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श्री हयग्रीवाष्टकं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री हयग्रीवाष्टकं

हयाननं हयग्रीवं हारनूपुरशोभितं |
पीतांबरधरं देवं हयग्रीवमुपास्महे || 1 ||

कुंदेंदुशंखधवळं पद्मपत्रनिभेक्षणं |
शंखचक्रधरं देवं हयग्रीवमुपास्महे || 2 ||

मुक्तादामसमायुक्तं नेमिकोटिसमप्रभं |
रत्नकुंडलकेयूरं हयग्रीवमुपास्महे || 3 ||

शेषासन समासीनं लक्ष्मीनीलासमन्वितं |
श्रीवत्सकौस्तुभधरं हयग्रीवमुपास्महे || 4 ||

योगासनसमासीनं वेदशास्त्रसमन्वितं |
सर्ववेदांततत्त्वज्ञं हयग्रीवमुपास्महे || 5 ||

श्वेतवर्णं चतुर्बाहुं वैजयंतीविराजितं |
सर्वाभरणसंयुक्तं हयग्रीवमुपास्महे || 6 ||

मणिपीठसमासीनं मकुटोज्ज्वलमंडितं |
मुक्ताहारधरं देवं हयग्रीवमुपास्महे || 7 ||

ब्रह्मांडकोटिगर्भस्थं मंदहाससुशोभितं |
सर्वविद्याप्रदं देवं हयग्रीवमुपास्महे || 8 ||

हयग्रीवाष्टकं पुण्यं ये जनाः समुपासते |
आयुर्वृद्धिः बलं धैर्यं विद्याबुद्धिसुखप्रदं || 9 ||

आप्नयुः सकलान् कामान् सर्वत्र विजयं शुभं |
सर्वपापप्रशमनं हयग्रीवप्रभावतः || 10 ||

इति श्री हयग्रीवाष्टकं ||

अर्थ

श्री हयग्रीवाष्टकम् भगवान हयग्रीव को समर्पित एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। भगवान हयग्रीव ज्ञान, बुद्धि, स्मृति और विद्या के साक्षात् स्वरूप हैं। वेदों, शास्त्रों, शिक्षा और मेधा के मूल स्रोत के रूप में, वे ज्ञान के सर्वोच्च देवता माने जाते हैं। यह अष्टक उनके दिव्य रूप के प्रत्येक अंग का, और उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली ज्ञान, शक्ति और साहस का सुंदर वर्णन करता है। यह विशेष रूप से छात्रों, शिक्षकों और ज्ञान के साधकों के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली प्रार्थना है, जो अज्ञान को दूर कर ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करती है।

स्तोत्र के पहले श्लोक में, भक्त पीतांबर धारण किए हुए, हार, नूपुर और दिव्य आभूषणों से सुशोभित, अश्वमुख वाले हयग्रीव का ध्यान करते हुए उनकी स्तुति करता है। उनका यह रूप शांति, पवित्रता और ज्ञान के दिव्य प्रकाश का प्रसार करता है। अगले श्लोक में, कुंद पुष्प, चंद्रमा और शंख के समान श्वेत कांति वाले हयग्रीव कमल दल के समान विशाल और सौम्य नेत्रों से सुशोभित होते हैं। शंख और चक्र धारण कर, वे भक्तों के रक्षक के रूप में खड़े होते हैं, अज्ञान का नाश कर ज्ञान प्रदान करते हैं। तीसरे श्लोक में, उन्हें मोतियों की मालाओं से सुसज्जित और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी बताया गया है। रत्नजड़ित कुंडल और बाजूबंद उनके दिव्य सौंदर्य को बढ़ाते हैं, जो उनके अस्तित्व की भव्यता को दर्शाता है।

चौथे श्लोक में, शेषनाग के आसन पर देवी लक्ष्मी के साथ विराजमान, श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि धारण किए हुए हयग्रीव समस्त ज्ञान के आश्रयदाता के रूप में भक्तों को शुभ प्रदान करते हैं। भक्त योग मुद्रा में वेदों और शास्त्रों के मध्य बैठे, वेदांत के तत्वों को जानने वाले परम ज्ञान स्वरूप का ध्यान करते हैं। पांचवां श्लोक उनके ज्ञान की गहराई और सर्वज्ञता पर जोर देता है। छठे श्लोक में, श्वेत वर्ण, चार भुजाओं, वैजयंती माला और दिव्य आभूषणों से सुसज्जित, वे मणिपीठ पर विराजमान होकर मुकुट से प्रकाशित होते हैं। उनके मुख पर मंद हास ब्रह्मांड के ज्ञान बीज को समेटे हुए है, जो भक्तों के हृदयों को मोहित करता है।

मोतियों के हार और दिव्य कांतियां उनकी महिमामयता को उजागर करती हैं, उनके अखंड ज्ञान के वैभव को प्रकट करती हैं। अंतिम श्लोकों में, हयग्रीव को ब्रह्मांड के करोड़ों गर्भ में स्थित ज्ञान बीज के समान बताया गया है। उनका कोमल मंद हास भक्तों के हृदयों को बांध लेता है और आध्यात्मिक आनंद प्रदान करता है। वे सर्वविद्याप्रदाता हैं - विद्या, बुद्धि और मेधा प्रदान करने वाले परमेश्वर। फलश्रुति के अनुसार, जो भक्त श्रद्धापूर्वक हयग्रीवाष्टक का पाठ करते हैं, उन्हें आयु, आरोग्य, बल, धैर्य, श्रेष्ठ विद्या, स्मृति, बुद्धि और सुख प्राप्त होता है। उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, उन्हें विजय प्राप्त होती है, और उनके पापों का नाश होता है - यह सब हयग्रीव के दिव्य प्रभाव से होता है।

लाभ (Benefits):

  • विद्या और स्मरण शक्ति में वृद्धि: श्री हयग्रीवाष्टकम् का पाठ करने से छात्रों को उत्तम शिक्षा, ग्रहणशीलता और स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। यह सीखने की प्रक्रिया में एकाग्रता को बढ़ाता है।
  • परीक्षाओं में सफलता: प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं और शैक्षणिक क्षेत्र में उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त करने में सहायक है। यह मानसिक स्पष्टता और आत्मविश्वास प्रदान करता है।
  • स्वास्थ्य और साहस: लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और किसी भी चुनौती का सामना करने का साहस प्रदान करता है। यह नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करता है।
  • ज्ञान और बुद्धि: गहन ज्ञान, विवेक और बुद्धि को बढ़ाता है, जिससे सही निर्णय लेने में मदद मिलती है और आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है।
  • समस्त पापों का नाश और शुभ फल: सभी पापों को नष्ट कर, जीवन में शुभता लाता है और बाधाओं को दूर करता है। भगवान हयग्रीव की दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री हयग्रीवाष्टकम् क्या है?
श्री हयग्रीवाष्टकम् ज्ञान के देवता भगवान हयग्रीव को समर्पित आठ श्लोकों का एक पवित्र स्तोत्र है। यह हयग्रीव के दिव्य रूप, गुणों और उनके द्वारा प्रदान किए जाने वाले ज्ञान के आशीर्वाद का वर्णन करता है।
श्री हयग्रीवाष्टकम् का पाठ कब करना चाहिए?
इस अष्टक का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम को, विशेष रूप से परीक्षाओं या महत्वपूर्ण शैक्षणिक कार्यों से पहले करना शुभ होता है। गुरुवार या पूर्णिमा के दिन पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है।
श्री हयग्रीवाष्टकम् का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इसके पाठ से विद्या, बुद्धि, स्मरण शक्ति, साहस, उत्तम स्वास्थ्य और सफलता प्राप्त होती है। यह अज्ञान को दूर कर मानसिक स्पष्टता और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है।
श्री हयग्रीवाष्टकम् का पाठ किसे करना चाहिए?
छात्रों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, ज्ञान के साधकों और अपनी बुद्धि एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाना चाहने वाले किसी भी व्यक्ति को इसका पाठ करना चाहिए।
श्री हयग्रीवाष्टकम् का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
आमतौर पर, प्रतिदिन कम से कम एक बार पाठ करना उत्तम है। विशेष फलों के लिए, 3, 11, 21, या 108 बार पाठ किया जा सकता है, आपकी श्रद्धा और समय के अनुसार।
भगवान हयग्रीव की उत्पत्ति या महत्व क्या है?
भगवान हयग्रीव विष्णु के एक अवतार हैं, जिनका मुख घोड़े जैसा है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने वेदों को चुराने वाले राक्षसों मधु-कैटभ का वध कर वेदों को वापस लौटाया था, इसलिए उन्हें ज्ञान का रक्षक और प्रदाता माना जाता है।

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