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श्री हरि स्तोत्रं (प्रह्लाद कृतं)

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री हरि स्तोत्रं (प्रह्लाद कृतं)

त्रिभुवनभवनाभिरामकोशं
सकलकळंकहरं परं प्रकाशं |
अशरणशरणं शरण्यमीशं
हरिमजमच्युतमीश्वरं प्रपद्ये || 1 ||

कुवलयदलनीलसन्निकाशं
शरदमलांबरकोटरोपमानं |
भ्रमरतिमिरकज्जलांजनाभं
सरसिजचक्रगदाधरं प्रपद्ये || 2 ||

विमलमलिकलापकोमलांगं
सितजलपंकजकुड्मलाभशंखं |
श्रुतिरणितविरंचिचंचरीकं
स्वहृदयपद्मदलाश्रयं प्रपद्ये || 3 ||

सितनखगणतारकाविकीर्णं
स्मितधवलाननपीवरेंदुबिंबं |
हृदयमणिमरीचिजालगंगं
हरिशरदंबरमाततं प्रपद्ये || 4 ||

अविरलकृतसृष्टिसर्वलीनं
सततमजातमवर्धनं विशालं |
गुणशतजरठाभिजातदेहं
तरुदलशायिनमर्भकं प्रपद्ये || 5 ||

नवविकसितपद्मरेणुगौरं
स्फुटकमलावपुषा विभूषितांगं |
दिनशमसमयारुणांगरागं
कनकनिभांबरसुंदरं प्रपद्ये || 6 ||

दितिसुतनलिनीतुषारपातं
सुरनलिनीसततोदितार्कबिंबं |
कमलजनलिनीजलावपूरं
हृदि नलिनीनिलयं विभुं प्रपद्ये || 7 ||

त्रिभुवननलिनीसितारविंदं
तिमिरसमानविमोहदीपमग्र्यं |
स्फुटतरमजडं चिदात्मतत्त्वं
जगदखिलार्तिहरं हरिं प्रपद्ये || 8 ||

इति श्रीवासिष्ठमहारामायणे मोक्षोपायेषु उपशमप्रकरणे त्रयस्त्रिंशः सर्गे प्रह्लाद कृत श्री हरि स्तोत्रं

अर्थ

प्रह्लाद ऋषि द्वारा रचित यह 'श्री हरि स्तोत्रं', भगवान हरि को परम तत्व, सर्वव्यापी चेतना और समस्त ब्रह्मांड के आश्रय के रूप में स्तुति करने वाला एक अत्यंत गहरा भक्ति कवच है। हरि को तीनों लोकों का रमणीय खजाना, सभी अशुद्धियों को दूर करने वाला परम प्रकाश स्वरूप, और असहायों को शरण देने वाला चित्रित किया गया है। प्रह्लाद अजन्मा, अचल, ईश्वर और समस्त सृष्टि के आधार तत्व को सर्वप्रथम प्रणाम करते हैं।

यह स्तोत्र हरि के रूप सौंदर्य का अद्भुत प्रतीकों के साथ वर्णन करता है: उनका रंग नीले कमल के दल जैसा, उनकी कांति शरद ऋतु के निर्मल आकाश की तरह, और उनकी शोभा भंवरों जैसी काली है। वे चक्र और गदा धारण किए हुए दिव्य रूप में विराजमान हैं। उनका शंख सफेद जल-पद्म पुष्प की तरह चमकता है और ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए ज्ञान का दीपक है। हृदय कमल में निवास करने वाले हरि, सृष्टि-स्थिति-लय तीनों का सहजता से संचालन करने वाले परमेश्वर हैं।

हरि का अनन्य सौंदर्य भक्त हृदय को परमानंद से भर देता है: उनके नख-चंद्रिकाएँ तारों की तरह चमकती हैं, मुख चंद्रमा के बिंब जैसा उज्ज्वल और तेजोमय है, और हृदय रत्न-ज्योति की तरह प्रकाश की धाराएँ प्रवाहित करता है। विशेष रूप से एक श्लोक में उन्हें एक अबोध शिशु के रूप में वट वृक्ष के पत्ते पर विश्राम करते हुए वर्णित किया गया है – यह सृष्टि, स्थिति और लय को अविचल रूप से संचालित करने वाली उनकी अप्रतिहत शक्ति और उस शक्ति में निहित दिव्य सामंजस्य को दर्शाता है।

नव-विकसित कमल के पराग के समान गोरे रंग से युक्त, भगवान विष्णु सफेद कांति, अरुण वर्णों और सुनहरे वस्त्रों के संयोजन से विश्व सौंदर्य के आदर्श रूप हैं। अंतिम श्लोक हरि को सभी लोकों के लिए सूर्य के समान प्रकाश देने वाला, अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाला ज्ञान-दीपक, चिदात्मा स्वरूप, ज्ञानरूप निर्गुण तत्व और समस्त दुखों को हरने वाला परम तत्व कहकर स्तुति करते हैं। यह स्तोत्र हरि को केवल एक रूप के रूप में नहीं, बल्कि तत्व के रूप में – ज्ञान, शांति, करुणा, अनुग्रह और विमुक्ति – इन सभी को एक ही परम सत्य के रूप में प्रत्यक्ष करता है। प्रह्लाद की यह शरणागति स्तुति केवल भक्ति नहीं, बल्कि जीवनमुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला ज्ञान पथ है।

लाभ (Benefits):

  • मानसिक शांति और अज्ञान का नाश: इस स्तोत्र के पाठ से मन को असीम शांति मिलती है और अज्ञानता का अंधकार दूर होता है।
  • हरि की कृपा और सुरक्षा: भगवान हरि की विशेष कृपा, सुरक्षा और करुणा प्राप्त होती है, जिससे सभी संकटों से मुक्ति मिलती है।
  • लौकिक और आध्यात्मिक कष्टों का निवारण: जीवन में आने वाली सभी लौकिक और आध्यात्मिक बाधाएँ तथा कष्ट दूर होते हैं, जिससे सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
  • ध्यान, ज्ञान और भक्ति में गहन अनुभव: स्तोत्र का पाठ ध्यान, ज्ञान और भक्ति में गहरे अनुभवों को प्रदान करता है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है।
  • हृदय शुद्धि और चिदात्मा तत्व की समझ: हृदय शुद्ध होता है और परम चैतन्य स्वरूप चिदात्मा तत्व की गहरी समझ तथा साक्षात्कार प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री हरि स्तोत्रं (प्रह्लाद कृतं) क्या है?
यह भक्त प्रह्लाद द्वारा रचित एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान हरि को परम सत्य, ब्रह्मांड के आधार और सभी के रक्षक के रूप में स्तुति करता है। यह हरि के दिव्य रूप, गुणों और महिमा का वर्णन करने वाली एक भक्तिपूर्ण प्रार्थना है।
श्री हरि स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, शुद्ध मन से करना चाहिए। विष्णु मंदिर में या घर के पूजा कक्ष में, शांत वातावरण में पाठ करना अधिक लाभकारी माना जाता है।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ प्राप्त होते हैं?
श्री हरि स्तोत्र के पाठ से मानसिक शांति, अज्ञान का नाश, भगवान हरि की कृपा, सुरक्षा, लौकिक और आध्यात्मिक कष्टों का निवारण तथा हृदय की शुद्धि होती है। यह मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री हरि स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति जो भगवान हरि में श्रद्धा रखता हो और मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखता हो, वह इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। इसके लिए कोई लिंग, आयु या जाति का प्रतिबंध नहीं है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन एक बार या तीन बार करना शुभ माना जाता है। अपनी श्रद्धा और समय के अनुसार आप पाठ की संख्या बढ़ा सकते हैं।
श्री हरि स्तोत्र का उद्गम क्या है?
यह स्तोत्र भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद द्वारा रचा गया है। यह श्री वसिष्ठ रामायण के 'मोक्षोपाय' नामक भाग में पाया जाता है, जो भक्ति और ज्ञान के महत्व को प्रतिपादित करता है।

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