का

श्री काळी कवचं (त्रैलोक्यविजयं)

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री काळी कवचं (त्रैलोक्यविजयं)

श्रीसदाशिव उवाच |
त्रैलोक्यविजयस्यास्य कवचस्य ऋषिः शिवः |
छंदोऽनुष्टुब्देवता च आद्याकाळी प्रकीर्तिता || 1 ||

मायाबीजं बीजमिति रमा शक्तिरुदाहृता |
क्रीं कीलकं काम्यसिद्धौ विनियोगः प्रकीर्तितः || 2 ||

अथ कवचं |
ह्रीमाद्या मे शिरः पातु श्रीं काळी वदनं मम |
हृदयं क्रीं परा शक्तिः पायात्कंठं परात्परा || 3 ||

नेत्रे पातु जगद्धात्री कर्णौ रक्षतु शंकरी |
घ्राणं पातु महामाया रसनां सर्वमंगळा || 4 ||

दंतान् रक्षतु कौमारी कपोलौ कमलालया |
ओष्ठाधरौ क्षमा रक्षेच्चिबुकं चारुहासिनी || 5 ||

ग्रीवां पायात्कुलेशानी ककुत्पातु कृपामयी |
द्वौ बाहू बाहुदा रक्षेत्करौ कैवल्यदायिनी || 6 ||

स्कंधौ कपर्दिनी पातु पृष्ठं त्रैलोक्यतारिणी |
पार्श्वे पायादपर्णा मे कटिं मे कमठासना || 7 ||

नाभौ पातु विशालाक्षी प्रजास्थानं प्रभावती |
ऊरू रक्षतु कल्याणी पादौ मे पातु पार्वती || 8 ||

जयदुर्गाऽवतु प्राणान् सर्वांगं सर्वसिद्धिदा |
रक्षाहीनं तु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन च || 9 ||

तत्सर्वं मे सदा रक्षेदाद्याकाळी सनातनी |
इति ते कथितं दिव्यं त्रैलोक्यविजयाभिधं || 10 ||

कवचं काळिकादेव्या आद्यायाः परमाद्भुतं |
पूजाकाले पठेद्यस्तु आद्याधिकृतमानसः || 11 ||

सर्वान् कामानवाप्नोति तस्याद्याशु प्रसीदति |
मंत्रसिद्धिर्भवेदाशु किंकराः क्षुद्रसिद्धयः || 12 ||

अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी प्राप्नुयाद्धनं |
विद्यार्थी लभते विद्यां कामी कामानवाप्नुयात् || 13 ||

सहस्रावृत्तपाठेन वर्मणोऽस्य पुरस्क्रिया |
पुरश्चरणसंपन्नं यथोक्तफलदं भवेत् || 14 ||

चंदनागरुकस्तूरीकुंकुमै रक्तचंदनैः |
भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद्यदि || 15 ||

शिखायां दक्षिणे बाहौ कंठे वा साधकः कटौ |
तस्याद्या काळिका वश्या वांछितार्थं प्रयच्छति || 16 ||

न कुत्रापि भयं तस्य सर्वत्र विजयी कविः |
अरोगी चिरजीवी स्याद्बलवान् धारणक्षमः || 17 ||

सर्वविद्यासु निपुणः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् |
वशे तस्य महीपाला भोगमोक्षौ करस्थितौ || 18 ||

इति महानिर्वाणतंत्रे सप्तमोल्लासे त्रैलोक्यविजयकवचं नाम श्री काळिका कवचं |

अर्थ

श्री काली कवच (त्रैलोक्यविजयं) भगवती आद्या कालिका का परम रक्षक, शत्रुनाशक और विजयप्रदायक तांत्रिक कवच है। स्वयं भगवान शिव ने इस दिव्य कवच को महेश्वरी के लिए प्रकट करते हुए कहा है कि इसे पाठ करने वाले भक्तों को तीनों लोकों पर विजय, संपूर्ण सुरक्षा, समस्त संपदाएं और मंत्र सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इस कवच के ऋषि शिव, छंद अनुष्टुप, देवता आद्या काली, बीज माया बीज (ह्रीं), शक्ति रमा (श्रीं), और कीलक क्रीं के रूप में वर्णित हैं। ये सभी माँ आद्याशक्ति के परम तत्व को दर्शाते हैं—जिसमें मायाशक्ति, चंद्रशक्ति और कामशक्ति—ये सभी काली के सर्वोच्च रूप में समाहित हैं।

यह कवच विस्तार से बताता है कि कैसे भक्त के शरीर के प्रत्येक अंग को काली के विभिन्न रूप और मातृ देवियाँ रक्षा प्रदान करती हैं। 'ह्रीं' कालिका देवी सिर की रक्षा करती हैं, जबकि 'श्रीं' काली देवी मुख की रक्षा करती हैं। 'क्रीं' पराशक्ति हृदय की रक्षा करती हैं, और परात्परा देवी कंठ का संरक्षण करती हैं। जगद्धात्री नेत्रों की, शंकरी कानों की, महामाया घ्राण (नाक) की, और सर्वमंगला रसना (जिह्वा) की रक्षा करती हैं। ये सभी भक्त की इंद्रियों और बुद्धि की रक्षा करने वाले प्रमुख पहलू हैं। कौमारी देवी दांतों की, कमलालया कपोलों (गालों) की, क्षमा देवी होंठों की और चारुहासिनी देवी ठोड़ी की रक्षा करती हैं।

यह कवच स्पष्ट करता है कि शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा अष्टमातृकाएँ, शिवशक्तियाँ और पराशक्तियाँ करती हैं। कुलेशानी गर्दन की, कृपामयी कंधों की, बाहुदा भुजाओं की, कैवल्यदायिनी हाथों की रक्षा करती हैं। कपरदिनी कंधों की, त्रैलोक्यतारिणी पीठ की, अपर्णा पार्श्वों की, और कमठासना कमर की रक्षा करती हैं। विशालाक्षी नाभि की, प्रभावती प्रजास्थान (गुप्त अंगों) की, कल्याणी जांघों की और पार्वती पैरों की रक्षा करती हैं। जयदुर्गा देवी पूरे शरीर को व्यापक सुरक्षा प्रदान करती हैं। कवच यह भी कहता है कि यदि किसी भी भाग की सुरक्षा में कोई कमी रह जाती है, तो आद्या काली देवी स्वयं उस कमी को पूरा करके पूर्ण सुरक्षा प्रदान करती हैं।

इस दिव्य कवच का पूजा काल में भक्तिपूर्वक पाठ करने वाले भक्त माँ आद्या काली की कृपा से सभी मनोकामनाओं को सिद्ध करते हैं। मंत्र सिद्धियाँ, किंकर सिद्धियाँ और क्षुद्र सिद्धियाँ—ये सभी सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। विद्यार्थी विद्या, धनार्थी धन, पुत्रार्थी पुत्र लाभ, और शासक राज्य तथा कीर्ति काली की कृपा से प्राप्त करते हैं। भोजपत्र पर चंदन, अगरु, कस्तूरी, कुमकुम और रक्तचंदन से लिखकर इसे धारण करने से आद्या काली देवी वश में हो जाती हैं और सभी भय पूरी तरह से दूर हो जाते हैं। सिर पर, भुजाओं पर, कंठ में या कमर पर धारण करने वाले अनिवार्य विजय प्राप्त करते हैं। इस कवच के पाठ से विजय, आयु, आरोग्य, बल, शास्त्र ज्ञान, राजाधीनम (राजसी प्रभाव), भोग और मोक्ष की प्राप्ति सहज हो जाती है। आद्या काली का यह त्रैलोक्यविजय कवच भक्त के जीवन को पूर्ण रूप से सुरक्षा कवच से आवृत्त कर शत्रुओं पर अपार विजय प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • त्रैलोक्य विजय: इस कवच के पाठ से भक्तों को सभी दिशाओं में, तीनों लोकों (पृथ्वी, आकाश, पाताल) में पूर्ण सुरक्षा और विजय प्राप्त होती है। यह जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता लाता है।
  • शत्रुनाश और अघात निवारण: शत्रुओं से होने वाली बाधाएं, परेशानियां और सभी प्रकार के अघात (दुर्भाग्य, आपदाएं) इस कवच के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं और उनका निवारण होता है।
  • धन, विद्या और पुत्र लाभ: माँ काली की कृपा से भक्तों को समृद्धि, ज्ञान और संतान की प्राप्ति होती है। आर्थिक स्थिति में सुधार होता है, उत्तम शिक्षा मिलती है और सुपुत्र का योग बनता है।
  • आयु, आरोग्य और बल: इस कवच का पाठ दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और शारीरिक तथा मानसिक बल प्रदान करता है। यह रोगों से मुक्ति दिलाता है और जीवन में स्फूर्ति भरता है।
  • भोग और मोक्ष की प्राप्ति: यह कवच केवल लौकिक लाभ ही नहीं, बल्कि भोग (सांसारिक सुख) और अंततः मोक्ष (जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति) दोनों को प्रदान करने की क्षमता रखता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री काली कवच (त्रैलोक्यविजयं) क्या है?
यह आद्या कालिका देवी का परम रक्षक और विजयप्रदायक तांत्रिक स्तोत्र है, जिसे स्वयं भगवान शिव ने महेश्वरी के लिए प्रकट किया है। इसके पाठ से त्रिलोक विजय, शत्रुनाश और सभी संपदाएं प्राप्त होती हैं।
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ विशेष रूप से पूजा के समय या प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से करना चाहिए। माँ काली के ध्यान के साथ श्रद्धापूर्वक पाठ करने से उत्तम फल प्राप्त होता है।
श्री काली कवच के पाठ से क्या मुख्य लाभ मिलते हैं?
इसके पाठ से त्रिलोक विजय, शत्रुनाश, धन-विद्या-पुत्र लाभ, आयु, आरोग्य, बल, मंत्र सिद्धियां और अंततः भोग-मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह सभी प्रकार के भयों से मुक्ति दिलाता है।
इस कवच का पाठ कौन कर सकता है?
माँ काली के भक्त, जीवन में बाधाओं का सामना करने वाले, शत्रुओं से परेशान लोग, धन, ज्ञान या संतान की इच्छा रखने वाले और आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले इस कवच का पाठ कर सकते हैं।
श्री काली कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः प्रतिदिन एक या तीन बार पाठ करना शुभ माना जाता है। विशेष सिद्धियों के लिए 11, 21, 51 या 108 बार पाठ किया जा सकता है। भक्ति के साथ नियमित पाठ करना महत्वपूर्ण है।
इस कवच का मूल या उद्गम क्या है?
यह कवच स्वयं सदाशिव ने महेश्वरी के लिए प्रकट किया है। यह तंत्र शास्त्र का एक हिस्सा है और भगवती आद्या काली की महिमा का बखान करता है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...