श्री हरि स्तुतिः (हरिमीडे स्तोत्रं)
स्तोष्ये भक्त्या विष्णुमनादिं जगदादिं
यस्मिन्नेतत्संसृतिचक्रं भ्रमतीत्थं |
यस्मिन् दृष्टे नश्यति तत्संसृतिचक्रं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 1 ||
यस्यैकांशादित्थमशेषं जगदेतत्
प्रादुर्भूतं येन पिनद्धं पुनरित्थं |
येन व्याप्तं येन विबुद्धं सुखदुःखै-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 2 ||
सर्वज्ञो यो यश्च हि सर्वः सकलो यो
यश्चानंदोऽनंतगुणो यो गुणधामा |
यश्चाव्यक्तो व्यस्तसमस्तः सदसद्य-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 3 ||
यस्मादन्यन्नास्त्यपि नैवं परमार्थं
दृश्यादन्यो निर्विषयज्ञानमयत्वात् |
ज्ञातृज्ञानज्ञेयविहीनोऽपि सदा ज्ञ-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 4 ||
आचार्येभ्यो लब्धसुसूक्ष्माच्युततत्त्वा
वैराग्येणाभ्यासबलाच्चैव द्रढिम्ना |
भक्त्यैकाग्र्यध्यानपरा यं विदुरीशं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 5 ||
प्राणानायम्योमिति चित्तं हृदि रुद्ध्वा
नान्यत् स्मृत्वा तत्पुनरत्रैव विलाप्य |
क्षीणे चित्ते भादृशिरस्मीति विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 6 ||
यं ब्रह्माख्यं देवमनन्यं परिपूर्णं
हृत्स्थं भक्तैर्लभ्यमजं सूक्ष्ममतर्क्यं |
ध्यात्वात्मस्थं ब्रह्मविदो यं विदुरीशं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 7 ||
मात्रातीतं स्वात्मविकासात्मविबोधं
ज्ञेयातीतं ज्ञानमयं हृद्युपलभ्यं |
भावग्राह्यानंदमनन्यं च विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 8 ||
यद्यद्वेद्यं वस्तुसतत्त्वं विषयाख्यं
तत्तद्ब्रह्मैवेति विदित्वा तदहं च |
ध्यायंत्येवं यं सनकाद्या मुनयोऽजं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 9 ||
यद्यद्वेद्यं तत्तदहं नेति विहाय
स्वात्मज्योतिर्ज्ञानमयानंदमवाप्य |
तस्मिन्नस्मीत्यात्मविदो यं विदुरीशं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 10 ||
हित्वाहित्वा दृश्यमशेषं सविकल्पं
मत्वा शिष्टं भादृशिमात्रं गगनाभं |
त्यक्त्वा देहं यं प्रविशंत्यच्युतभक्ता-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 11 ||
सर्वत्रास्ते सर्वशरीरी न च सर्वः
सर्वं वेत्त्येवेह न यं वेत्ति च सर्वः |
सर्वत्रांतर्यामितयेत्थं यमयन्य-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 12 ||
सर्वं दृष्ट्वा स्वात्मनि युक्त्या जगदेत-
-द्दृष्ट्वात्मानं चैवमजं सर्वजनेषु |
सर्वात्मैकोऽस्मीति विदुर्यं जनहृत्स्थं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 13 ||
सर्वत्रैकः पश्यति जिघ्रत्यथ भुंक्ते
स्प्रष्टा श्रोता बुध्यति चेत्याहुरिमं यं |
साक्षी चास्ते कर्तृषु पश्यन्निति चान्ये
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 14 ||
पश्यन् शृण्वन्नत्र विजानन्रसयन्सं-
-जिघ्रद्बिभ्रद्देहमिमं जीवतयेत्थं |
इत्यात्मानं यं विदुरीशं विषयज्ञं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 15 ||
जाग्रद्दृष्ट्वा स्थूलपदार्थानथ मायां
दृष्ट्वा स्वप्नेऽथापि सुषुप्तौ सुखनिद्रां |
इत्यात्मानं वीक्ष्य मुदास्ते च तुरीये
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 16 ||
पश्यन् शुद्धोऽप्यक्षर एको गुणभेदा-
-न्नानाकारान् स्फाटिकवद्भाति विचित्रः |
भिन्नश्छिन्नश्चायमजः कर्मफलैर्य-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 17 ||
ब्रह्मा विष्णू रुद्रहुताशौ रविचंद्रा-
-विंद्रो वायुर्यज्ञ इतीत्थं परिकल्प्य |
एकं संतं यं बहुधाहुर्मतिभेदा-
-त्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 18 ||
सत्यं ज्ञानं शुद्धमनंतं व्यतिरिक्तं
शांतं गूढं निष्कलमानंदमनन्यं |
इत्याहादौ यं वरुणोऽसौ भृगवेऽजं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 19 ||
कोशानेतान् पंचरसादीनतिहाय
ब्रह्मास्मीति स्वात्मनि निश्चित्य दृशिस्थं |
पित्रा शिष्टो वेद भृगुर्यं यजुरंते
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 20 ||
येनाविष्टो यस्य च शक्त्या यदधीनः
क्षेत्रज्ञोऽयं कारयिता जंतुषु कर्तुः |
कर्ता भोक्तात्मात्र हि यच्छक्त्यधिरूढ-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 21 ||
सृष्ट्वा सर्वं स्वात्मतयैवेत्थमतर्क्यं
व्याप्याथांतः कृत्स्नमिदं सृष्टमशेषं |
सच्च त्यच्चाभूत्परमात्मा स य एक-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 22 ||
वेदांतैश्चाध्यात्मिकशास्त्रैश्च पुराणैः
शास्त्रैश्चान्यैः सात्त्वततंत्रैश्च यमीशं |
दृष्ट्वाथांतश्चेतसि बुद्ध्वा विविशुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 23 ||
श्रद्धाभक्तिध्यानशमाद्यैर्यतमानै-
-र्ज्ञातुं शक्यो देव इहैवाशु य ईशः |
दुर्विज्ञेयो जन्मशतैश्चापि विना तै-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 24 ||
यस्यातर्क्यं स्वात्मविभूतेः परमार्थं
सर्वं खल्वित्यत्र निरुक्तं श्रुतिविद्भिः |
तज्जातित्वादब्धितरंगाभमभिन्नं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 25 ||
दृष्ट्वा गीतास्वक्षरतत्त्वं विधिनाजं
भक्त्या गुर्व्या लभ्य हृदिस्थं दृशिमात्रं |
ध्यात्वा तस्मिन्नस्म्यहमित्यत्र विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 26 ||
क्षेत्रज्ञत्वं प्राप्य विभुः पंचमुखैर्यो
भुंक्तेऽजस्रं भोग्यपदार्थान् प्रकृतिस्थः |
क्षेत्रे क्षेत्रेऽप्स्विंदुवदेको बहुधास्ते
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 27 ||
युक्त्यालोड्य व्यासवचांस्यत्र हि लभ्यः
क्षेत्रक्षेत्रज्ञांतरविद्भिः पुरुषाख्यः |
योऽहं सोऽसौ सोऽस्म्यहमेवेति विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 28 ||
एकीकृत्यानेकशरीरस्थमिमं ज्ञं
यं विज्ञायेहैव स एवाशु भवंति |
यस्मिंल्लीना नेह पुनर्जन्म लभंते
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 29 ||
द्वंद्वैकत्वं यच्च मधुब्राह्मणवाक्यैः
कृत्वा शक्रोपासनमासाद्य विभूत्या |
योऽसौ सोऽहं सोऽस्म्यहमेवेति विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 30 ||
योऽयं देहे चेष्टयिताऽंतःकरणस्थः
सूर्ये चासौ तापयिता सोऽस्म्यहमेव |
इत्यात्मैक्योपासनया यं विदुरीशं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 31 ||
विज्ञानांशो यस्य सतः शक्त्यधिरूढो
बुद्धिर्बुध्यत्यत्र बहिर्बोध्यपदार्थान् |
नैवांतःस्थं बुध्यति यं बोधयितारं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 32 ||
कोऽयं देहे देव इतीत्थं सुविचार्य
ज्ञाता श्रोता मंतयिता चैष हि देवः |
इत्यालोच्य ज्ञांश इहास्मीति विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 33 ||
को ह्येवान्यादात्मनि न स्यादयमेष
ह्येवानंदः प्राणिति चापानिति चेति |
इत्यस्तित्वं वक्त्युपपत्त्या श्रुतिरेषा
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 34 ||
प्राणो वाऽहं वाक्छ्रवणादीनि मनो वा
बुद्धिर्वाहं व्यस्त उताहोऽपि समस्तः |
इत्यालोच्य ज्ञप्तिरिहास्मीति विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 35 ||
नाहं प्राणो नैव शरीरं न मनोऽहं
नाहं बुद्धिर्नाहमहंकारधियौ च |
योऽत्र ज्ञांशः सोऽस्म्यहमेवेति विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 36 ||
सत्तामात्रं केवलविज्ञानमजं स-
-त्सूक्ष्मं नित्यं तत्त्वमसीत्यात्मसुताय |
साम्नामंते प्राह पिता यं विभुमाद्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 37 ||
मूर्तामूर्ते पूर्वमपोह्याथ समाधौ
दृश्यं सर्वं नेति च नेतीति विहाय |
चैतन्यांशे स्वात्मनि संतं च विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 38 ||
ओतं प्रोतं यत्र च सर्वं गगनांतं
योऽस्थूलानण्वादिषु सिद्धोऽक्षरसंज्ञः |
ज्ञातातोऽन्यो नेत्युपलभ्यो न च वेद्य-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 39 ||
तावत्सर्वं सत्यमिवाभाति यदेत-
-द्यावत्सोऽस्मीत्यात्मनि यो ज्ञो न हि दृष्टः |
दृष्टे यस्मिन् सर्वमसत्यं भवतीदं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 40 ||
रागामुक्तं लोहयुतं हेम यथाग्नौ
योगाष्टांगैरुज्ज्वलितज्ञानमयाग्नौ |
दग्ध्वात्मानं ज्ञं परिशिष्टं च विदुर्यं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 41 ||
यं विज्ञानज्योतिषमाद्यं सुविभांतं
हृद्यर्केंद्वग्न्योकसमीड्यं तटिदाभं |
भक्त्याराध्येहैव विशंत्यात्मनि संतं
तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 42 ||
पायाद्भक्तं स्वात्मनि संतं पुरुषं यो
भक्त्या स्तौतीत्यांगिरसं विष्णुरिमं मां |
इत्यात्मानं स्वात्मनि संहृत्य सदैक-
-स्तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे || 43 ||
अधिकश्लोकः –
इत्थं स्तोत्रं भक्तजनेड्यं भवभीति-
-ध्वांतार्काभं भगवत्पादीयमिदं यः |
विष्णोर्लोकं पठति शृणोति व्रजति ज्ञो
ज्ञानं ज्ञेयं स्वात्मनि चाप्नोति मनुष्यः || 44 ||
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविंदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्री हरि स्तुतिः संपूर्णं |
अर्थ
यह “श्री हरि स्तुतिः (हरिमीडे स्तोत्रं)” जगद्गुरु श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत गहन अद्वैत-वेदांत स्तोत्र है। इसमें हरि (विष्णु) को केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि परम ब्रह्म के रूप में स्तुति की जाती है, जो संसार के अंधकार को नष्ट करने वाले, सब कुछ प्रकाशित करने वाले शुद्ध चेतना और आत्मा के सार हैं। यह स्तोत्र भक्ति और ज्ञान का एक उत्कृष्ट संगम है, जहाँ प्रत्येक श्लोक हरि के परब्रह्मत्व और आत्मा-ब्रह्म की एकता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
स्तोत्र की शुरुआत भगवान के ध्यान से होती है, यह घोषणा करते हुए कि 'यह संपूर्ण संसार चक्र उन्हीं से उत्पन्न होता है और उनके दर्शन मात्र से ही नष्ट हो जाता है।' हरि का दर्शन अज्ञान का नाश है, मन के अंधकार को दूर करने की प्रक्रिया है। सृष्टि, स्थिति और लय उनके एक अंश से ही होते हैं। यह ब्रह्मांड उन्हीं में प्रकट होता है, उनकी शक्ति से ही संचालित होता है, और वही इसमें व्याप्त हैं, ऐसा स्तोत्र बताता है।
हरि सर्वज्ञ हैं, सर्वव्यापी हैं, अनंत गुणों के सागर हैं। वे अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त संसार में प्रकट होते हैं। वे सत् और असत् दोनों के आधार हैं। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय (जानने वाला-ज्ञान-जानने योग्य) की त्रिमूर्ति से परे होते हुए भी, वे सदा शुद्ध चैतन्य के रूप में स्वयं-ज्ञानमय हैं। गुरु के उपदेश, वैराग्य, गहन ध्यान और एकाग्र भक्ति के माध्यम से साधक अविनाशी हरि के सूक्ष्म सत्य को अनुभव करते हैं। जब मन शांत होता है, तो व्यक्ति 'मैं वही परम प्रकाश हूँ' को पहचानता है और उन्हें हृदय में पाता है।
हरि ब्रह्मस्वरूप हैं, हृदय कमल में शांति से विराजमान परम चैतन्य हैं। वे वाणी से परे हैं, इंद्रियों की पहुंच से बाहर प्रकाशमय ज्ञान स्वरूप हैं, और हृदय में परमानंद हैं। सनकादि मुनियों ने उन्हें अंतर्मुख होकर ब्रह्ममंत्र के रूप में ध्यान किया। 'जो कुछ जानने योग्य है, वह ब्रह्म ही है; मैं भी ब्रह्म हूँ' - इस महावाक्य के अर्थ को समझने वाला हरि में लीन हो जाता है। ऋषियों ने कहा है कि हरि सर्वव्यापी हैं, सभी शरीरों में होते हुए भी शरीरों से परे हैं। भले ही हम संसार को देखें या भोगों का अनुभव करें, वह केवल माया है; सच्चा चैतन्य तो शुद्ध 'मैं' रूपी आत्म-प्रभा है। यही संसार के अंधकार को नष्ट करने वाले हरि हैं। वे जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाओं में प्रकाशित होने वाले चैतन्य हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादि सभी देवता उसी परमात्मा के एक ही चैतन्य के भिन्न-भिन्न प्रकटीकरण मात्र हैं।
लाभ (Benefits):
- संसार बंधन से मुक्ति: इस स्तोत्र का निरंतर पाठ अज्ञान, भौतिक इच्छाओं और संसार चक्र के बंधनों से मुक्ति दिलाने में सहायक है। यह मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है।
- आत्मज्ञान की प्राप्ति: हरि के परब्रह्म स्वरूप का ध्यान करने और स्तोत्र के अर्थ का मनन करने से आत्मा-ब्रह्म की एकता का गहरा बोध होता है। यह आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
- मन की शांति और एकाग्रता: स्तोत्र के गहन अर्थ और ध्यान विधियाँ मन को गहरी शांति और एकाग्रता प्रदान करती हैं। इससे मानसिक तनाव कम होता है और चित्त शुद्ध होता है।
- भक्ति और वैराग्य में वृद्धि: हरि के अनंत गुणों की स्तुति करने और उनकी सर्वव्यापकता को जानने से भक्ति और वैराग्य की भावनाएँ प्रबल होती हैं, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए सहायक हैं।
- अज्ञान का निवारण: 'संसारध्वांतविनाशं हरिमीडे' श्लोक के अनुसार, यह स्तोत्र अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता है। यह स्पष्टता और विवेक को बढ़ाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री हरि स्तुति (हरिमीडे स्तोत्रं) क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री हरि स्तुति का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
किन्हें श्री हरि स्तुति का पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री हरि स्तुति का उद्गम या रचयिता कौन हैं?
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