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श्री काळी स्तुतिः (ब्रह्म कृतं)

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स्तोत्र
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श्री काळी स्तुतिः (ब्रह्म कृतं)

नमामि कृष्णरूपिणीं कृष्णांगयष्टिधारिणीं |
समग्रतत्त्वसागरं अपारपारगह्वरां || 1 ||

शिवाप्रभां समुज्ज्वलां स्फुरच्छशांकशेखरां |
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रदीप्तिभास्करां || 2 ||

महेंद्रकश्यपार्चितां सनत्कुमारसंस्तुतां |
सुरासुरेंद्रवंदितां यथार्थनिर्मलाद्भुतां || 3 ||

अतर्क्यरोचिरूर्जितां विकारदोषवर्जितां |
मुमुक्षुभिर्विचिंतितां विशेषतत्त्वसूचितां || 4 ||

मृतास्थिनिर्मितस्रजां मृगेंद्रवाहनाग्रजां |
सुशुद्धतत्त्वतोषणां त्रिवेदपारभूषणां || 5 ||

भुजंगहारहारिणीं कपालखंडधारिणीं |
सुधार्मिकौपकारिणीं सुरेंद्रवैरिघातिनीं || 6 ||

कुठारपाशचापिनीं कृतांतकामभेदिनीं |
शुभां कपालमालिनीं सुवर्णकल्पशाखिनीं || 7 ||

श्मशानभूमिवासिनीं द्विजेंद्रमौळिभाविनीं |
तमोऽंधकारयामिनीं शिवस्वभावकामिनीं || 8 ||

सहस्रसूर्यराजिकां धनंजयोग्रकारिकां |
सुशुद्धकालकंदलां सुभृंगबृंदमंजुलां || 9 ||

प्रजायिनीं प्रजावतीं नमामि मातरं सतीं |
स्वकर्मकारणे गतिं हरप्रियां च पार्वतीं || 10 ||

अनंतशक्तिकांतिदां यशोऽर्थभुक्तिमुक्तिदां |
पुनः पुनर्जगद्धितां नमाम्यहं सुरार्चितां || 11 ||

जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवि पाहि मां |
जयंति ते स्तुवंति ये शुभं लभंत्यमोक्षतः || 12 ||

सदैव ते हतद्विषः परं भवंति सज्जुषः |
जराः परे शिवेऽधुना प्रसाधि मां करोमि किं || 13 ||

अतीव मोहितात्मनो वृथा विचेष्टितस्य मे |
कुरु प्रसादितं मनो यथास्मि जन्मभंजनः || 14 ||

तथा भवंतु तावका यथैव घोषितालकाः |
इमां स्तुतिं ममेरितां पठंति काळिसाधकाः |
न ते पुनः सुदुस्तरे पतंति मोहगह्वरे || 15 ||

इति काळीरहस्ये ब्रह्म कृत श्री काळी स्तुतिः ||

अर्थ

ब्रह्मा द्वारा रचित इस श्री काली स्तुति में, संपूर्ण ब्रह्मांड के निर्माता भगवान ब्रह्मा, महादेवी काली की अनंत महिमा, अद्भुत शक्ति और परम तत्व की गहरी भक्ति के साथ स्तुति करते हैं। देवी काली कृष्णरूपिणी हैं, अर्थात् गहरे काले रंग वाली, जो असीम तत्व सागर का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह अपार, अतींद्रिय परब्रह्म स्वरूपिणी हैं, जिनमें कोई लक्षण नहीं है और जो अनंत गहराई वाली हैं। उनका रूप सृष्टि, स्थिति और लय से परे परम सत्य को दर्शाता है। शिव की प्रभा को धारण करती हुई, चंद्रमा के समान चमकता उनका मुख, ललाट में रत्नजड़ित मुकुट के साथ पूरे जगत को प्रकाशित करने वाले सूर्य के समान दीप्तिमान है। उनकी दिव्य ज्योति अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करती है।

महेंद्र, कश्यप, सनत्कुमार जैसे महर्षि और देवता निरंतर उनकी पूजा करते हैं। देवताओं और असुरों के अधिपति भी उन्हें नमन करते हैं, उनका स्वरूप पवित्र और निर्मल है। वह मन से अगोचर, तर्क से परे अद्भुत प्रकाश से युक्त हैं। किसी भी विकार या दोष से मुक्त, वह शुद्ध चैतन्य स्वरूपिणी हैं। मोक्ष की कामना रखने वाले मुमुक्षुओं को वह परम सत्य का मार्ग दिखाने वाली तत्वसार रूपिणी हैं। वह मृत अस्थियों से बनी मालाएं धारण करती हैं, सिंहवाहिनी हैं और सभी जीवों पर अपने अधिकार का प्रदर्शन करती हैं। तीनों वेदों का सार ही उनका आभूषण है, जो शुद्ध तत्व का आनंद प्रदान करता है। वह सर्पों को हार के रूप में धारण करती हैं, कपालों को आभूषण बनाती हैं, धर्म की रक्षा करती हैं और असुरों का नाश करती हैं।

देवी काली अपने हाथों में कुल्हाड़ी, पाश और धनुष धारण करती हैं। ये भक्तों की रक्षा करने और उनके कर्म बंधनों को तोड़ने की शक्ति के प्रतीक हैं। वह कपाल माला धारण करती हैं, श्मशान भूमि में निवास करती हैं और अंधकार को दूर करती हैं। शिव को अत्यंत प्रिय होने के कारण, वह जीवन और मृत्यु पर पूर्ण transcendence का प्रतिनिधित्व करती हैं। हजार सूर्यों की चमक के समान उनकी प्रभा योग शक्ति को प्रकाशित करती है। उनका दिव्य रूप सुगंधित पुष्पों के समान आकर्षक है और भक्तों के हृदय को सुंदर भ्रमरों की तरह अपनी ओर आकर्षित करता है। सभी प्राणियों की सृष्टि, पोषण और उनके कर्मफल के अनुसार गति का निर्धारण करने की शक्ति उन्हीं की है।

पार्वती के रूप में, हरप्रिया के रूप में, वह अनेक शक्तियों के माध्यम से ब्रह्मांड को आगे बढ़ाती हैं। वह अनंत शक्ति, कांति, यश, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली अवतारिणी हैं। इस स्तुति का भक्तिपूर्वक पाठ करने वाले शुभ फल प्राप्त करते हैं। उनके शत्रु निर्दयतापूर्वक नष्ट हो जाते हैं। भक्त सभी खतरों से सुरक्षित रहते हैं और बुढ़ापे का भय दूर हो जाता है। भक्तों का मोह, संदेह और अज्ञान दूर हो जाता है, और मन शिव तत्व के साथ एकाकार हो जाता है। इस स्तुति का जप करने वाले काली साधक मोह नामक अत्यंत खतरनाक अंधकूप में कभी नहीं पड़ते। देवी उनकी रक्षा करती हैं और परम मंगलमय मार्ग पर ले जाती हैं।

लाभ (Benefits):

  • भय और अज्ञान का नाश: इस स्तुति के नियमित पाठ से भय, मोह और अज्ञान पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं, मन को शांति और स्पष्टता मिलती है।
  • शत्रुओं का विनाश और सुरक्षा: भक्तों के शत्रु नष्ट हो जाते हैं और सभी प्रकार के खतरों, बुरी शक्तियों से रक्षा मिलती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: मोक्ष चाहने वालों के लिए यह परम तत्व का संकेत देती है और मन को शिव तत्व के साथ एकाकार करने में मदद करती है।
  • ऐश्वर्य और सफलता: देवी काली भक्तों को अनंत शक्ति, कांति, यश, भोग और मोक्ष प्रदान करती हैं, जिससे जीवन में समृद्धि बढ़ती है।
  • कर्मबंधनों से मुक्ति: देवी अपने आयुधों से भक्तों के कर्मबंधनों को तोड़कर उन्हें संसार चक्र से मुक्त करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री काली स्तुति (ब्रह्म कृतं) क्या है?
यह भगवान ब्रह्मा द्वारा रचित एक पवित्र स्तोत्र है, जो महादेवी काली के अनंत रूपों, शक्ति और महिमा का वर्णन करता है। यह देवी के परम तत्व को गहराई से समझाता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन, विशेष रूप से काली पूजा, नवरात्रि के दौरान या जब भी बाधाओं को दूर करना चाहते हों, भक्तिपूर्वक किया जा सकता है। शुद्ध मन और एकाग्रता के साथ पाठ करना सर्वोत्तम है।
श्री काली स्तुति के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तुति के पाठ से भय, मोह और अज्ञान दूर होता है, शत्रु नष्ट होते हैं, खतरों से रक्षा मिलती है, आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह ऐश्वर्य और सफलता भी प्रदान करती है।
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
देवी दुर्गा या काली के भक्तों को, जीवन में सुरक्षा, आध्यात्मिक मुक्ति, शक्ति या चुनौतियों का सामना करने की इच्छा रखने वालों को इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ एक, 3, 11, 108 बार या अपनी दैनिक साधना के हिस्से के रूप में गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार किया जा सकता है। भक्ति ही मुख्य है।
इस स्तोत्र का मूल या स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र भगवान ब्रह्मा द्वारा स्वयं रचित है, जैसा कि 'ब्रह्म कृतं' (ब्रह्मा द्वारा रचित) शब्द से इंगित होता है। यह विभिन्न पौराणिक ग्रंथों में पाया जाता है।

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