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श्री दत्तात्रेय पंजरं

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स्तोत्र
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श्री दत्तात्रेय पंजरं

अस्य श्रीदत्तात्रेयपंजरमहामंत्रस्य शबररूप महारुद्रऋषिः |
अनुष्टुप्छंदः | श्रीदत्तात्रेयो देवता |
आं बीजं | ह्रीं शक्तिः | क्रों कीलकं |
ममसर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ||

ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः |
लोकत्रयेण दिग्बंधः |

ध्यानं -
व्याख्यामुद्रां करसरसिजे दक्षिणे संदधानो
       जानुन्यस्तापरकरसरोजात्त वामोन्नतांसः |
ध्यनाद्ध्यानात् सुखवरवशादर्थमामीलिताक्षो
       दत्तात्रेयो भसित धवलः पातु न कृत्तिवासाः ||

(पंचपूजाः)
ॐ नमो भगवते दत्तात्रेय नमः |
ॐ महागंभीराय नमः |
ॐ वैकुंठवासाय नमः |
ॐ शंखचक्रगदा नमः |
ॐ त्रिशूलधारिणे नमः |
ॐ वेणुनादाय नमः |
ॐ दुष्टसंहारकाय नमः |
ॐ शिष्टपरिपालकाय नमः |
ॐ नारायणास्त्रधारिणे नमः |
ॐ चिद्रूपाय नमः |
ॐ प्रज्ञानंब्रह्ममहावाक्याय नमः |
ॐ सकलकर्मनिर्मिताय नमः |
ॐ सच्चिदानंदाय नमः |
ॐ सकललोकसंचारणाय नमः |
ॐ सकलदेवतावशीकरणाय नमः |
ॐ सकललोकवशीकरणाय नमः |
ॐ सकलराजजनवशीकरणाय नमः |
ॐ सकलभोगवशीकरणाय नमः |
ॐ लक्ष्मीऐश्वर्यसंपत्कराय नमः |
ॐ मम मातृ-पितृ-पुत्रादिरक्षणाय नमः |
ॐ गुडोदककलशपूजाय नमः |
ॐ अष्टदळपद्मपीठाय नमः |
ॐ बिंदुमध्ये लक्ष्मीनिवासाय नमः |
ॐ ॐ ओं ॐ ओं ॐ ओं ॐ अष्टदलबंधनाय नमः |

ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं चतुष्कोनबंधनाय  नमः |
ह्रां ह्रां ह्रां ह्रां चतुर्द्वारबंधनाय नमः |
ॐ ऋग्यजुस्सामाथर्वणा प्रणवसमेताय
ॐ उदात्तानुदात्तस्वरितप्रवचनाय नमः |
ॐ गायत्री-सावित्री-सरस्वती-देवताय नमः |
ॐ अवधूताश्रमाय नमः |
ॐ अजपागायत्रीसमेताय नमः |
ॐ सकलसंपत्कराय नमः |
ॐ परमंत्र-परयंत्र-परतंत्रोच्चाटनाय नमः |
ॐ आत्ममंत्र-आत्मयंत्र-आत्मतंत्रसंरक्षणाय नमः |
ॐ सदोचित-सकलमत-स्थापिताय नमः |
ॐ सद्गुरुदत्तात्रेय हुं फट् स्वाहा ||

इति श्रीदत्तात्रेयपंजरं संपूर्णं ||

अर्थ

श्री दत्तात्रेय पंजरं एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली रक्षा मंत्र कवच है। यह भगवान दत्तात्रेय को समर्पित है, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव के समन्वित स्वरूप और सार्वभौमिक गुरु हैं। 'पंजरं' का अर्थ है - 'पिंजरा' या 'सुरक्षा कवच', जो दिव्य मंत्र शक्तियों के माध्यम से भक्त के चारों ओर एक अभेद्य आध्यात्मिक दीवार बनाता है। यह पवित्र स्तोत्र दत्तात्रेय की ब्रह्मांडीय शक्तियों का आह्वान करता है, जिससे भक्तों को शांति, निर्भयता, समृद्धि और सभी नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति मिलती है। इस स्तोत्र का प्रत्येक मंत्र दत्तात्रेय की विभिन्न शक्तियों को आमंत्रित करता है।

स्तोत्र के आरंभ में दिया गया ध्यान श्लोक भगवान दत्तात्रेय के दिव्य और शांत स्वरूप का वर्णन करता है। इसमें उन्हें भस्मधारी, शांतचित्त, ज्ञान मुद्रा धारण किए हुए, अनुग्रह दृष्टि से देखने वाले और ध्यान में सुखपूर्वक लीन बताया गया है। उनकी आंखें आधी खुली रहती हैं, जो ध्यान की गहराई और आंतरिक आनंद को दर्शाती हैं। वे कृत्तिवासा (व्याघ्रचर्म धारण करने वाले) भी हैं, जो उनके तपस्वी और शिव स्वरूप को इंगित करता है। इस ध्यान से मन दत्तात्रेय की शक्ति और शांति पर केंद्रित होता है, जिससे ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पंचपूजा मंत्रों के माध्यम से भगवान दत्तात्रेय के विभिन्न स्वरूपों और शक्तियों की स्तुति की जाती है। इन मंत्रों में उन्हें सर्वलोक संचारी, महागंभीर, वैकुंठवासी, शंखचक्रगदाधारी, त्रिशूलधारी, वेणुनाद करने वाले, दुष्टों का संहार करने वाले, सज्जनों का पालन करने वाले, नारायणास्त्रधारी, चिद्रूप, प्रज्ञानंब्रह्म महावाक्य स्वरूप, सकल कर्मों के निर्माता और सच्चिदानंद स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। ये मंत्र दत्तात्रेय की उन शक्तियों का आह्वान करते हैं जो दुष्ट शक्तियों का नाश करती हैं, भक्तों की रक्षा करती हैं, धन, ज्ञान और मोक्ष प्रदान करती हैं, तथा सृष्टि, स्थिति और लय के कार्यों का संचालन करती हैं, जिससे भक्त के जीवन में समग्र शुभ होता है।

“ह्रीं”, “ह्रां”, “ॐ” जैसे बीजाक्षरों से युक्त बंधन मंत्र भक्त के चारों ओर एक आध्यात्मिक सुरक्षा चक्र का निर्माण करते हैं। ये मंत्र दिक-बंधन करते हैं, जिससे किसी भी नकारात्मक शक्ति, बुरी नज़र या अशुभ प्रभाव का प्रवेश वर्जित हो जाता है। स्तोत्र के अंत में आने वाला “ॐ सद्गुरु दत्तात्रेय हुं फट् स्वाहा” मंत्र इस पंजर का मूल बीज है। यह सभी भयों से रक्षा करता है, नकारात्मकता को भंग करता है और भक्त को दत्तात्रेय चैतन्य के साथ एकाकार करता है। यह मंत्र हृदय में दत्तात्रेय की कृपा को जागृत करता है और आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करता है।

लाभ (Benefits):

  • दुष्ट शक्तियों और अशुभ प्रभावों से सुरक्षा: यह पंजर नकारात्मक ऊर्जाओं, भूत-प्रेतों और अशुभ दृष्टि से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, भक्त के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच का निर्माण करता है।
  • शांति, बल, धन और यश की वृद्धि: दत्तात्रेय की कृपा से मानसिक शांति, शारीरिक और मानसिक शक्ति, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है, जिससे जीवन में सुख और संतोष आता है।
  • भयमुक्त जीवन और योग सिद्धि: सभी प्रकार के भयों से मुक्ति मिलती है और भक्त को निर्भय जीवन प्रदान होता है। इसके साथ ही, आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर योग सिद्धि प्राप्त करने और आंतरिक ज्ञान को जागृत करने में सहायता मिलती है।
  • सद्गुरु कृपा और आध्यात्मिक विकास: सद्गुरु दत्तात्रेय की प्रत्यक्ष कृपा प्राप्त होती है, जिससे आध्यात्मिक पथ पर तीव्र गति से प्रगति होती है और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में मार्गदर्शन मिलता है।
  • ग्रह दोष निवारण: जन्मकुंडली में स्थित ग्रह दोषों से उत्पन्न होने वाली परेशानियों को दूर करके जीवन में स्थिरता और सुखमय जीवन प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री दत्तात्रेय पंजरं क्या है?
श्री दत्तात्रेय पंजरं भगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली रक्षा मंत्र कवच है। यह भक्त को दुष्ट शक्तियों, नकारात्मक प्रभावों और विपत्तियों से बचाने के लिए एक आध्यात्मिक दीवार बनाता है।
श्री दत्तात्रेय पंजरं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इसका पाठ प्रातःकाल में, विशेष रूप से गुरुवार या पूर्णिमा के दिनों में करना श्रेष्ठ है। पूर्व दिशा की ओर मुख करके, दीपक जलाकर, दत्तात्रेय का ध्यान करके, प्रत्येक मंत्र का धीरे-धीरे और एकाग्रता से पाठ करना चाहिए।
श्री दत्तात्रेय पंजरं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से दुष्ट शक्तियों, ग्रह दोषों और अशुभ दृष्टि से सुरक्षा मिलती है। साथ ही, शांति, धन, बल, यश, निर्भयता और सद्गुरु दत्तात्रेय की कृपा प्राप्त होकर आध्यात्मिक प्रगति होती है।
श्री दत्तात्रेय पंजरं का पाठ कौन कर सकता है?
दत्तात्रेय में श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति, बिना किसी लिंग भेद के, शुद्ध मन और भक्ति के साथ इस पंजर का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से सुरक्षा, शांति और आध्यात्मिक मार्गदर्शन चाहने वाले इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री दत्तात्रेय पंजरं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
दैनिक पाठ के लिए एक बार पूरे पंजर का पाठ करना उत्तम है। विशेष फलों या गंभीर समस्याओं के निवारण के लिए 11, 21 या 108 बार पाठ किया जा सकता है। नियमित पाठ अधिक प्रभावी होता है।
श्री दत्तात्रेय पंजरं का उद्गम या स्रोत क्या है?
श्री दत्तात्रेय पंजरं एक प्राचीन और गोपनीय रक्षा स्तोत्र है, जिसके ऋषि शबररूप महारुद्र हैं। इसका दत्तात्रेय संप्रदाय में महत्वपूर्ण स्थान है और यह गुरु परंपरा के माध्यम से प्राप्त हुआ है।

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