श्री दत्तात्रेय ध्यानं
दत्तात्रेयं शिवं शांतं सच्चिदानंदमद्वयं |
आत्मरूपं परं दिव्यमवण्यमुपास्महे ||1||
दत्तात्रेयं शिवं शांतमिंद्रनीलनिभं प्रभुं |
आत्ममायारतं देवं अवधूतं दिगंबरं ||2||
भस्मोद्धूलितसर्वांगं जटाजूटधरं विभुं |
चतुर्बाहुमुदारांगं प्रफुल्लकमलेक्षणं ||3||
ज्ञानयोगनिधिं विश्वगुरुं योगिजनप्रियं |
भक्तानुकंपनं सर्वसाक्षिणं सिद्धसेवितं ||4||
जटाधरं पांडुरंगं शूलहस्तं कृपानिधिं | (पांडुरांगं)
सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेयमहं भजे ||5||
माला कमंडलुरधः करपद्मयुग्मे
मध्यस्थपाणियुगले डमरुत्रिशूले |
यन्न्यस्त ऊर्ध्वकरयोः शुभशंखचक्रे
वंदे तमत्रिवरदं भुजषट्क युक्तं ||6||
इति श्रीदत्तात्रेयध्यानं संपूर्णं |
अर्थ
श्री दत्तात्रेय ध्यानं एक पवित्र स्तोत्र संग्रह है जिसका उपयोग भक्त भगवान दत्तात्रेय के दिव्य स्वरूप का अपने मन में प्रत्यक्ष ध्यान करने के लिए करते हैं। दत्तात्रेय, अत्रि महर्षि और अनसूया देवी के पुत्र हैं, जो त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के अवतार और परब्रह्म स्वरूप हैं। यह ध्यान उनके रूप, स्वभाव, शक्ति, करुणा और योग महिमा का विस्तृत वर्णन करता है। इस ध्यान का पाठ दत्तात्रेय को सच्चिदानंदमय, अवधूत स्वरूप और भक्तों के रक्षक के रूप में मानकर करना चाहिए।
यह ध्यान श्लोक भगवान दत्तात्रेय के अनंत गुणों और उनके सर्वव्यापी स्वरूप को हृदय में स्थापित करने में सहायक हैं। पहला श्लोक, 'दत्तात्रेयं शिवं शांतं सच्चिदानंदमद्वयं' दत्तात्रेय को शांत स्वरूप, शिवतत्व रूप, सच्चिदानंदमय और द्वैत रहित परब्रह्म के रूप में वर्णित करता है, जो उनके आध्यात्मिक सार को उजागर करता है। दूसरा श्लोक उन्हें 'इंद्रनीलनिभं प्रभुं' कहकर इंद्रनील मणि के समान नीले रंग के प्रभु के रूप में चित्रित करता है। यह बताता है कि वे अवधूत रूप में माया से मुक्त होकर सभी लोकों में विचरण करते हैं।
आगे के श्लोकों में, दत्तात्रेय के भौतिक और आध्यात्मिक लक्षणों का वर्णन किया गया है। 'भस्मोद्धूलितसर्वांगं जटाजूटधरं विभुं' उनके पूरे शरीर पर भस्म लगाए हुए, जटाओं को धारण किए हुए, चतुर्भुजधारी और कमल जैसे नेत्रों वाले करुणा मूर्ति रूप को दर्शाता है। चौथे श्लोक में उन्हें ज्ञान-योग का निधि, विश्वगुरु, योगियों को प्रिय, भक्तों पर दया करने वाले और सिद्धों द्वारा सेवित सर्वसाक्षी के रूप में वर्णित किया गया है। पांचवां श्लोक उन्हें शूलधारी, पांडुरंग स्वरूप, कृपा के सागर और सभी रोगों को हरने वाले देवता के रूप में स्तुति करता है, यह बताते हुए कि उनके भजन से रोग और भय दूर होते हैं।
अंतिम श्लोक 'माला कमण्डलुराधः करपद्मयुग्मे...' दत्तात्रेय के षड्भुज स्वरूप का स्पष्ट वर्णन करता है। यह श्लोक उनके छह हाथों को दर्शाता है, जिसमें निचले दो हाथों में माला और कमंडलु, मध्य के दो हाथों में डमरू और त्रिशूल, तथा ऊपर के दो हाथों में शंख और चक्र धारण किए हुए हैं। ये सभी आयुध और वस्तुएं सृष्टि, स्थिति, संहार और अनुग्रह की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस स्वरूप का ध्यान करने से भक्त सभी लोकों पर अनुग्रह बरसाने वाले दत्तात्रेय की कृपा के पात्र बनते हैं।
लाभ (Benefits):
- **मानसिक शांति और एकाग्रता:** इस ध्यान का नियमित पाठ मन को शांत करता है और आध्यात्मिक विषयों में एकाग्रता को बढ़ाता है।
- **रोग और भय का निवारण:** दत्तात्रेय की कृपा से सभी प्रकार के रोग, दुख और भय दूर होते हैं, जिससे स्वास्थ्य और शांति प्राप्त होती है।
- **ज्ञान और भक्ति की वृद्धि:** दत्तात्रेय ज्ञान के सागर हैं, इसलिए यह ध्यान भक्तों में ज्ञान, योग और भक्ति के मार्ग को शुद्ध करता है और आध्यात्मिक प्रगति में सहायता करता है।
- **दैवीय सुरक्षा और मार्गदर्शन:** दत्तात्रेय का ध्यान भक्तों को दैवीय सुरक्षा प्रदान करता है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए सही मार्गदर्शन देता है।
- **चित्तशुद्धि और आत्म-साक्षात्कार:** ध्यान के माध्यम से चित्तशुद्धि होती है, और अंततः आत्म-साक्षात्कार की दिशा में दत्तात्रेय की कृपा प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दत्तात्रेय ध्यानं क्या है?
श्री दत्तात्रेय ध्यानं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री दत्तात्रेय ध्यानं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
श्री दत्तात्रेय ध्यानं का पाठ किसे करना चाहिए?
श्री दत्तात्रेय ध्यानं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस ध्यान में वर्णित भगवान दत्तात्रेय का मूल या महत्व क्या है?
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