श्री दक्षिणकाळिका खड्गमाला स्तोत्रं
अस्य श्रीदक्षिणकाळिका खड्गमालामंत्रस्य श्री भगवान् महाकालभैरव ऋषिः उष्णिक् छंदः शुद्धः ककार त्रिपंचभट्टारकपीठस्थित महाकाळेश्वरांकनिलया, महाकाळेश्वरी त्रिगुणात्मिका श्रीमद्दक्षिणा काळिका महाभयहारिका देवता क्रीं बीजं ह्रीं शक्तिः हूं कीलकं मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे खड्गमालामंत्र जपे विनियोगः ||
ऋष्यादि न्यासः –
ॐ महाकालभैरव ऋषये नमः शिरसि |
उष्णिक् छंदसे नमः मुखे |
दक्षिणकाळिका देवतायै नमः हृदि |
क्रीं बीजाय नमः गुह्ये |
ह्रीं शक्तये नमः पादयोः |
हूं कीलकाय नमः नाभौ |
विनियोगाय नमः सर्वांगे |
करन्यासः –
ॐ क्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ क्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ क्रूं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ क्रैं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ॐ क्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
हृदयादिन्यासः –
ॐ क्रां हृदयाय नमः |
ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा |
ॐ क्रूं शिखायै वषट् |
ॐ क्रैं कवचाय हुं |
ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ क्रः अस्त्राय फट् |
ध्यानं –
सद्यश्छिन्नशिरः कृपाणमभयं हस्तैर्वरं बिभ्रतीं
घोरास्यां शिरसि स्रजा सुरुचिरानुन्मुक्त केशावळिं |
सृक्कासृक्प्रवहां श्मशाननिलयां श्रुत्योः शवालंकृतिं
श्यामांगीं कृतमेखलां शवकरैर्देवीं भजे काळिकां || 1 ||
शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीं
चतुर्भुजां खड्गमुंडवराभयकरां शिवां |
मुंडमालाधरां देवीं ललज्जिह्वां दिगंबरां
एवं संचिंतयेत्काळीं श्मशानालयवासिनीं || 2 ||
लमित्यादि पंचपूजाः –
लं पृथिव्यात्मिकायै गंधं समर्पयामि |
हं आकाशात्मिकायै पुष्पं समर्पयामि |
यं वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि |
रं अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि |
वं अमृतात्मिकायै अमृतोपहारं निवेदयामि |
सं सर्वात्मिकायै सर्वोपचारान् समर्पयामि |
अथ खड्गमाला |
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्रीं हूं ह्रीं श्रीमद्दक्षिणकाळिके, हृदयदेवि सिद्धिकाळिकामयि, शिरोदेवि महाकाळिकामयि, शिखादेवि गुह्यकाळिकामयि, कवचदेवि श्मशानकाळिकामयि, नेत्रदेवि भद्रकाळिकामयि, अस्त्रदेवि श्रीमद्दक्षिणकाळिकामयि, सर्वसंपत्प्रदायक चक्रस्वामिनि | जया सिद्धिमयि, अपराजिता सिद्धिमयि, नित्या सिद्धिमयि, अघोरा सिद्धिमयि, सर्वमंगळमयचक्रस्वामिनि | श्रीगुरुमयि, परमगुरुमयि, परात्परगुरुमयि, परमेष्ठिगुरुमयि, सर्वसंपत्प्रदायकचक्रस्वामिनि | महादेव्यंबामयि, महादेवानंदनाथमयि, त्रिपुरांबामयि, त्रिपुरभैरवानंदनाथमयि, ब्रह्मानंदनाथमयि, पूर्वदेवानंदनाथमयि, चलच्चितानंदनाथमयि, लोचनानंदनाथमयि, कुमारानंदनाथमयि, क्रोधानंदनाथमयि, वरदानंदनाथमयि, स्मराद्वीर्यानंदनाथमयि, मायांबामयि, मायावत्यंबामयि, विमलानंदनाथमयि, कुशलानंदनाथमयि, भीमसुरानंदनाथमयि, सुधाकरानंदनाथमयि, मीनानंदनाथमयि, गोरक्षकानंदनाथमयि, भोजदेवानंदनाथमयि, प्रजापत्यानंदनाथमयि, मूलदेवानंदनाथमयि, ग्रंथिदेवानंदनाथमयि, विघ्नेश्वरानंदनाथमयि, हुताशनानंदनाथमयि, समरानंदनाथमयि, संतोषानंदनाथमयि, सर्वसंपत्प्रदायकचक्रस्वामिनि | काळि, कपालिनि, कुल्ले, कुरुकुल्ले, विरोधिनि, विप्रचित्ते, उग्रे, उग्रप्रभे, दीप्ते, नीले, घने, बलाके, मात्रे, मुद्रे, मित्रे, सर्वेप्सितफलप्रदायकचक्रस्वामिनि | ब्राह्मि, नारायणि, माहेश्वरि, चामुंडे, कौमारि, अपराजिते, वाराहि, नारसिंहि, त्रैलोक्यमोहनचक्रस्वामिनि | असितांगभैरवमयि, रुरुभैरवमयि, चंडभैरवमयि, क्रोधभैरवमयि, उन्मत्तभैरवमयि, कपालिभैरवमयि, भीषणभैरवमयि, संहारभैरवमयि, सर्वसंक्षोभण चक्रस्वामिनि | हेतुवटुकानंदनाथमयि, त्रिपुरांतकवटुकानंदनाथमयि, वेताळवटुकानंदनाथमयि, वह्निजिह्ववटुकानंदनाथमयि, कालवटुकानंदनाथमयि, कराळवटुकानंदनाथमयि, एकपादवटुकानंदनाथमयि, भीमवटुकानंदनाथमयि, सर्वसौभाग्यदायकचक्रस्वामिनि | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं हूं फट् स्वाहा सिंहव्याघ्रमुखी योगिनिदेवीमयि, सर्पासुमुखी योगिनिदेवीमयि, मृगमेषमुखी योगिनिदेवीमयि, गजवाजिमुखी योगिनिदेवीमयि, बिडालमुखी योगिनिदेवीमयि, क्रोष्टासुमुखी योगिनिदेवीमयि, लंबोदरी योगिनिदेवीमयि, ह्रस्वजंघा योगिनिदेवीमयि, तालजंघा योगिनिदेवीमयि, प्रलंबोष्ठी योगिनिदेवीमयि, सर्वार्थदायकचक्रस्वामिनि | ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्रीं हूं ह्रीं इंद्रमयि, अग्निमयि, यममयि, निरृतिमयि, वरुणमयि, वायुमयि, कुबेरमयि, ईशानमयि, ब्रह्ममयि, अनंतमयि, वज्रिणि, शक्तिनि, दंडिनि, खड्गिनि, पाशिनि, अंकुशिनि, गदिनि, त्रिशूलिनि, पद्मिनि, चक्रिणि, सर्वरक्षाकरचक्रस्वामिनि | खड्गमयि, मुंडमयि, वरमयि, अभयमयि, सर्वाशापरिपूरकचक्रस्वामिनि | वटुकानंदनाथमयि, योगिनिमयि, क्षेत्रपालानंदनाथमयि, गणनाथानंदनाथमयि, सर्वभूतानंदनाथमयि, सर्वसंक्षोभणचक्रस्वामिनि | नमस्ते नमस्ते फट् स्वाहा ||
चतुरस्त्राद्बहिः सम्यक् संस्थिताश्च समंततः |
ते च संपूजिताः संतु देवाः देवि गृहे स्थिताः ||
सिद्धाः साध्याः भैरवाश्च गंधर्वा वसवोऽश्विनौ |
मुनयो ग्रहास्तुष्यंतु विश्वेदेवाश्च उष्मयाः ||
रुद्रादित्याश्च पितरः पन्नगाः यक्षचारणाः |
योगेश्वरोपासका ये तुष्यंति नरकिन्नराः ||
नागा वा दानवेंद्राश्च भूतप्रेतपिशाचकाः |
अस्त्राणि सर्वशस्त्राणि मंत्र यंत्रार्चन क्रियाः ||
शांतिं कुरु महामाये सर्वसिद्धिप्रदायिके |
सर्वसिद्धिमयचक्रस्वामिनि नमस्ते नमस्ते स्वाहा ||
सर्वज्ञे सर्वशक्ते सर्वार्थप्रदे शिवे सर्वमंगळमये सर्वव्याधिविनाशिनि सर्वाधारस्वरूपे सर्वपापहरे सर्वरक्षास्वरूपिणि सर्वेप्सितफलप्रदे सर्वमंगळदायक चक्रस्वामिनि नमस्ते नमस्ते स्वाहा ||
क्रीं ह्रीं हूं क्ष्म्यूं महाकालाय, हौं महादेवाय, क्रीं काळिकायै, हौं महादेव महाकाल सर्वसिद्धिप्रदायक देवी भगवती चंडचंडिका चंडचितात्मा प्रीणातु दक्षिणकाळिकायै सर्वज्ञे सर्वशक्ते श्रीमहाकालसहिते श्रीदक्षिणकाळिकायै नमस्ते नमस्ते फट् स्वाहा |
ह्रीं हूं क्रीं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||
इति श्रीरुद्रयामले दक्षिणकाळिका खड्गमाला स्तोत्रं |
अर्थ
श्री दक्षिणकाळिका खड्गमाला स्तोत्रं महाकालभैरव ऋषि द्वारा प्रकट किया गया एक गोपनीय, अत्यंत शक्तिशाली और रक्षक मंत्र है। 'खड्गमाला' नाम का अर्थ है 'तलवारों की माला', जो देवी की तीक्ष्ण, निर्णायक आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है। यह शक्ति बंधन को काटती है, शत्रुओं का नाश करती है और कर्मिक बाधाओं को दूर करती है। जब इस स्तोत्र का उचित विधि और भक्ति के साथ अभ्यास किया जाता है, तो साधक का शरीर, मन और प्राण देवी के कवच में समाहित हो जाते हैं। यह स्तोत्र न केवल बाहरी सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि आंतरिक शुद्धिकरण और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
इस स्तोत्र के अभ्यास में न्यास, बीज मंत्र (विशेष रूप से क्रीं, ह्रीं, हूं) और देवी के ध्यान का गहरा महत्व है। श्मशान भूमि में शव पर बैठी हुई, तीन नेत्रों वाली, मुंडमाला धारण किए, खड्ग धारण किए देवी का ध्यान करने से भक्त के भीतर निडरता आती है। यह दुष्ट शक्तियों का सामना करने का साहस और दृढ़ संकल्प प्रदान करता है। यह केवल बाहरी सुरक्षा ही नहीं देता, बल्कि पुराने कर्मों से अर्जित पापों (ब्रह्महत्या सहित), दरिद्रता, रोगों, शत्रु-विपत्ति, मंत्र दोषों और ग्रह दोषों से भी मुक्ति दिलाता है। यह साधक को आंतरिक शक्ति प्रदान कर सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करने में सहायता करता है।
स्तोत्र में अनेक दिव्य रूपों, चक्रों और रक्षक देवियों के नामों का उल्लेख है, जिनमें से प्रत्येक विजय, धन, मंत्र सिद्धि और कष्टों के निवारण के लिए एक कार्यशील ऊर्जा है। ये सभी रूप भक्त को विभिन्न तरीकों से सुरक्षा, सफलता और ज्ञान प्रदान करते हैं। दक्षिणकाळिका देवी का यह रूप अत्यंत उग्र होते हुए भी भक्तों के लिए परम कल्याणकारी है। उनकी कृपा से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है और आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति होती है। यह स्तोत्र एक साथ युद्ध-गान (सुरक्षा और विजय के लिए) और मुक्ति-गान (आंतरिक शुद्धिकरण और अंततः मोक्ष के लिए) दोनों है।
पाठ विधि, न्यास, कंठशुद्धि और सहित जप जैसे नियमों का पालन करने पर मंत्र सिद्धि शीघ्र प्रभावित होती है। इसके फलस्वरूप यज्ञ और तीर्थयात्रा के समान अतुलनीय फल प्राप्त होते हैं। फलश्रुति में स्पष्ट किया गया है कि इस स्तोत्र के पाठ से पापों का नाश, रोगों का निवारण, शत्रुओं का क्षय, संकटों से मुक्ति, यज्ञों का सारफल और आध्यात्मिक प्रगति होती है। यह भक्तिपूर्वक और गोपनीय रूप से ही आचरण करने योग्य एक अत्यंत प्रभावशाली साधना है।
लाभ (Benefits):
- घोर पापों से मुक्ति: ब्रह्महत्या जैसे गंभीर पापों सहित सभी प्रकार के कर्मिक ऋणों से शांति और पापों का क्षय होता है।
- शत्रु नाश और सुरक्षा: शत्रुओं, गुप्त हमलों और शत्रुतापूर्ण प्रभावों से शक्तिशाली सुरक्षा मिलती है, भय से मुक्ति प्राप्त होती है।
- रोग और दरिद्रता निवारण: पुरानी बीमारियों, दुर्भाग्य और गरीबी से राहत मिलती है, शारीरिक और आर्थिक संकटों का शमन होता है।
- मंत्र सिद्धि और सफलता: मंत्र सिद्धि में तेजी आती है, अनुष्ठानों की प्रभावकारिता बढ़ती है और सांसारिक सफलता व समृद्धि प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक प्रगति: मन की शुद्धि, साहस, दृढ़ता और जीवनमुक्ति की दिशा में आध्यात्मिक उन्नति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दक्षिणकाळिका खड्गमाला स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री दक्षिणकाळिका खड्गमाला स्तोत्र के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या इतिहास क्या है?
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