भ

श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2

श्रीमच्छंकरपाणिपल्लवकिरल्लोलंबमालोल्लस-
-न्मालालोलकलापकालकबरीभारावळीभासुरीं |
कारुण्यामृतवारिराशिलहरीपीयूषवर्षावलीं
बालांबां ललितालकामनुदिनं श्रीभद्रकाळीं भजे || 1 ||

हेलादारितदारिकासुरशिरःश्रीवीरपाणोन्मद-
-श्रेणीशोणितशोणिमाधरपुटीं वीटीरसास्वादिनीं |
पाटीरादिसुगंधिचूचुकतटीं शाटीकुटीरस्तनीं
घोटीवृंदसमानधाटियुयुधीं श्रीभद्रकाळीं भजे || 2 ||

बालार्कायुतकोटिभासुरकिरीटामुक्तमुग्धालक-
-श्रेणीनिंदितवासिकामरुसरोजाकांचलोरुश्रियं |
वीणावादनकौशलाशयशयश्यानंदसंदायिनी-
-मंबामंबुजलोचनामनुदिनं श्रीभद्रकाळीं भजे || 3 ||

मातंगश्रुतिभूषिणीं मधुधरीवाणीसुधामोषिणीं
भ्रूविक्षेपकटाक्षवीक्षणविसर्गक्षेमसंहारिणीं |
मातंगीं महिषासुरप्रमथिनीं माधुर्यधुर्याकर-
-श्रीकारोत्तरपाणिपंकजपुटीं श्रीभद्रकाळीं भजे || 4 ||

मातंगाननबाहुलेयजननीं मातंगसंगामिनीं
चेतोहारितनुच्छवीं शफरिकाचक्षुष्मतीमंबिकां |
जृंभत्प्रौढिनिशुंभशुंभमथिनीमंभोजभूपूजितां
संपत्संततिदायिनीं हृदि सदा श्रीभद्रकाळीं भजे || 5 ||

आनंदैकतरंगिणीममलहृन्नालीकहंसीमणीं
पीनोत्तुंगघनस्तनां घनलसत्पाटीरपंकोज्ज्वलां |
क्षौमावीतनितंबबिंबरशनास्यूतक्वणत् किंकिणीं
एणांकांबुजभासुरास्यनयनां श्रीभद्रकाळीं भजे || 6 ||

कालांभोदकलायकोमलतनुच्छायाशितीभूतिमत्
संख्यानांतरितस्तनांतरलसन्मालाकिलन्मौक्तिकां |
नाभीकूपसरोजनालविलसच्छातोदरीशापदीं
दूरीकुर्वयि देवि घोरदुरितं श्रीभद्रकाळीं भजे || 7 ||

आत्मीयस्तनकुंभकुंकुमरजःपंकारुणालंकृत-
-श्रीकंठौरसभूरिभूतिममरीकोटीरहीरायितां |
वीणापाणिसनंदनंदितपदामेणीविशालेक्षणां
वेणीह्रीणितकालमेघपटलीं श्रीभद्रकाळीं भजे || 8 ||

देवीपादपयोजपूजनमिति श्रीभद्रकाळ्यष्टकं
रोगौघाघघनानिलायितमिदं प्रातः प्रगेयं पठन् |
श्रेयः श्रीशिवकीर्तिसंपदमलं संप्राप्य संपन्मयीं
श्रीदेवीमनपायिनीं गतिमयन् सोऽयं सुखी वर्तते ||

इति श्रीनारायणगुरुविरचितं श्रीभद्रकाळ्यष्टकं |

अर्थ

श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2 एक अत्यंत सुंदर भक्तिपूर्ण रचना है, जो देवी के अलंकार, श्रृंगार, करुणा और शक्ति के भावों को अत्यंत श्रद्धापूर्वक व्यक्त करती है। प्रत्येक श्लोक देवी के परम मातृत्व, रौद्र शक्ति, संरक्षण और सौंदर्य को एक साथ प्रस्तुत करता है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि भक्त के हृदय से देवी के विभिन्न रूपों के प्रति प्रेम और श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। यह अष्टक भद्रकाली देवी के सौम्य और उग्र दोनों रूपों की समान रूप से स्तुति करता है, भक्तों को आंतरिक शांति और सुरक्षा प्रदान करता है।

इस स्तोत्र का आध्यात्मिक महत्व देवी के द्वैत स्वरूप में निहित है – वे सृष्टि, स्थिति और लय का कारण हैं। भद्रकाली केवल राक्षसों का संहार करने वाली नहीं हैं, वे ज्ञान, धन और मोक्ष प्रदान करने वाली मातृ शक्ति भी हैं। इस अष्टक का पाठ करने से भक्तों को देवी के इन सभी गुणों को समझने और अपने जीवन में उनकी दिव्य कृपा प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह मन के भय और अज्ञान को दूर कर आध्यात्मिक विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।

श्लोक 1 में, कवि भद्रकाली देवी को भगवान शंकर के हाथों में हिलते हुए केशों से सुशोभित बताते हैं। उनकी करुणा अमृत के सागर की लहरों के समान बहती है। यह रूप भक्त के मन में सुरक्षा, देवी की कृपा और शांति का प्रवाह लाता है, सभी भय और दुखों को दूर करता है। श्लोक 2 दारिकासुर के संहार के समय काली देवी द्वारा प्रदर्शित साहसी और भयंकर रूप का वर्णन करता है। फिर भी, उन्हें अर्पित किए गए फूल, सुगंध और संगीत यह दर्शाते हैं कि अपने उग्र रूप में भी वे करुणामयी और सुंदर हैं। श्लोक 3 में, सूर्य की किरणों के समान चमकता हुआ देवी का मुकुट, कोमल केश और ललित वेशभूषा उनके दिव्य सौंदर्य को उजागर करती है। वे संगीत का रूप और आनंददायिनी हैं, जो आंतरिक खुशी और दिव्य ज्ञान प्रदान करती हैं।

श्लोक 4 में, मातंगी स्वरूप – विद्या, वाणी और माधुर्य प्रदान करने वाला तत्व – लोक रक्षक भद्रकाली के साथ एकाकार हो जाता है। वे केवल शत्रु नाशिनी नहीं हैं; वे मोक्षदायिनी माता हैं। उनकी दृष्टि रक्षा करती है और पोषण करती है, साथ ही नकारात्मक प्रभावों को भी नष्ट करती है। श्लोक 5 में शुंभ-निशुंभ के संहार, देवताओं की स्तुति और विजय प्रसाद का काव्यात्मक चित्रण किया गया है। उनकी कटाक्ष शक्ति न केवल शत्रुओं को भस्म करती है; बल्कि भक्त को धन, शुभता और सुरक्षा भी प्रदान करती है। श्लोक 6 में आनंद रस से भरी देवी को मछली जैसी आँखों, कमल मुख और सुगंध के साथ वर्णित किया गया है, जो आंतरिक शुद्धता का प्रतीक है। उनकी उपस्थिति भक्त के हृदय को निर्मल सरोवर में बदल देती है।

श्लोक 7 में, उनका श्याम वर्ण काले बादल के समान चमकता है, जो मोतियों की मालाओं, नाभि कमल और हृदय भाग की शोभा से सुशोभित है, जो उनके ब्रह्मांडीय सौंदर्य को दर्शाता है। यह रूप भक्त के भीतर के पापों, दोषों और दुर्भाग्य को दूर करता है। श्लोक 8 अंबिका की अद्भुत महिमा को कुमकुम, भस्म, मालाओं और वाद्ययंत्रों के माध्यम से वर्णित करता है, ये सभी संरक्षण, संगीत, शुद्धता और कृपा का प्रतिनिधित्व करते हैं। काले बादल जैसे केश उनकी महाशक्ति का प्रतीक हैं। इस अष्टक का पाठ भूत, रोग, दोष और दुर्भाग्य जैसी सभी बाधाओं को दूर कर शिव कीर्ति, श्रेय, दीर्घकालिक शांति और समृद्धि प्रदान करता है। देवी भक्त को खतरों से बचाकर शुभ मार्ग पर ले जाने वाली दिव्य शक्ति हैं।

लाभ (Benefits):

  • भय, विघ्न और शत्रु दोष निवारण: इस अष्टक का नियमित पाठ भक्तों को सभी प्रकार के भय, बाधाओं और शत्रुओं से उत्पन्न होने वाली परेशानियों से बचाता है, उन्हें साहस और स्थिरता प्रदान करता है।
  • धन, विजय और शुभ फल: भद्रकाली देवी की कृपा से, भक्त अपने प्रयासों में सफलता, धन और सभी शुभ कार्यों में विजय प्राप्त करते हैं।
  • शारीरिक और मानसिक शक्ति में वृद्धि: इस स्तोत्र का पाठ शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है और मन को शांति, एकाग्रता तथा सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
  • दृष्टि दोष और ग्रह दोष निवारण: देवी की कृपा से, बुरी नजर और ग्रहों के अशुभ प्रभावों से उत्पन्न होने वाली परेशानियां दूर होती हैं, जिससे जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
  • मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति: भद्रकाली देवी न केवल लौकिक सुख प्रदान करती हैं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान और अंतिम मोक्ष भी प्रदान करने वाली शक्ति हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2 क्या है?
श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2 देवी भद्रकाली को समर्पित एक शक्तिशाली भक्ति स्तोत्र है, जो उनके विभिन्न रूपों - भयंकर रक्षक से लेकर करुणामयी माता तक - की स्तुति करता है। यह काव्यात्मक सौंदर्य को गहरे आध्यात्मिक अर्थ के साथ खूबसूरती से जोड़ता है, सुरक्षा, समृद्धि और आध्यात्मिक विकास के लिए उनके आशीर्वाद का आह्वान करता है।
श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2 का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस अष्टक का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर सुबह या शाम को, या देवी शक्ति को समर्पित शुभ अवसरों पर किया जा सकता है। इसे स्वच्छ शरीर और मन से, देवी की दिव्य उपस्थिति पर ध्यान केंद्रित करते हुए करना उचित है।
श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2 का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस अष्टक का पाठ करने से भय, बाधाओं और शत्रुओं से सुरक्षा, धन और सफलता की प्राप्ति, शारीरिक और मानसिक शक्ति में वृद्धि, तथा बुरी नजर और ग्रह दोषों का निवारण सहित कई लाभ मिलते हैं। यह आध्यात्मिक उत्थान और आंतरिक शांति भी प्रदान करता है।
श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2 का पाठ किसे करना चाहिए?
सुरक्षा, साहस, समृद्धि और आध्यात्मिक मार्गदर्शन चाहने वाले भक्त इस अष्टक का पाठ कर सकते हैं। यह उन लोगों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है जो चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, नकारात्मक शक्तियों को दूर करना चाहते हैं, या दिव्य माँ के साथ गहरा संबंध बनाना चाहते हैं।
श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2 का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
हालांकि कोई कठोर नियम नहीं है, आमतौर पर प्रतिदिन एक बार पाठ करना पर्याप्त होता है। विशिष्ट उद्देश्यों के लिए या चुनौतीपूर्ण समय में, व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत भक्ति और आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन के आधार पर इसे 3, 7, 11, या 108 बार पाठ कर सकता है।
श्री भद्रकाळ्यष्टकं – 2 का मूल क्या है?
इस विशेष भद्रकाळ्यष्टकं (संस्करण 2) के सटीक लेखक आमतौर पर ज्ञात नहीं हैं, लेकिन ऐसे अष्टक पूज्य ऋषियों और भक्तों द्वारा रचित प्राचीन रचनाएँ हैं। वे विभिन्न देवताओं को समर्पित हिंदू भक्ति साहित्य की समृद्ध परंपरा का हिस्सा हैं।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...