श्री दत्तात्रेय अष्टचक्रबीज स्तोत्रं
मूलाधारे वारिजपत्रे चतुरस्रं
वं शं षं सं वर्णविशालैः सुविशालैः |
रक्तं वर्णं श्रीगणनाथं भगवंतं
दत्तात्रेयं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि || 1 ||
स्वाधिष्ठाने षड्दळपत्रे तनुलिंगे
बालां तावद्वर्णविशालैः सुविशालैः |
पीतं वर्णं वाक्पतिरूपं द्रुहिणं तं
दत्तात्रेयं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि || 2 ||
नाभौपद्मे पत्रदशाब्दे ड फ वर्णे
लक्ष्मीकांतं गरुडारूढं नरवीरं |
नीलं वर्णं निर्गुणरूपं निगमांतं
दत्तात्रेयं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि || 3 ||
हृत्पद्मांते द्वादशपत्रे क ठ वर्णे
सांबं शैवं हंसविशेषं शमयंतं |
सर्गस्थित्यंतं कुर्वंतं शिवशक्तिं
दत्तात्रेयं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि || 4 ||
कंठस्थाने चक्रविशुद्धे कमलांते
चंद्राकारे षोडशपत्रे स्वरवर्णे |
मायाधीशं बीजशिवं तं निजरूपं
दत्तात्रेयं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि || 5 ||
आज्ञाचक्रे भृकुटिस्थाने द्विदलांते
हं क्षं बीजं ज्ञानसमुद्रं गुरुमूर्तिं |
विद्युद्वर्णं ज्ञानमयं तं निटिलाक्षं
दत्तात्रेयं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि || 6 ||
मूर्ध्निस्थाने वारिजपत्रे शशिबीजे
शुभ्रं वर्णं पद्मसहस्रं सुविशालं |
हं बीजाख्यं वर्णसहस्रं तुरीयांतं
दत्तात्रेयं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि || 7 ||
ब्रह्मानंदं ब्रह्ममुकुंदं भगवंतं
ब्रह्मज्ञानं सत्यमनंतं भवरूपं |
पूर्णं चिद्घनपंचमखंडं शिवरूपं
दत्तात्रेयं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि || 8 ||
शांताकारं शेषशयानं सुरवंद्यं
कांतानाथं कोमलगात्रं कमलाक्षं |
चिंतारत्नं चिद्घनपूर्णं द्विजराजं
दत्तात्रेयं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि || 9 ||
इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं अजपाजपस्तोत्रं नाम श्री दत्तात्रेय अष्टचक्रबीज स्तोत्रं |
अर्थ
श्री दत्तात्रेय अष्टचक्रबीज स्तोत्रम एक अत्यंत गहरा और शक्तिशाली आध्यात्मिक मंत्र-योग स्तोत्र है। यह सूक्ष्म शरीर में स्थित आठ प्रमुख ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) में भगवान दत्तात्रेय के दिव्य स्वरूप का ध्यान करता है। यह स्तोत्र बताता है कि प्रत्येक चक्र में दत्तात्रेय किस दिव्य रूप, रंग, बीजाक्षर और ब्रह्मांडीय सिद्धांत के साथ निवास करते हैं। दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के संयुक्त स्वरूप, परमगुरु और ज्ञान के प्रतीक के रूप में इसमें प्रकट होते हैं।
यह स्तोत्र मूलाधार चक्र से शुरू होता है, जो स्थिरता, सुरक्षा और मूल शक्ति (कुंडलिनी) के उद्भव का स्थान है। यहाँ, दत्तात्रेय का ध्यान गणनाथ स्वरूप में, रक्तवर्ण के साथ किया जाता है। इसके बाद, स्वाधिष्ठान चक्र में, वे वाक्पति (ब्रह्मा) स्वरूप में, पीतवर्ण के साथ दर्शन देते हैं, जो रचनात्मकता और जीवन शक्ति से जुड़ा है। मणिपुर चक्र में, वे विष्णु/नृसिंह तत्व के साथ, नीलवर्ण में, एक शक्तिशाली रक्षक रूप में प्रकट होते हैं। यह साहस और निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।
अनाहत चक्र (हृदय) प्रेम, करुणा और शांति का केंद्र है। यहाँ दत्तात्रेय शिव-शक्ति के मिलन के साथ दर्शन देते हैं। विशुद्ध चक्र (कंठ) में, वे मायाधीश शिवबीज रूप में निवास करते हैं, जो वाक्सिद्धि और शुद्ध भावनाओं का उदय प्रदान करता है। आज्ञा चक्र में, 'हं' और 'क्षं' बीजाक्षरों के साथ, ज्ञानसागर दत्तात्रेय का ध्यान विद्युत वर्ण में, ज्ञान के तेज से प्रकाशित होते हुए किया जाता है।
सहस्रार चक्र में, वे शुद्ध शुक्ल तेज के साथ, हजारों पंखुड़ियों वाले कमल की तरह प्रकाशित होने वाले परब्रह्म स्वरूप में दिखाई देते हैं। यह तुरीयावस्था, परम शांति और परमानंद की अनुभूति का स्थान है। अंतिम श्लोकों में, दत्तात्रेय को ब्रह्मानंद स्वरूप, चिद्घनपूर्ण, परब्रह्ममय और जगत्प्रभु के रूप में वर्णित किया गया है। यह स्तोत्र जप योग, तत्वज्ञान, ध्यान शक्ति और कुंडलिनी जागरण जैसे रहस्यमय और महिमामय सिद्धांतों से भरा है, जो भक्तों को एक समग्र आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- चक्र शुद्धि और ऊर्जा संतुलन: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से शरीर के अष्टचक्र शुद्ध होते हैं और उनमें ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होता है, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
- ध्यान, ज्ञान और आत्म-विकास: दत्तात्रेय के चक्र स्वरूप का ध्यान करने से एकाग्रता बढ़ती है, आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग सुगम होता है।
- नकारात्मक शक्तियों का निवारण: भय, अशांति, मानसिक कमजोरी और अन्य नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं, जिससे आंतरिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।
- वाक्सिद्धि और ऐश्वर्य: विशुद्ध चक्र के शुद्धिकरण से वाक्सिद्धि प्राप्त होती है और दत्तात्रेय की कृपा से ऐश्वर्य तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है।
- कुंडलिनी जागरण में सहायक: बीजाक्षरों और चक्रों के ध्यान के माध्यम से कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने में यह एक शक्तिशाली साधन के रूप में कार्य करता है।
- पाप क्षय और सुरक्षा: दत्तात्रेय की परम कृपा से पापों का नाश होता है और भक्तों को सभी प्रकार की सुरक्षा तथा शांति प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दत्तात्रेय अष्टचक्रबीज स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या पृष्ठभूमि क्या है?
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