श्री काळी कर्पूर स्तोत्रं
कर्पूरं मध्यमांत्य स्वरपररहितं सेंदुवामाक्षियुक्तं
बीजं ते मातरेतत्त्रिपुरहरवधु त्रिःकृतं ये जपंति |
तेषां गद्यानि पद्यानि च मुखकुहरादुल्लसंत्येव वाचः
स्वच्छंदं ध्वांतधाराधररुचिरुचिरे सर्वसिद्धिं गतानां || 1 ||
ईशानः सेंदुवामश्रवणपरिगतो बीजमन्यन्महेशि
द्वंद्वं ते मंदचेता यदि जपति जनो वारमेकं कदाचित् |
जित्वा वाचामधीशं धनदमपि चिरं मोहयन्नंबुजाक्षि
वृंदं चंद्रार्धचूडे प्रभवति स महाघोरबाणावतंसे || 2 ||
ईशो वैश्वानरस्थः शशधरविलसद्वामनेत्रेण युक्तो
बीजं ते द्वंद्वमन्यद्विगळितचिकुरे काळिके ये जपंति |
द्वेष्टारं घ्नंति ते च त्रिभुवनमपि ते वश्यभावं नयंति
सृक्कद्वंद्वास्रधाराद्वयधरवदने दक्षिणे काळिकेति || 3 ||
ऊर्ध्वे वामे कृपाणं करकमलतले छिन्नमुंडं तथोऽधः
सव्येऽभीतिं वरं च त्रिजगदघहरे दक्षिणे काळिके च |
जप्त्वैतन्नाम ये वा तव विमलतनुं भावयंत्येतदंब
तेषामष्टौ करस्थाः प्रकटितरदने सिद्धयस्त्र्यंबकस्य || 4 ||
वर्गाद्यं वह्निसंस्थं विधुरतिवलितं तत्त्रयं कूर्चयुग्मं
लज्जाद्वंद्वं च पश्चात् स्मितमुखितदधष्ठद्वयंयोजयित्वा |
मातर्ये त्वां जपंति स्मरहरमहिळे भावयंतः स्वरूपं
ते लक्ष्मीलास्यलीलाकमलदळदृशः कामरूपा भवंति || 5 ||
प्रत्येकं वा द्वयं वा त्रयमपि च परं बीजमत्यंतगुह्यं
त्वन्नाम्ना योजयित्वा सकलमपि सदा भावयंतो जपंति |
तेषां नेत्रारविंदे विहरति कमला वक्त्रशुभ्रांशुबिंबे
वाग्देवी देवि मुंडस्रगतिशयलसत्कंठ पीनस्तनाढ्ये || 6 ||
गतासूनां बाहुप्रकरकृतकांचीपरिलस-
-न्नितंबां दिग्वस्त्रां त्रिभुवनविधात्रीं त्रिनयनां |
श्मशानस्थे तल्पे शवहृदि महाकालसुरत-
-प्रसक्तां त्वां ध्यायन् जननि जडचेता अपि कविः || 7 ||
शिवाभिर्घोराभिः शवनिवहमुंडाऽस्थि निकरैः
परं संकीर्णायां प्रकटितचितायां हरवधूं |
प्रविष्टां संतुष्टामुपरिसुरतेनाति युवती
सदा त्वां ध्यायंति क्वचिदपि न तेषां परिभवः || 8 ||
वदामस्ते किं वा जननि वयमुच्चैर्जडधियो
न धाता नापीशो हरिरपि न ते वेत्ति परमं |
तथापि त्वद्भक्तिर्मुखरयति चास्माकमसिते
तदेतत् क्षंतव्यं न खलु पशुरोषः समुचितः || 9 ||
समंतादापीनस्तनजघनदृग्यौवनवती
रतासक्तो नक्तं यदि जपति भक्तस्तव मनुं |
विवासास्त्वां ध्यायन् गलितचिकुरस्तस्य वशगाः
समस्ताः सिद्धौघा भुवि चिरतरं जीवति कविः || 10 ||
समाः स्वस्थीभूतां जपति विपरीतां यदि सदा
विचिंत्य त्वां ध्यायन्नतिशयमहाकालसुरतां |
तदा तस्य क्षोणीतलविहरमाणस्य विदुषः
करांभोजे वश्या हरवधु महासिद्धि निवहाः || 11 ||
प्रसूते संसारं जननि जगतीं पालयति च
समस्तं क्षित्यादि प्रळयसमये संहरति च |
अतस्त्वां धाताऽपि त्रिभुवनपतिः श्रीपतिरपि
महेशोऽपि प्रायः सकलमपि किं स्तौमि भवतीं || 12 ||
अनेके सेवंते भवदधिकगीर्वाणनिवहान्
विमूढास्ते मातः किमपि न हि जानंति परमं |
समाराध्यामाद्यां हरिहरविरिंच्यादिविबुधैः
प्रपन्नोऽस्मि स्वैरं रतिरसमहानंदनिरतां || 13 ||
धरित्री कीलालं शुचिरपि समीरोऽपि गगनं
त्वमेका कल्याणी गिरिशरमणी काळि सकलं |
स्तुतिः का ते मातस्तव करुणया मामगतिकं
प्रसन्ना त्वं भूया भवमननुभूयान्मम जनुः || 14 ||
श्मशानस्थः सुस्थो गलितचिकुरो दिक्पटधरः
सहस्रं त्वर्काणां निजगलितवीर्येण कुसुमं |
जपंस्त्वत् प्रत्येकं मनुमपि तव ध्याननिरतो
महाकाळि स्वैरं स भवति धरित्री परिवृढः || 15 ||
गृहे सम्मार्जन्या परिगळित वीर्यं हि चिकुरं
समूलं मध्याह्ने वितरति चितायां कुजदिने |
समुच्चार्य प्रेम्णा मनुमपि सकृत् काळि सततं
गजारूढो याति क्षितिपरिवृढः सत्कविवरः || 16 ||
सुपुष्पैराकीर्णं कुसुमधनुषोमंदिरमहो
पुरो ध्यायन् ध्यायन् यदि जपति भक्तस्तव मनुं |
सगंधर्वश्रेणीपतिरपि कवित्वामृतनदी
नदीनः पर्यंते परमपदलीनः प्रभवति || 17 ||
त्रिपंचारे पीठे शवशिवहृदि स्मेरवदनां
महाकालेनोच्चैर्मदनरसलावण्यनिरतां |
समासक्तो नक्तं स्वयमपि रतानंदनिरतो
जनो यो ध्यायेत्त्वां जननि किल सस्यात् स्मरहरः || 18 ||
सलोमास्थि स्वैरं पललमपि मार्जारमसिते
परं चौष्ट्रं मैषं नरमहिषयोश्छागमपि वा |
बलिं ते पूजायामपि वितरतां मर्त्यवसतां
सतां सिद्धिः सर्वा प्रतिपदमपूर्वा प्रभवति || 19 ||
वशी लक्षं मंत्रं प्रजपति हविष्याशनरतो
दिवा मातर्युष्मच्चरणयुगळ ध्यान निपुणः |
परं नक्तं नग्नो निधुवन विनोदेन च मनुं
जपेल्लक्षं सम्यक् स्मरहरसमानः क्षितितले || 20 ||
इदं स्तोत्रं मातस्तव मनुसमुद्धारण जनुः
स्वरूपाख्यं पादांबुजयुगळपूजाविधियुतं |
निशार्धे वा पूजासमयमधि वा यस्तु पठति
प्रलापस्तस्यापि प्रसरति कवित्वामृतरसः || 21 ||
कुरंगाक्षीबृंदं तमनुसरति प्रेमतरळं
वशस्तस्य क्षोणीपतिरपि कुबेरप्रतिनिधिः |
रिपुः कारागारं कलयति च तं केळिकलया
चिरं जीवन्मुक्तः स भवति च भक्तः प्रतिजनुः || 22 ||
इति श्रीमहाकालविरचितं श्री काळी कर्पूर स्तोत्रं |
अर्थ
श्री काली कर्पूर स्तोत्रम माँ महाकाली की शुद्धता, रक्षा और शक्ति प्रदायिनी प्रकृति का गुणगान करने वाला एक दिव्य और तांत्रिक स्तोत्र है। यह स्तोत्र माँ काली के भयंकर और साथ ही करुणामयी स्वरूप का चित्रण करता है, जो अज्ञान का नाश करने वाली और भक्तों को काव्य, भौतिक तथा आध्यात्मिक वरदान प्रदान करने वाली देवी हैं। प्रत्येक श्लोक माँ के दिव्य गुणों और उनकी अगाध शक्ति को उजागर करता है, कर्पूर के समान पवित्र और श्मशान भूमि में स्थित देवी का अद्भुत वर्णन करता है।
यह स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि बीजाक्षरों की शक्ति और ध्यान के परिवर्तनकारी प्रभाव को भी दर्शाता है। ऐसा माना जाता है कि जो भक्त माँ के स्वरूप का ध्यान करते हैं, यहाँ तक कि उनके सबसे भयंकर रूप का भी, वे वाक्पटुता, रचनात्मक प्रेरणा, चुंबकीय प्रभाव और अंततः मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यह भक्ति और सूक्ष्म तांत्रिक साधना का एक अनूठा संगम है, जो मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है।
स्तोत्र के पहले श्लोक में, “कर्पूरं मध्यमांत्य स्वरणपररहितं सेन्दुवामाक्षियुक्तं” नामक बीजाक्षर का जप करने वालों को गद्य और पद्य में धाराप्रवाह बोलने की क्षमता प्राप्त होती है। यह काली के कर्पूर के समान शुद्ध, फिर भी श्मशान भूमि के भयावह दृश्यों के बीच स्थित स्वरूप को इंगित करता है। दूसरे श्लोक में वर्णित 'ईशानः सेन्दुवामश्रवणपरिगतो' बीज का जप करने वाले व्यक्ति वाक्पति और कुबेर को भी मोहित करने की शक्ति प्राप्त करते हैं। ये विवरण माँ काली के विभिन्न रूपों और उनके गहरे आध्यात्मिक अर्थ को स्पष्ट करते हैं।
तीसरे श्लोक में कहा गया है कि 'ईशो वैश्वानरस्थः शशधरविलसद्वामनेत्रेण युक्तो' बीज का जप करने वाले अपने शत्रुओं का नाश करते हैं और तीनों लोकों को अपने वश में कर लेते हैं। माँ का विकराल रूप, रक्त से सने होंठ और मुंडमाला धारण किए हुए उनकी छवि अज्ञान और बुरी शक्तियों के विनाश का प्रतीक है। इस स्तोत्र के माध्यम से, भक्त माँ की दिव्य शक्ति का आह्वान कर सकते हैं, अपने जीवन की बाधाओं को दूर कर सकते हैं और आध्यात्मिक रूप से उच्च स्थान प्राप्त कर सकते हैं।
श्री काली कर्पूर स्तोत्रम माँ काली के पवित्र स्वरूप, उनकी सुरक्षात्मक शक्ति और रचनात्मक प्रेरणा का वर्णन करने वाला एक दिव्य मंत्र है। यह भक्ति और तांत्रिक साधना के समन्वय से भक्तों को लौकिक और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है। इस स्तोत्र का निरंतर पाठ और ध्यान जीवन में समृद्धि, सुरक्षा, निर्भयता और वाक् सिद्धि लाता है, साथ ही अंततः मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु नाश और सुरक्षा: इस स्तोत्र के पाठ से शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा मिलती है। माँ काली दुष्ट शक्तियों का नाश कर भक्तों को सुरक्षा प्रदान करती हैं और जीवन की बाधाओं को दूर करती हैं।
- धन, यश और कलात्मक प्रेरणा: स्तोत्र का नियमित पाठ धन, प्रसिद्धि और काव्य, साहित्य तथा वाक्पटुता जैसे कलात्मक क्षेत्रों में अद्भुत प्रेरणा प्रदान करता है। भक्त अपनी रचनात्मक क्षमताओं को बढ़ाते हैं।
- निर्भयता और साहस: यह श्मशान जैसे भयानक स्थानों में भी भयमुक्त रहने की शक्ति प्रदान करता है। जीवन की किसी भी चुनौती का साहस से सामना करने में सहायता करता है और मानसिक दृढ़ता को बढ़ाता है।
- मंत्र शक्ति में वृद्धि और सिद्धियों की प्राप्ति: बीज मंत्रों की शक्ति को बढ़ाता है और मंत्र सिद्धियों तथा चुंबकीय प्रभाव को प्राप्त करने में सहायक होता है। यह भक्तों की आध्यात्मिक साधनाओं को सशक्त बनाता है।
- आध्यात्मिक शुद्धि और आंतरिक शक्ति: यह आत्मा को शुद्ध करता है, मन को शांति और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है। अंततः, यह मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करता है और अज्ञान को दूर करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री काली कर्पूर स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री काली कर्पूर स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
किसे इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री काली कर्पूर स्तोत्रं का उद्गम क्या है?
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