श्री गदाधर स्तोत्रं (वराह पुराणे)
रैभ्य उवाच |
गदाधरं विबुधजनैरभिष्टुतं
धृतक्षमं क्षुधितजनार्तिनाशनं |
शिवं विशालाऽसुरसैन्यमर्दनं
नमाम्यहं हृतसकलाऽशुभं स्मृतौ || 1 ||
पुराणपूर्वं पुरुषं पुरुष्टुतं
पुरातनं विमलमलं नृणां गतिं |
त्रिविक्रमं हृतधरणिं बलोर्जितं
गदाधरं रहसि नमामि केशवं || 2 ||
विशुद्धभावं विभवैरुपावृतं
श्रिया वृतं विगतमलं विचक्षणं |
क्षितीश्वरैरपगतकिल्बिषैः स्तुतं
गदाधरं प्रणमति यः सुखं वसेत् || 3 ||
सुराऽसुरैरर्चितपादपंकजं
केयूरहारांगदमौळिधारिणं |
अब्धौ शयानं च रथांगपाणिनं
गदाधरं प्रणमति यः सुखं वसेत् || 4 ||
सितं कृते त्रेतयुगेऽरुणं विभुं
तथा तृतीये नीलवर्णमच्युतं |
कलौ युगेऽलिप्रतिमं महेश्वरं
गदाधरं प्रणमति यः सुखं वसेत् || 5 ||
बीजोद्भवो यः सृजते चतुर्मुखं
तथैव नारायणरूपतो जगत् |
प्रपालयेद्रुद्रवपुस्तथांतकृ-
-द्गदाधरो जयतु षडर्धमूर्तिमान् || 6 ||
सत्त्वं रजश्चैव तमो गुणास्त्रय-
-स्त्वेतेषु विश्वस्य समुद्भवः किल |
स चैक एव त्रिविधो गदाधरो
दधातु धैर्यं मम धर्ममोक्षयोः || 7 ||
संसारतोयार्णवदुःखतंतुभि-
-र्वियोगनक्रक्रमणैः सुभीषणैः |
मज्जंतमुच्चैः सुतरां महाप्लवो
गदाधरो मामुदधौ तु योऽतरत् || 8 ||
स्वयं त्रिमूर्तिः खमिवात्मनात्मनि
स्वशक्तितश्चांडमिदं ससर्ज ह |
तस्मिन् जलोत्थासनमाप तैजसं
ससर्ज यस्तं प्रणतोऽस्मि भूधरं || 9 ||
मत्स्यादिनामानि जगत्सु प्रश्नुते
सुरादिसंरक्षणतो वृषाकपिः |
मुखस्वरूपेण स संततो विभु-
-र्गदाधरो मे विदधातु सद्गतिं || 10 ||
इति श्रीवराहपुराणे सप्तमोऽध्याये रैभ्य कृत श्री गदाधर स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री गदाधर स्तोत्रं वराह पुराण में महर्षि रैभ्य द्वारा रचित है, जिसमें भगवान विष्णु की उनके गदाधर रूप में स्तुति की गई है। गदा धारण करने वाले श्रीहरि को लोकों के रक्षक, दुष्टों का संहारक और भक्तों के शोक-दुःख को नष्ट करने वाला बताया गया है। इस स्तोत्र में वर्णन है कि उनके स्मरण मात्र से ही सभी अशुभ दूर हो जाते हैं। उन्हें गदा के माध्यम से असुर सेनाओं का नाश करने वाला शिवस्वरूप कहा गया है।
भगवान गदाधर अत्यंत प्राचीन, नित्य शुद्ध और तीनों लोकों के शरणदाता हैं। मुनि उन्हें त्रिविक्रम के रूप में नमन करते हैं, जिन्होंने महाबली को पराजित कर पृथ्वी को पुनः प्राप्त किया और केशव के रूप में ब्रह्मांड की रक्षा करते हैं। वे विशुद्ध भाव से पूजे जाते हैं और राजाओं सहित पाप रहित देवताओं द्वारा भी उनकी स्तुति की जाती है। जो कोई भी उन्हें नमन करता है, वे उसे सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं और उसे आनंदमय जीवन जीने में सहायता करते हैं।
देवताओं और असुरों द्वारा पूजित चरण कमल वाले, बाजूबंद, हार और अन्य दिव्य आभूषणों से सुशोभित, क्षीरसागर में शयन करने वाले और सुदर्शन चक्र धारण करने वाले परमात्मा ही गदाधर हैं। वे युगों के अनुसार विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं – सत्ययुग में श्वेत वर्ण के, त्रेतायुग में अरुण वर्ण के, द्वापर में नील वर्ण के और कलियुग में सूक्ष्म रूप में भी महेश्वर के रूप में विद्यमान रहते हैं।
सृष्टि, स्थिति और लय के कर्ता ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को भी वे ही उत्पन्न करते हैं। जगत के मूल कारण तीनों गुण (सत्व, रजस, तमस) भी उन्हीं के स्वरूप हैं। इस त्रिविध स्वरूप वाले गदाधर से प्रार्थना की जाती है कि वे धर्म मार्ग पर चलने वालों को धैर्य प्रदान करें। जन्म-मृत्यु रूपी संसार सागर की खाई में डूबते हुए भक्त को बचाने वाली एकमात्र महान नौका गदाधर ही हैं। अलगाव, पीड़ा और खतरों के मगरमच्छों से भयभीत होने पर भी, उनका आश्रय ही सबसे सुरक्षित रक्षा है।
अपनी शक्ति से स्वयं ही जगत की सृष्टि करने वाले और मत्स्यादि अवतारों से देवताओं की रक्षा करने वाले वृषाकपि रूपी गदाधर ही हैं; उनका अनुग्रह ही भक्त के लिए कल्याण का मार्ग है और अंततः मुक्ति की ओर ले जाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त लौकिक और आध्यात्मिक समृद्धि प्राप्त करते हैं।
लाभ (Benefits):
- शोक, अशुभ और भय का नाश: श्री गदाधर स्तोत्र के भक्तिपूर्ण पाठ से मानसिक दुःख, नकारात्मक शक्तियाँ और सभी प्रकार के भय दूर होते हैं, जिससे मन को शांति मिलती है।
- धर्म बल, धैर्य और मन की शांति: यह स्तोत्र भक्तों को धर्म के मार्ग पर चलने की आंतरिक शक्ति, किसी भी चुनौती का सामना करने का धैर्य और स्थायी मानसिक शांति प्रदान करता है।
- परिवार की रक्षा, शत्रु नाश और उत्तम स्वास्थ्य: भगवान गदाधर की कृपा से परिवार को पूर्ण सुरक्षा मिलती है, शत्रुओं की बाधाओं से मुक्ति मिलती है और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
- संसार के बंधनों से मुक्ति और सद्गति: जन्म-मृत्यु के चक्र रूपी संसार के बंधनों से छुटकारा पाकर मोक्ष की ओर बढ़ने और सद्गति प्राप्त करने के लिए यह स्तोत्र भक्तों का मार्गदर्शन करता है।
- नकारात्मकता और खतरों से सुरक्षा: जीवन में आने वाली सभी प्रकार की नकारात्मकताओं और खतरों से भगवान भक्तों की रक्षा करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री गदाधर स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री गदाधर स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री गदाधर स्तोत्रं का मूल स्रोत क्या है?
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