्वरूप को, उनके शुद्ध और अद्वैत सिद्धांत को अत्यंत निर्मलता से वर्णित करती है। देवी सत्-असत् दोनों से परे हैं, वे उपाधि रहित परम चैतन्य स्वरूप हैं। वे निराकार होते हुए भी, तीनों लोकों के रूप में प्रकट होती हैं, और साथ ही अपने शुद्ध स्वरूप में अविचल रहती हैं। वे एक नित्य तत्व हैं, जो रूपहीन होकर भी समस्त रूपों में विद्यमान हैं।

काली देवी का एकत्व अनेकत्व के रूप में, विश्वव्यापी होकर भी, उनमें कोई विकार नहीं है। वे परिपूर्ण, निर्मल और बोधमय स्वरूप हैं। देवी अपनी स्वच्छंद संकल्प शक्ति के रूप में हैं। वही संकल्प उनके स्वरूप प्रकाश के रूप में ब्रह्मांड में प्रकाशित होता है। भले ही यह जगत काल के भयंकर रूप में परिवर्तित होता दिखाई दे, वही देवी की निग्रह और अनुग्रह शक्ति है। काल को पाँच मुनियों की संख्या से विभाजित किया गया है, फिर भी वह काल भी उन्हीं के स्वरूप में नवीनता से प्रकाशित होता है। स्तोत्र यह प्रकट करता है कि भैरव को भी इच्छाशक्ति प्रदान करने वाली, और जगत की सृष्टि, स्थिति, लय की कारक स्वयं भुवनाम्बिका ही हैं।

चंद्रमा, सूर्य और अग्नि – ये तीनों लोकधामों को व्याप्त करने वाली देवी की परम ज्योति है। उनका स्वरूप मलिन रहित, पवित्र ज्योति और परंधाम है। सृष्टि, स्थिति, लय – ये त्रि-विध विभाग, उनकी चतुर्विध स्थितियाँ, और पंचविध रूपांतरण – ये सभी देवी के सहज स्वरूप से ही उत्पन्न होते हैं। विश्वव्यापी उत्पत्ति, विवर्त, लय का चक्र सब कुछ देवी के तत्व में ही समाहित हो जाता है। देवी का सहज चैतन्य सत्-असत् के भेदों को भेद कर प्रकाशित होता है।

उनका स्वरूप ही जगत की अद्भुत विविधता को, चराचर जगत को शांत सागर की लहरों के समान संचालित करता है। काली का रूप परमानंद स्वरूपिणी है, सहज प्रकाश से परिपूर्ण, सर्व वैभवों को भरने वाली पूर्ण मूर्ति है। महाकाल के रूपों से यह संसार अल्प होकर उनके महान तत्व में लीन हो जाता है। तीन रूपों से परे होते हुए भी, उन्हें अपने भीतर समाहित करने वाला देवी का परम चैतन्य अनुभव से अगोचर होते हुए भी अनुभूति के रूप में प्रत्यक्ष होता है। व्यय-अव्यय, सत्-असत्, ज्ञान-अज्ञान – कोई भी भेद उन पर लागू नहीं होते। वे परमधाम कांति वर्धन हैं। ऋतुओं के समान पाँच प्रकार के स्वरूपों में भिन्न होकर, अनेक दिव्य प्रवाहों को प्रवाहित करने वाली जगततारिणी देवी हैं। उनका श्रीपीठ पृथ्वी, दिशाओं, अग्नि, जल और देवगणों – सभी को परिपूर्ण ज्ञान से भर देता है। प्रलय और लय सभी उनमें ही विश्राम करते हैं। महाश्मशान के रूप में दिखाई देने वाली देवी आंतरिक परमतत्व को दर्शाती हैं। जब भक्त उस रूप को ग्रहण करते हैं, तो वे जानते हैं कि यह सारा जगत वही परमतत्व है।

लाभ (Benefits):

  • आध्यात्मिक ज्ञानोदय: इस स्तोत्र का पाठ देवी के परमतत्व स्वरूप की समझ को बढ़ाता है, जिससे आध्यात्मिक ज्ञानोदय का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • भय निवारण और आत्मविश्वास: चूंकि काली देवी काल की अधिष्ठात्री हैं, यह स्तुति मृत्यु के भय को दूर करती है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए अटूट आत्मविश्वास प्रदान करती है।
  • संकल्प शक्ति में वृद्धि: देवी की संकल्प शक्ति की स्तुति करने से भक्तों की इच्छाशक्ति मजबूत होती है और उनके शुभ संकल्प पूरे होते हैं।
  • सृष्टि-स्थिति-लय का ज्ञान: यह ब्रह्मांड की सृष्टि, स्थिति और लय के मूल स्वरूप को समझने में मदद करता है, जिससे जीवन की नश्वरता का बोध होता है।
  • मानसिक शांति और स्थिरता: देवी के अद्वैत और निर्मल स्वरूप का ध्यान करने से मन को अपार शांति और स्थिरता मिलती है, बाहरी दुनिया के भ्रमों से मुक्ति मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री कालिका स्वरूप स्तुति क्या है?
यह ज्ञानानेत्रपाद महर्षि द्वारा रचित एक स्तोत्र है जो काली देवी के परम, निराकार और अद्वैत स्वरूप का वर्णन करता है, और उनकी विश्वव्यापी चेतना को समझाता है। यह देवी के वास्तविक तत्व को गहराई से बताता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ दैनिक पूजा के भाग के रूप में, विशेष रूप से मंगलवार, शुक्रवार या काली देवी को समर्पित किसी भी शुभ दिन पर किया जा सकता है। शुद्ध मन और भक्ति के साथ पाठ करना उत्तम होता है।
श्री कालिका स्वरूप स्तुति के पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से आध्यात्मिक ज्ञानोदय, भय का निवारण, आत्मविश्वास में वृद्धि, संकल्प शक्ति का बलवान होना और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह देवी के परम तत्व का बोध कराता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
काली देवी के भक्त, आध्यात्मिक ज्ञान के साधक, भय और चिंताओं से मुक्ति चाहने वाले, और जीवन में स्पष्टता व शक्ति प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
दैनिक पाठ के लिए एक या तीन बार पाठ किया जा सकता है। विशेष फल के लिए, 11, 21, 108 बार या अपने गुरु द्वारा सुझाए अनुसार संकल्पपूर्वक पाठ किया जा सकता है। नियमित पाठ अधिक प्रभावी होता है।
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र महान ऋषि ज्ञानानेत्रपाद द्वारा रचा गया है। यह काली देवी की सुंदरता, शक्ति और परम चैतन्य की स्तुति करते हुए, उनके दिव्य गुणों का गहराई से अन्वेषण करने वाला एक प्राचीन पाठ है।

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