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श्री गरुड दंडकं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री गरुड दंडकं

श्रीमान् वेंकटनाथार्यः कवितार्किककेसरी |
वेदांताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदाहृदि ||

नमः पन्नगनद्धाय वैकुंठवशवर्तिने |
श्रुतिसिंधुसुधोत्पादमंदराय गरुत्मते ||

गरुडमखिलवेदनीडाधिरूढं द्विषत्पीडनोत्कंठिताकुंठ वैकुंठपीठीकृत स्कंधमीडे स्वनीडा गतिप्रीतरुद्रा सुकीर्तिस्तनाभोग गाढोपगूढं स्फुरत्कंटक व्रात वेधव्यथा वेपमान द्विजिह्वाधिपा कल्पविष्फार्यमाण स्फटावाटिका रत्नरोचिश्छटा राजिनीराजितं कांतिकल्लोलिनी राजितं || 1 ||

जय गरुड सुपर्ण दर्वीकराहार देवाधिपा हारहारिन् दिवौकस्पति क्षिप्तदंभोळि धाराकिणा कल्पकल्पांत वातूल कल्पोदयानल्प वीरायितोद्यत् चमत्कार दैत्यारि जैत्रध्वजारोह निर्धारितोत्कर्ष संकर्षणात्मन् गरुत्मन् मरुत्पंचकाधीश सत्यादिमूर्ते न कश्चित् समस्ते नमस्ते पुनस्ते नमः || 2 ||

नम इदमजहत् सपर्याय पर्यायनिर्यात पक्षानिलास्फालनोद्वेलपाथोधि वीची चपेटाहता गाध पाताळ भांकार संक्रुद्ध नागेंद्र पीडा सृणीभाव भास्वन्नखश्रेणये चंड तुंडाय नृत्यद्भुजंगभ्रुवे वज्रिणे दंष्ट्रया तुभ्यमध्यात्मविद्या विधेया विधेया भवद्दास्यमापादयेथा दयेथाश्च मे || 3 ||

मनुरनुगत पक्षिवक्त्र स्फुरत्तारकस्तावकश्चित्रभानुप्रिया शेखरस्त्रायतां नस्त्रिवर्गापवर्ग प्रसूतिः परव्योमधामन् वलद्वेषिदर्प ज्वलद्वालखिल्य प्रतिज्ञावतीर्ण स्थिरां तत्त्वबुद्धिं परां भक्तिधेनुं जगन्मूलकंदे मुकुंदे महानंददोग्ध्रीं दधीथा मुधा कामहीनामहीनामहीनांतक || 4 ||

षट्त्रिंशद्गणचरणो नरपरिपाटीनवीनगुंभगणः |
विष्णुरथदंडकोऽयं विघटयतु विपक्षवाहिनीव्यूहं || 5 ||

विचित्रसिद्धिदः सोऽयं वेंकटेशविपश्चिता |
गरुडध्वजतोषाय गीतो गरुडदंडकः || 6 ||

कवितार्किकसिंहाय कळ्याणगुणशालिने |
श्रीमते वेंकटेशाय वेदांतगुरवे नमः ||

श्रीमते निगमांतमहादेशिकाय नमः |

इति श्री गरुड दंडकं |

अर्थ

श्री गरुड़ दंडकम् स्तोत्र भगवान विष्णु के दिव्य वाहन, गरुड़ देव की सर्वोच्च शक्ति, गति, तेज और सुरक्षात्मक प्रकृति की स्तुति में एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। इसकी रचना महान आचार्य श्री वेदान्त देशिक ने की थी। यह दंडक गरुड़ को केवल एक पक्षी के रूप में नहीं, बल्कि वेदों के साकार रूप, अज्ञान और दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाली महाशक्ति, और भक्तों को सभी संकटों से बचाने वाले दिव्य स्वरूप के रूप में चित्रित करता है। यह भक्ति के मार्ग में स्थिरता प्रदान करने वाले एक महान उपदेशक का दर्शन कराता है।

दंडक की शुरुआत में, श्री वेदान्त देशिक अपनी गुरु परंपरा को नमन करते हैं और भगवान की कृपा मांगते हैं। इसके बाद, वे सर्पों का नाश करने वाले, वैकुंठ में निवास करने वाले, और वेद रूपी सागर से अमृत निकालने वाले मंदराचल पर्वत के समान गरुड़ देव को प्रणाम करते हैं। गरुड़ को वेदों के पंखों पर विराजमान, शत्रुओं को पीड़ा देने की उत्कंठा से वैकुंठ के सिंहासन को अपने कंधों पर धारण करने वाले, एक अदम्य पराक्रमी महाशक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी गति, पंखों की गर्जना और दिव्य कांति को रुद्र और सर्पराज भी समझ नहीं पाते हैं। कवि वर्णन करते हैं कि उनकी श्वास के स्पर्श मात्र से रत्नों की वर्षा होती है, जो उनकी अपार शक्ति का प्रतीक है।

दंडक के मध्य भाग में, कवि गरुड़ की अद्भुत गति, दुष्ट सर्पों को नष्ट करने वाले उनके पंजे और चोंच, धातु को पिघलाने की उनकी शक्ति, और नागेंद्रों को भयभीत करने वाले उनके स्वरूप को क्रमिक रूप से प्रकट करते हैं। उनकी आँखों की तीक्ष्णता, पंखों की विशालता और सभी लोकों को प्रकाशित करने वाला उनका तेज अद्भुत है। गरुड़ को सुपर्ण, देवताओं के अधिपति, विषनाशक रूप, और दैत्यों का विनाश करने वाले शौर्यमूर्ति के रूप में स्तुति की जाती है। यह घोषणा की जाती है कि उनके समान कोई नहीं है, जो उनकी अद्वितीय शक्ति पर जोर देता है।

स्तोत्र के अंतिम भाग में, भक्त पूर्ण रूप से गरुड़ देव को समर्पित होता है। वह शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से अपनी रक्षा करने, तथा सर्वज्ञान का मार्ग प्रदान करने की प्रार्थना करता है। गरुड़ का तेज भक्त के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक चार पुरुषार्थों की सिद्धि की दिशा में मार्गदर्शन करता है। यह दंडक गरुड़ के दर्शन से भक्ति तत्व में स्थिरता प्राप्त करने की कामना के साथ समाप्त होता है। यह स्तोत्र गरुड़ की शक्ति, गति, विषनाशक क्षमता, दुष्टों के विनाश और भक्तों की अपार रक्षा के गुणों को महान काव्यात्मक महिमा के साथ दर्शाता है।

लाभ (Benefits):

  • विष और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा: इस दंडक का पाठ विष, सर्प भय और सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से शक्तिशाली सुरक्षा प्रदान करता है।
  • शत्रु भय का निवारण और बाधाओं का नाश: यह स्तोत्र शत्रुओं से उत्पन्न भय, जीवन की बाधाओं और बुरी शक्तियों के प्रभाव को दूर करता है, जिससे विजय प्राप्त होती है।
  • साहस और मानसिक बल में वृद्धि: गरुड़ के शौर्य की स्तुति करने से भक्तों में साहस, आत्मविश्वास और मानसिक दृढ़ता बढ़ती है।
  • यात्राओं और प्रयासों में सफलता: यात्राओं में, परीक्षाओं में, प्रतिस्पर्धाओं में और किसी भी साहसिक कार्य में सफलता और विजय प्राप्त करने में यह सहायक है।
  • आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति की वृद्धि: यह दंडक आध्यात्मिक ज्ञान, भगवान के प्रति अटूट भक्ति और मोक्ष के मार्ग की ओर मार्गदर्शन करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री गरुड़ दंडकम् क्या है?
श्री गरुड़ दंडकम् श्री वेदान्त देशिक द्वारा रचित एक शक्तिशाली स्तोत्र है, जो भगवान विष्णु के दिव्य वाहन, गरुड़ देव की अपार शक्ति, गति और सुरक्षात्मक गुणों की स्तुति करता है। यह गरुड़ को वेदों के साकार रूप और सभी संकटों से बचाने वाले के रूप में वर्णित करता है।
श्री गरुड़ दंडकम् का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस दंडक का पाठ शुभ दिनों पर, विशेषकर नागपंचमी पर या प्रतिदिन किया जा सकता है। स्नान करके शुद्ध होकर, पूर्व दिशा की ओर मुख करके, भक्ति और श्रद्धा के साथ गरुड़ देव का स्मरण करते हुए पाठ करना उत्तम माना जाता है। इसे मानसिक शांति और सुरक्षा के लिए पढ़ा जाता है।
इस स्तोत्र का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
गरुड़ दंडक का पाठ करने से विष, सर्प भय, नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं से सुरक्षा मिलती है। यह साहस, मानसिक बल, यात्राओं में सफलता और आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाता है।
श्री गरुड़ दंडकम् का पाठ किसे करना चाहिए?
विष भय से पीड़ित लोग, शत्रुओं से परेशान लोग, नकारात्मक शक्तियों से प्रभावित लोग, साहस और आत्मविश्वास बढ़ाना चाहने वाले और आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुक भक्त इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
श्री गरुड़ दंडकम् का पाठ कितनी बार करना उचित है?
कोई निश्चित संख्या नहीं है, लेकिन प्रतिदिन कम से कम एक बार या 11, 21, 108 बार पाठ करना अधिक प्रभावी माना जाता है। आप अपने समय और भक्ति के अनुसार पाठ की संख्या निर्धारित कर सकते हैं।
इस दंडक का मूल या रचयिता कौन हैं?
श्री गरुड़ दंडकम् की रचना 13वीं शताब्दी के महान वैष्णव आचार्य और कवि श्री वेदान्त देशिक ने की थी। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे और उन्होंने अनेक स्तोत्रों की रचना की है।

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