श्री काळिका अर्गळ स्तोत्रं
अस्य श्री काळिकार्गळ स्तोत्रस्य भैरव ऋषिरनुष्टुप् छंदः श्रीकाळिका देवता मम सर्वसिद्धिसाधने विनियोगः |
ॐ नमस्ते काळिके देवि आद्यबीजत्रय प्रिये |
वशमानय मे नित्यं सर्वेषां प्राणिनां सदा || 1 ||
कूर्चयुग्मं ललाटे च स्थातु मे शववाहिना |
सर्वसौभाग्यसिद्धिं च देहि दक्षिण काळिके || 2 ||
भुवनेश्वरि बीजयुग्मं भ्रूयुगे मुंडमालिनी |
कंदर्परूपं मे देहि महाकालस्य गेहिनि || 3 ||
दक्षिणे काळिके नित्ये पितृकाननवासिनि |
नेत्रयुग्मं च मे देहि ज्योतिरालेपनं महत् || 4 ||
श्रवणे च पुनर्लज्जाबीजयुग्मं मनोहरं |
महाश्रुतिधरत्वं च मे देहि मुक्त कुंतले || 5 ||
ह्रीं ह्रीं बीजद्वयं देवि पातु नासापुटे मम |
देहि नानाविधि मह्यं सुगंधिं त्वं दिगंबरे || 6 ||
पुनस्त्रिबीजप्रथमं दंतोष्ठरसनादिकं |
गद्यपद्यमयीं वाजीं काव्यशास्त्राद्यलंकृतां || 7 ||
अष्टादशपुराणानां स्मृतीनां घोरचंडिके |
कविता सिद्धिलहरीं मम जिह्वां निवेशय || 8 ||
वह्निजाया महादेवि घंटिकायां स्थिरा भव |
देहि मे परमेशानि बुद्धिसिद्धिरसायकं || 9 ||
तुर्याक्षरी चित्स्वरूपा काळिका मंत्रसिद्धिदा |
सा च तिष्ठतु हृत्पद्मे हृदयानंदरूपिणी || 10 ||
षडक्षरी महाकाळी चंडकाळी शुचिस्मिता |
रक्तासिनी घोरदंष्ट्रा भुजयुग्मे सदाऽवतु || 11 ||
सप्ताक्षरी महाकाळी महाकालरतोद्यता |
स्तनयुग्मे सूर्यकर्णो नरमुंडसुकुंतला || 12 ||
तिष्ठ स्वजठरे देवि अष्टाक्षरी शुभप्रदा |
पुत्रपौत्रकलत्रादि सुहृन्मित्राणि देहि मे || 13 ||
दशाक्षरी महाकाळी महाकालप्रिया सदा |
नाभौ तिष्ठतु कल्याणी श्मशानालयवासिनी || 14 ||
चतुर्दशार्णवा या च जयकाळी सुलोचना |
लिंगमध्ये च तिष्ठस्व रेतस्विनी ममांगके || 15 ||
गुह्यमध्ये गुह्यकाळी मम तिष्ठ कुलांगने |
सर्वांगे भद्रकाळी च तिष्ठ मे परमात्मिके || 16 ||
काळि पादयुगे तिष्ठ मम सर्वमुखे शिवे |
कपालिनी च या शक्तिः खड्गमुंडधरा शिवा || 17 ||
पादद्वयांगुळिष्वंगे तिष्ठ स्वपापनाशिनि |
कुल्लादेवी मुक्तकेशी रोमकूपेषु वै मम || 18 ||
तिष्ठतु उत्तमांगे च कुरुकुल्ला महेश्वरी |
विरोधिनी विरोधे च मम तिष्ठतु शंकरी || 19 ||
विप्रचित्ते महेशानि मुंडधारिणि तिष्ठ मां |
मार्गे दुर्मार्गगमने उग्रा तिष्ठतु सर्वदा || 20 ||
प्रभादिक्षु विदिक्षु मां दीप्तां दीप्तं करोतु मां |
नीलाशक्तिश्च पाताळे घना चाकाशमंडले || 21 ||
पातु शक्तिर्बलाका मे भुवं मे भुवनेश्वरी |
मात्रा मम कुले पातु मुद्रा तिष्ठतु मंदिरे || 22 ||
मिता मे योगिनी या च तथा मित्रकुलप्रदा |
सा मे तिष्ठतु देवेशि पृथिव्यां दैत्यदारिणी || 23 ||
ब्राह्मी ब्रह्मकुले तिष्ठ मम सर्वार्थदायिनी |
नारायणी विष्णुमाया मोक्षद्वारे च तिष्ठ मे || 24 ||
माहेश्वरी वृषारूढा काशिकापुरवासिनी |
शिवतां देहि चामुंडे पुत्रपौत्रादि चानघे || 25 ||
कौमारी च कुमाराणां रक्षार्थं तिष्ठ मे सदा |
अपराजिता विश्वरूपा जये तिष्ठ स्वभाविनी || 26 ||
वाराही वेदरूपा च सामवेदपरायणा |
नारसिंही नृसिंहस्य वक्षःस्थलनिवासिनी || 27 ||
सा मे तिष्ठतु देवेशि पृथिव्यां दैत्यदारिणी |
सर्वेषां स्थावरादीनां जंगमानां सुरेश्वरी || 28 ||
स्वेदजोद्भिजांडजानां चराणां च भयादिकं |
विनाश्याप्यभिमतिं च देहि दक्षिण काळिके || 29 ||
य इदं चार्गळं देवि यः पठेत्काळिकार्चने |
सर्वसिद्धिमवाप्नोति खेचरो जायते तु सः || 30 ||
इति श्री काळी अर्गळ स्तोत्रं |
अर्थ
श्री कालिका अर्गळ स्तोत्रम, देवी कालिका की संरक्षणात्मक शक्ति, परिवार की उन्नति और सौभाग्य की प्राप्ति के उद्देश्य से रचा गया एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र स्पष्ट रूप से बताता है कि भक्त के शरीर के प्रत्येक अंग, उसकी संपत्ति से लेकर उसके आयु तक, माँ कालिका के विभिन्न रूप रक्षा करते हैं और उन अंगों से संबंधित पोषण, विजय और सिद्धि प्रदान करते हैं। 'अर्गळ' का अर्थ है बाधाओं को दूर करना या एक सुरक्षा कवच का निर्माण करना। यह स्तोत्र भक्त के चारों ओर एक आध्यात्मिक कवच का निर्माण करता है, उसे सभी बुरी शक्तियों और नकारात्मक प्रभावों से बचाता है।
इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति एक विशिष्ट बीजमंत्र या महाविद्या स्थान के माध्यम से भौतिक और सूक्ष्म सुरक्षा स्थापित करती है। ललाट, भ्रूयुग्म, नेत्र, श्रवण, नासापुट, हृदय, नाभि और जठर जैसे शरीर के प्रत्येक स्थान के लिए एक महाशक्ति नियुक्त है। उदाहरण के लिए, कूर्च युग्म बीजमंत्र ललाट की रक्षा करता है, जबकि भुवनेश्वरी बीजमंत्र भ्रूयुग्म की रक्षा करता है। दक्षिण कालिका नेत्रों को 'ज्योतिरालेपन महत' प्रदान करती हैं। स्तोत्र में ब्राह्मी, नारायणी, माहेश्वरी, कौमारी, चामुंडा, वाराही, नारसिंही जैसे अनेक देवी रूप विभिन्न अंगों में निवास करते हुए आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह न केवल भौतिक सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि आंतरिक शक्ति, साहस और आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है।
स्तोत्र में अष्टाक्षरी, सप्ताक्षरी, दशाक्षरी, तुर्याक्षरी जैसे बीजमंत्रों की कार्यप्रणाली स्पष्ट है; वे बताते हैं कि जब ये बीजमंत्र शरीर पर प्रतिष्ठित होते हैं, तो भक्त को सुख, शत्रुनाश, पुत्र-पौत्र लाभ, शक्ति, मंत्र सिद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। कालिका के कपालिनी, मुंडमालिनी, घोरदंष्ट्रादित्या जैसे उग्र स्वरूप साधक के शत्रुओं का समूल नाश करने की शक्ति प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र भक्ति और तंत्र के समन्वय का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ भक्तिपूर्ण समर्पण और सटीक बीजमंत्रों के प्रयोग से लौकिक आशीर्वाद और परिवर्तनकारी आध्यात्मिक सुरक्षा दोनों प्राप्त होती हैं।
इस स्तोत्र का पाठ भक्ति-बल, संकल्पशक्ति, आत्मनिर्भरता, श्रेयस और पारिवारिक श्रेयस को बढ़ाता है। यह विशेष रूप से पारिवारिक सुरक्षा, कुल की वृद्धि, संतान वृद्धि और सामाजिक स्थिति में सुधार जैसे सामाजिक लाभ भी प्रदान करता है। अंत में यह स्पष्ट किया गया है कि जो कोई भी इस अर्गळ स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करता है, उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, रक्षा, ऐश्वर्य, धैर्य और विजय निश्चित रूप से मिलती है। यह भक्त को एक संपूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान करता है, सभी प्रकार की भौतिक और आध्यात्मिक बाधाओं को दूर करता है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु-नाश और पूर्ण सुरक्षा: देवी काली के उग्र रूप शत्रुओं का नाश करते हैं और भक्त को सभी प्रकार के खतरों से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं।
- धन, संतान और गृह-सौख्य: स्तोत्र के नियमित पाठ से परिवार में समृद्धि, संतान सुख और घर में सामंजस्य स्थापित होता है।
- मंत्र-शक्ति और आध्यात्मिक सिद्धियाँ: बीजमंत्रों के प्रभाव से मंत्र शक्ति बढ़ती है, काव्य रचना क्षमता, शिक्षा में सफलता और आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
- शारीरिक-मानसिक शक्ति और धैर्य: शरीर और मन की शक्ति बढ़ती है, भय दूर होता है और साहस तथा आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
- परिवार और कुल की सुरक्षा: कुल की वृद्धि, परिवार की सुरक्षा और सामाजिक स्थिति में सुधार होता है, संतान को संरक्षण प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री काळिका अर्गळ स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री काळिका अर्गळ स्तोत्रं के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री काळिका अर्गळ स्तोत्रं का उद्गम क्या है?
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