श्री काळिका स्तोत्रं 2
दधन्नैरंतर्यादपि मलिनचर्यां सपदि यत्
सपर्यां पश्यन् सन् विशतु सुरपुर्यां नरपशुः |
भटान्वर्यान् वीर्यासमहरदसूर्यान् समिति या
जगद्धुर्या काळी मम मनसि कुर्यान्निवसतिं || 1 ||
लसन्नासामुक्ता निजचरणभक्तावनविधौ
समुद्युक्ता रक्तांबुरुहदृगलक्ताधरपुटा |
अपि व्यक्ताऽव्यक्तायमनियमसक्ताशयशया
जगद्धुर्या काळी मम मनसि कुर्यान्निवसतिं || 2 ||
रणत्सन्मंजीरा खलदमनधीराऽतिरुचिर-
-स्फुरद्विद्युच्चीरा सुजनझषनीरायिततनुः |
विराजत्कोटीरा विमलतरहीरा भरणभृत्
जगद्धुर्या काळी मम मनसि कुर्यान्निवसतिं || 3 ||
वसाना कौशेयं कमलनयना चंद्रवदना
दधाना कारुण्यं विपुलजघना कुंदरदना |
पुनाना पापाद्या सपदि विधुनाना भवभयं
जगद्धुर्या काळी मम मनसि कुर्यान्निवसतिं || 4 ||
रधूत्तंसप्रेक्षारणरणिकया मेरुशिखरात्
समागाद्या रागाज्झटिति यमुनागाधिपमसौ |
नगादीशप्रेष्ठा नगपतिसुता निर्जरनुता
जगद्धुर्या काळी मम मनसि कुर्यान्निवसतिं || 5 ||
विलसन्नवरत्नमालिका
कुटिलश्यामलकुंतलालिका |
नवकुंकुमभव्यभालिका-
-ऽवतु सा मां सुखकृद्धि काळिका || 6 ||
यमुनाचलद्दमुना दुःखदवस्य देहिनां |
अमुना यदि वीक्षिता सकृच्छमु नानाविधमातनोत्यहो || 7 ||
अनुभूति सतीप्राणपरित्राणपरायणा |
देवैः कृतसपर्या सा काळी कुर्याच्छुभानि नः || 8 ||
य इदं काळिकास्तोत्रं पठेत्तु प्रयतः शुचिः |
देवीसायुज्यभुक् चेह सर्वान् कामानवाप्नुयात् || 9 ||
इति श्री काळिका स्तोत्रं |
अर्थ
श्री कालिका स्तोत्रम 2 एक अत्यंत भक्तिपूर्ण स्तोत्र है जिसमें भक्त जगत् के समस्त भार को वहन करने वाली, परम शक्तिशाली देवी कालिका से अपने हृदय में स्थायी रूप से निवास करने की प्रार्थना करता है। इस स्तोत्र में कवि यह बताते हैं कि मनुष्य चाहे कितना भी अपवित्र जीवन जी रहा हो या उसमें कितने भी दोष हों, देवी काली की कृपा से वह क्षण भर में शुद्ध होकर देवलोक प्राप्त कर सकता है। देवी काली परम कारुण्यमयी हैं जो अपने भक्तों के पापों को धोकर उन्हें आध्यात्मिक उत्थान की ओर ले जाती हैं।
देवी कालिका वह अजेय शक्ति हैं जो भटगणों को पराजित करती हैं और शूरवीर असुरों का नाश करती हैं। वे संपूर्ण जगत् का आधार हैं और उनकी शक्ति अतुलनीय है। उनकी चमकती हुई नासिका-मोती, रक्तकमल के समान लाल आँखें और चमकदार लाल अधर उनके दिव्य सौंदर्य और शक्ति को एक साथ प्रकट करते हैं। वे व्यक्त और अव्यक्त दोनों रूपों में व्याप्त होकर अपने भक्तों पर निरंतर कृपा बरसाती हैं। देवी कालिका के नृत्य में उनके नूपुर 'रणरण' की ध्वनि करते हैं, उनके दिव्य वस्त्र बिजली की तरह चमकते हैं, और उनका शरीर मुकुट तथा हीरों के आभूषणों से सुसज्जित होकर अत्यंत भव्य दिखाई देता है। उनकी प्रत्येक गति से सृष्टि स्वयं स्पंदित होती है।
कमल-नयनी, चंद्रमुखी देवी, रेशमी वस्त्र धारण किए हुए हैं। वे असीम करुणा से पापों का शोधन करती हैं और संसार के भय को नष्ट करती हैं। वे रथध्वजाओं की कांति से अलंकृत होकर मेरु पर्वत जैसे विशाल स्थानों से यमुना नदी के तट पर प्रकट होती हैं, नागपति की प्रिय और हिमवान की पुत्री के रूप में प्रतिष्ठित हैं। देवता नित्य उनकी स्तुति करते हैं, और वे अपने भक्तों को अभय प्रदान करने वाली शक्ति हैं। उनके श्यामला केश, नवरत्नमालाएँ और नवकुमकुम से चिह्नित भाल भक्त के शरीर और मन में सुख, शुभ और समृद्धि प्रदान करते हैं।
देवी काली के एक दर्शन मात्र से ही सभी भय, दुःख और कष्ट दूर हो जाते हैं। उनका अनुभव प्राणरक्षक है, और वे अपने भक्तों की रक्षा करने में अग्रणी हैं। जो भक्त इस स्तोत्र का पवित्र मन से पाठ करता है, वह देवी का सायुज्य प्राप्त करता है। इस लोक में वह अपनी सभी इच्छाओं, संपत्तियों और शुभ फलों को प्राप्त करता है। कालिका देवी हृदय में निवास करके भक्त के जीवन को मंगलमय बनाती हैं। उनकी कृपा से विजय, समृद्धि और आंतरिक शांति प्राप्त होती है।
लाभ (Benefits):
- पाप मुक्ति और शुद्धिकरण: इस स्तोत्र के पाठ से पाप, भय और दुख दूर होते हैं, और मन शुद्ध होता है। देवी भक्तों को आध्यात्मिक रूप से उन्नत करती हैं।
- शक्ति और सुरक्षा: कालिका देवी शक्ति का स्वरूप हैं। उनके स्मरण से भक्तों को शारीरिक और मानसिक शक्ति मिलती है, और सभी प्रकार के खतरों से सुरक्षा प्राप्त होती है।
- धन और समृद्धि: देवी की कृपा से भक्त इस लोक में धन, सुख और समृद्धि प्राप्त करते हैं। उनके जीवन में शुभ फल सिद्ध होते हैं।
- संसार भय का नाश और मोक्ष: संसार चक्र के भय से मुक्ति मिलती है, और भक्त देवी का सायुज्य यानी देवी के साथ एकाकार होने की मोक्ष स्थिति प्राप्त करने के योग्य बनते हैं।
- आंतरिक शांति और संतोष: देवी की करुणा से मन में शांति स्थापित होती है, सभी मानसिक परेशानियाँ दूर होती हैं और आंतरिक संतोष व समाधान प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री कालिका स्तोत्रम 2 क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री कालिका स्तोत्रम 2 के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
यह स्तोत्र किसे पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या इतिहास क्या है?
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