श्री छिन्नमस्ता देवी हृदयं
श्रीपार्वत्युवाच |
श्रुतं पूजादिकं सम्यग्भवद्वक्त्राब्ज निस्सृतं |
हृदयं छिन्नमस्तायाः श्रोतुमिच्छामि सांप्रतं || 1 ||
श्री महादेव उवाच |
नाद्यावधि मया प्रोक्तं कस्यापि प्राणवल्लभे |
यत्त्वया परिपृष्टोऽहं वक्ष्ये प्रीत्यै तव प्रिये || 2 ||
ॐ अस्य श्रीछिन्नमस्ताहृदयस्तोत्रमहामंत्रस्य – भैरव ऋषिः – सम्राट् छंदः -छिन्नमस्ता देवता – हूं बीजं – ॐ शक्तिः – ह्रीं कीलकं – शत्रुक्षयकरणार्थे जपे विनियोगः ||
अथ करन्यासः |
ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ हूं तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ क्लीं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ ऐं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ॐ हूं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
अथ करन्यासः |
ॐ ॐ हृदयाय नमः |
ॐ हूं शिरसे स्वाहा |
ॐ ह्रीं शिखायै वषट् |
ॐ क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ ऐं कवचाय हुं |
ॐ हूं अस्त्राय फट् |
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बंधः |
ध्यानं |
रक्ताभां रक्तकेशीं करकमललसत्कर्तृकां कालकांतिं
विच्छिन्नात्मीयमुंडासृगरुणबहुळां चक्रधारां पिबंतीं |
विघ्नाभ्रौघप्रचंडश्वसनसमनिभां सेवितां सिद्धसंघैः
पद्माक्षीं छिन्नमस्तां छलकरदितिजच्छेदिनीं संस्मरामि || 1 ||
वंदेऽहं छिन्नमस्तां तां छिन्नमुंडधरां परां |
छिन्नग्रीवोच्छटाच्छन्नां क्षौमवस्त्रपरिच्छदां || 2 ||
सर्वदा सुरसंघेन सेवितांघ्रिसरोरुहां |
सेवे सकलसंपत्यै छिन्नमस्तां शुभप्रदां || 3 ||
यज्ञानां योगयज्ञाय या तु जाता युगे युगे |
दानवांतकरीं देवीं छिन्नमस्तां भजामि तां || 4 ||
वैरोचनीं वरारोहां वामदेमविवर्धितां |
कोटिसूर्यप्रभां वंदे विद्युद्वर्णाक्षिमंडितां || 5 ||
निजकंठोच्छलद्रक्तधारया या मुहुर्मुहुः |
योगिनी गणसंस्तुत्या तस्याश्चरणमाश्रये || 6 ||
हूमित्येकाक्षरं मंत्रं यदीयं युक्तमानसः |
यो जपेत्तस्य विद्वेषी भस्मतां याति तां भजे || 7 ||
हूं स्वाहेति मनुं सम्यग्यस्स्मरत्यार्तिमान्नरः |
छिनत्ति छिन्नमस्ताया तस्य बाधां नमामि तां || 8 ||
यस्याः कटाक्षमात्रेण क्रूरभूतादयो द्रुतं |
दूरे तस्य पलायंते छिन्नमस्तां भजामि तां || 9 ||
क्षितितलपरिरक्षाक्षांतरोषा सुदक्षा
छलयुतकलकक्षाच्छेदने क्षांतिलक्ष्या |
क्षितिदितिजसुपक्षा क्षोणिपाक्षय्यशिक्षा
जयतु जयतु चाक्षा छिन्नमस्तारिभक्षा || 10 ||
कलिकलुषकलानां कर्तने कर्त्रिहस्ता
सुरकुवलयकाशा मंदभानुप्रकाशा |
असुरकुलकलापत्रासिकाकालमूर्ति-
र्जयतु जयतु काळी छिन्नमस्ता कराळी || 11 ||
भुवनभरणभूरी भ्राजमानानुभावा
भव भव विभवानां भारणोद्भातभूतिः |
द्विजकुलकमलानां भासिनी भानुमूर्ति-
र्भवतु भवतु वाणी छिन्नमस्ता भवानी || 12 ||
मम रिपुगणमाशु च्छेत्तुमुग्रं कृपाणं
सपदि जननि तीक्ष्णं छिन्नमुंडं गृहाण |
भवतु तव यशोऽलं छिंधि शत्रून्कलान्मे
मम च परिदिशेष्टं छिन्नमस्ते क्षमस्व || 13 ||
छिन्नग्रीवा छिन्नमस्ता छिन्नमुंडधराऽक्षता |
क्षोदक्षेमकरी स्वक्षा क्षोणीशाच्छादन क्षमा || 14 ||
वैरोचनी वरारोहा बलिदानप्रहर्षिता |
बलियोजितपादाब्जा वासुदेव प्रपूजिता || 15 ||
इति द्वादशनामानि छिन्नमस्ता प्रियाणि यः |
स्मरेत्प्रातस्समुत्थाय तस्य नश्यंति शत्रवः || 16 ||
यां स्मृत्वा संति सद्यः सकलः सुरगणाः सर्वदा संपदाढ्याः
शत्रूणां संघमाहत्य विशदवदनाः स्वस्थचित्ताः श्रयंति |
तस्याः संकल्पवंतः सरसिजचरणस्संततं संश्रयंति
साऽऽद्या श्रीशादिसेव्या सुफलतु सुतरां छिन्नमस्ता प्रशस्ता || 17 ||
हृदयमितिमज्ञात्वा हंतुमिच्छति यो द्विषं |
कथं तस्याचिरं शत्रुर्नाशमेष्यति पार्वति || 18 ||
यदीच्छेन्नाशनं शत्रोः शीघ्रमेतत्पठेन्नरः |
छिन्नमस्ता प्रसन्नापि ददाति फलमीप्सितं || 19 ||
शत्रुप्रशमनं पुण्यं समीप्सितफलप्रदं |
आयुरारोग्यदं चैव पठतां पुण्यसाधनं || 20 ||
इति श्रीनंद्यावर्ते महादेवपार्वतीसंवादे श्रीछिन्नमस्ताहृदयस्तोत्रं संपूर्णं ||
अर्थ
श्री छिन्नमस्ता देवी हृदयं स्तोत्र, दस महाविद्याओं में से एक, अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमयी देवी छिन्नमस्ता के आंतरिक योग शक्ति और हृदय-सार को प्रकट करने वाला एक पवित्र पाठ है। यह स्तोत्र स्वयं भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को प्रदान किया गया है। यह साधक को दिव्य सुरक्षा, साहस, शक्ति और आत्म-जागृति प्रदान करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली हृदय मंत्र स्वरूप है। भगवान शिव बताते हैं कि यह हृदय पद्धति अत्यंत गोपनीय है और अब तक किसी को नहीं बताई गई है। यह सीधे छिन्नमस्ता देवी की आंतरिक रहस्यमय शक्ति प्रदान करने वाला स्तोत्र है, जो भय का नाश करने वाला, विजय प्रदान करने वाला और शत्रुओं का निवारण करने वाला है।
ध्यान श्लोकों में देवी का दर्शन एक विशिष्ट और शक्तिशाली रूप में किया जाता है। देवी रक्तवर्णीय, रक्त केशों वाली, हाथ में तलवार लिए हुए, अपना कटा हुआ सिर पकड़े हुए, अपने ही सिर से प्रवाहित रक्त का पान करती हुई, योगिनी समूह के मध्य प्रकट होती हैं। वे विघ्नों को भस्म करने वाली अग्नि के समान तेजस्वी रूप धारण करती हैं। देवी का यह रूप 'अहंकार का छेदन', 'पापों का संहार', 'कर्मों की शुद्धि' और 'शत्रु नाश' का प्रतीक है। यह केवल बाहरी शत्रुओं को ही नहीं, बल्कि हमारे भीतर के अज्ञान, अहंकार और नकारात्मक प्रवृत्तियों को भी नष्ट करने की आंतरिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। यह रूप जीवन और मृत्यु के चक्र से परे जाकर सर्वोच्च चेतना को प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।
इस स्तोत्र के प्रमुख भावों में देवी को 'शत्रु नाशक शक्ति' के रूप में पूजा जाता है। उनकी एक दृष्टि मात्र से ही दुष्ट शक्तियाँ दूर हो जाती हैं। 'हूँ' (Hūṁ) मंत्र उनकी अत्यंत शक्तिशाली बीज ध्वनि है; इसका जप करने वाले शत्रु भय से मुक्त हो जाते हैं। युद्ध, बाधाएँ, भय और कर्म-बंधन—ये सभी उनकी कृपा से दूर हो जाते हैं। जो देवी के चरणों की सेवा करते हैं, उन्हें धन, धान्य, अभीष्ट सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। स्तोत्र में छिन्नमस्ता को प्रिय 12 नामों का भी उल्लेख है। इन द्वादश नामों का सुबह जप करने वालों को शत्रुओं का नाश होता है, घर में शांति, शुभता और सुरक्षा मिलती है, तथा मानसिक साहस और आर्थिक प्रगति प्राप्त होती है।
यह हृदय स्तोत्र छिन्नमस्ता देवी की गहरी शक्ति को प्रकट करता है, जो केवल शत्रुओं का नाश ही नहीं करती, बल्कि साधक के अहंकार का छेदन कर आत्मज्ञान प्रदान करती है। देवी के ध्यान और मंत्र जप से भक्त जीवन की सभी बाधाओं को पार कर पूर्ण विजय प्राप्त करते हैं। यह देवी की अपार कृपा को तुरंत प्रदान करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है, जो साधक को आध्यात्मिक उत्थान और मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु प्रशमन: बाहरी और आंतरिक शत्रुओं, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
- भय मुक्ति: सभी प्रकार के भय, हानि की आशंका और अदृश्य खतरों से सुरक्षा मिलती है।
- स्वास्थ्य एवं दीर्घायु: देवी की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु प्राप्त होती है।
- समृद्धि एवं सफलता: धन, धान्य, विद्या, ऐश्वर्य और सभी कार्यों में निरंतर सफलता मिलती है।
- आत्म-जागृति: अहंकार का छेदन कर, आत्मज्ञान को जागृत करता है और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
- दिव्य सुरक्षा: देवी के तत्काल अनुग्रह से सभी प्रकार की विपत्तियों से रक्षा मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री छिन्नमस्ता देवी हृदयं स्तोत्र क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री छिन्नमस्ता देवी हृदयं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
किसे इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
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