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श्री हर्यष्टकं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री हर्यष्टकं

हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः |
अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः || 1 ||

स गंगा स गया सेतुः स काशी स च पुष्करं |
जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयं || 2 ||

वाराणस्यां कुरुक्षेत्रे नैमिशारण्य एव च |
यत्कृतं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयं || 3 ||

पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च |
तानि सर्वाण्यशेषाणि हरिरित्यक्षरद्वयं || 4 ||

गवां कोटिसहस्राणि हेमकन्यासहस्रकं |
दत्तं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयं || 5 ||

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदोऽप्यथर्वणः |
अधीतस्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयं || 6 ||

अश्वमेधैर्महायज्ञैर्नरमेधैस्तथैव च |
इष्टं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयं || 7 ||

प्राणः प्रयाण पाथेयं संसारव्याधिनाशनं |
दुःखात्यंत परित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयं || 8 ||

बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति |
सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयं || 9 ||

हर्यष्टकमिदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् |
आयुष्यं बलमारोग्यं यशो वृद्धिः श्रियावहं || 10 ||

प्रह्लादेन कृतं स्तोत्रं दुःखसागरशोषणं |
यः पठेत्स नरो याति तद्विष्णोः परमं पदं || 11 ||

इति प्रह्लादकृत श्री हर्यष्टकं |

अर्थ

श्री हर्यष्टकम्, जो भक्त शिरोमणि प्रह्लाद महाराज द्वारा रचित है, भगवान श्री हरि के दिव्य नाम की महिमा और विशेष रूप से 'हरि' नामक दो अक्षरों की असीम शक्ति का विस्तृत वर्णन करता है। यह अष्टकम् नामस्मरण की शक्ति को अत्यंत सरल और अर्थपूर्ण श्लोकों के माध्यम से समझाता है। प्रह्लाद जी ने बताया है कि हरि नाम का स्मरण मात्र ही समस्त पापों का नाश करता है और यह जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति का सबसे सुगम मार्ग है।

इस स्तोत्र का पहला श्लोक बताता है कि 'हरि' नाम का स्मरण यदि दूषित चित्त से या अनजाने में भी किया जाए, तो भी यह उसी प्रकार पापों को भस्म कर देता है, जैसे अग्नि छूने मात्र से सब कुछ जला देती है। दूसरा श्लोक घोषित करता है कि जिसकी जिह्वा पर 'हरि' ये दो अक्षर स्थित होते हैं, उसे गंगा, गया, सेतु, काशी और पुष्कर जैसे पवित्र तीर्थों का फल प्राप्त होता है। वाराणसी, कुरुक्षेत्र और नैमिषारण्य जैसे पवित्र स्थानों में किए गए यज्ञों का पुण्य फल भी केवल 'हरि' नाम के उच्चारण से प्राप्त हो जाता है, जैसा कि तीसरा श्लोक कहता है। पृथ्वी पर स्थित सभी तीर्थों, पुण्य स्थलों और पावन स्थानों का समस्त फल इस एक दिव्य नाम के गौरव में समाहित है, यह बात चौथा श्लोक मंगलमय ढंग से बताता है।

करोड़ों गायों के दान और हजारों स्वर्ण कन्याओं के दान से प्राप्त होने वाला पुण्य भी 'हरि' नाम का एक बार उच्चारण करने से तत्काल सिद्ध हो जाता है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का अध्ययन करने से प्राप्त होने वाला समस्त पुण्य भी इस नाम के एक बार उच्चारण से मिल जाता है। अश्वमेध और नरमेध जैसे महायज्ञों से मिलने वाला फल भी केवल 'हरि' नाम के उच्चारण से ही प्राप्त हो जाता है, यह बात छठे और सातवें श्लोक में स्पष्ट की गई है। 'हरि' नाम मनुष्य की जीवन यात्रा के लिए पाथेय (राह का भोजन) है, यह संसार रूपी रोग का नाश करने वाला है और दुख के सागर से बचाने वाली शक्ति है, आठवाँ श्लोक इसकी सर्वतोमुखी महत्ता को रेखांकित करता है।

जो एक बार भी 'हरि' नामक दो अक्षरों का उच्चारण करता है, वह मोक्ष की ओर यात्रा के लिए कमर कस लेता है; यह नाम उसे एक सुरक्षा कवच की तरह बचाता है, यह बात नौवें श्लोक में स्पष्ट होती है। फलश्रुति के अनुसार, जो प्रतिदिन प्रातःकाल हर्यष्टकम् का पाठ करते हैं, उन्हें लंबी आयु, बल, उत्तम स्वास्थ्य, श्री (संपत्ति), यश और सुख-शांति प्राप्त होती है। यह स्तोत्र दुख के सागर को सुखाने की शक्ति से परिपूर्ण है और इसका पाठ करने वाले विष्णु के परम पद को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार, यह अष्टकम् नामस्मरण की वास्तविक शक्ति को बताता है – उपासना, यज्ञ, ध्यान और वेद-पाठ के बिना भी, 'हरि' नाम ही रक्षक है।

लाभ (Benefits):

  • पाप-क्षय और चित्त-शुद्धि: 'हरि' नाम के स्मरण से अनजाने में किए गए पाप भी नष्ट हो जाते हैं और मन शुद्ध होता है।
  • तीर्थयात्रा और महायज्ञों का फल: निरंतर हरि नाम जपने से गंगा, गया, काशी आदि पुण्यतीर्थों की यात्रा और बड़े-बड़े यज्ञों का समस्त फल प्राप्त होता है।
  • सांसारिक दुखों से मुक्ति: यह जीवन के कष्टों और दुखों से रक्षा कर मानसिक शांति प्रदान करता है।
  • स्वास्थ्य, आयु, यश और समृद्धि: प्रतिदिन इस अष्टकम् का पाठ करने से लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, प्रसिद्धि और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
  • मोक्ष मार्ग का साधन: 'हरि' नाम मोक्ष के पथ पर चलने वाले साधकों के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करता है और उन्हें विष्णु के परम धाम तक पहुँचने में सहायता करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री हर्यष्टकम् क्या है?
श्री हर्यष्टकम् प्रह्लाद महाराज द्वारा रचित आठ श्लोकों का एक स्तोत्र है, जो भगवान हरि के दिव्य नाम 'हरि' के दो अक्षरों की महानता और शक्ति का वर्णन करता है। यह नामस्मरण के माध्यम से पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति का उपदेश देता है।
श्री हर्यष्टकम् का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस अष्टकम् का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, मन को शुद्ध करके भक्तिपूर्वक करना उत्तम माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले या दिन के किसी भी समय जब मन को शांति की आवश्यकता हो, तब भी इसका पाठ किया जा सकता है।
श्री हर्यष्टकम् के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
हर्यष्टकम् के पाठ से पापों का नाश होता है, चित्त शुद्ध होता है, तीर्थयात्राओं और महायज्ञों का फल प्राप्त होता है। इसके अलावा, लंबी आयु, स्वास्थ्य, धन, यश और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
श्री हर्यष्टकम् का पाठ कौन कर सकता है?
किसी भी आयु वर्ग और किसी भी पृष्ठभूमि के भक्त श्री हर्यष्टकम् का पाठ कर सकते हैं। विशेष रूप से भगवान विष्णु के भक्त, जीवन में दुखों से मुक्ति चाहने वाले और मोक्ष मार्ग का अनुसरण करने वाले लोग इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री हर्यष्टकम् का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
कम से कम दिन में एक बार पूरे अष्टकम् का पाठ करना उत्तम है। अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए, भक्त अपनी सुविधा के अनुसार 3, 5, 11 या 108 बार पाठ कर सकते हैं, महत्वपूर्ण यह है कि भक्ति और श्रद्धा से पाठ किया जाए।
श्री हर्यष्टकम् का मूल स्रोत क्या है?
श्री हर्यष्टकम् भक्त शिरोमणि प्रह्लाद महाराज द्वारा रचित है। प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे, और उनकी भक्ति और ज्ञान का यह स्तोत्र एक प्रमाण है।

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