श्री बगळामुखी स्तोत्रं 2
अस्य श्रीबगळामुखीमहामंत्रस्य – नारदो भगवान् ऋषिः – अतिजगतीछंदः – श्री बगळामुखी देवता – लां बीजं इं शक्तिः – लं कीलकं-मम दूरस्थानां समीपस्थानां गति मति वाक्त्संभनार्थे जपे विनियोगः
ॐ ह्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः
बगळामुखी तर्जनीभ्यां नमः
सर्वदुष्टानां मध्यमाभ्यां नमः
वाचं मुखं पदं स्तंभय अनामिकाभ्यां नमः
जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ह्रीं ॐ स्वाहा करतलकरपृष्टाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं हृदयाय नमः
बगळामुखी शिरसे स्वाहा
सर्वदुष्टानां शिखायै वषत्
वाचं मुखं पदं स्तंभय कवचा हुं
जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय नेत्रत्रयाय वौषट्
ह्रीं ॐ स्वाहा अस्त्राय फट्
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बंधः |
ध्यानं |
पीतांबरां त्रिणेत्रां च द्विभुजां दहनोज्वलां |
शिलापर्वतहस्तां च रिपुकंपां महोत्कटां || 1 ||
गंभीरां च मदोन्मत्तां स्वर्णकांतिसमप्रभां |
वैरिनिर्दळनार्थाय स्मरेत्तां बगळामुखीं || 2 ||
चतुर्भुजां त्रिणयनां कमलासनसंस्थितां |
दक्षिणे मुद्गरं पाशं वामे जिह्वां च वज्रकं || 3 ||
पीतांबरधरां सांद्रां दृढपीनयोधरां |
वैरिवाक्त्संभिनीं देवीं स्मरामि बगळामुखीं || 4 ||
हेमकुंडलभूषांगीं शीतचंद्रार्धशेखरीं |
पीतभूषणभूषाढ्यां स्वर्णसिंहासनेस्थितां || 5 ||
त्रिशूलधारिणीमंबां सर्वसौभाग्यदायिनीं |
सर्वशृंगारवेषाढ्यां भजेत्तां बगळामुखीं || 6 ||
मध्ये सुधाब्धिमणिमंटप रत्न वेद्यां
सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णां |
पीतांबराभरणमाल्यविभूषितांगीं
देवीं नमामि धृत मुद्गरवैरि जिह्वां || 7 ||
चलत्कनककुंडलोल्लसितचारुगंडस्थलां
लसत्कनकचंपक द्युतिमदर्धेंदु बिंबांचितां |
सदाहितविपक्षकां दळितवैरि जिह्वांचलां
नमामि बगळामुखीं धीमतां वाङ्मनस्स्तंभिनीं || 8 ||
पीयूषो दधिमध्यचारु विलसद्रत्नोज्वले मंटपे
यासिंहासन मौळिपातितरिपु प्रेतासनाध्यासिनीं |
स्वर्णाभां करपीडितारिरशनां भ्राम्यद्गदां बिभ्रतीं
यस्त्वां पश्यति तस्य यांति विलयं सद्योहि सर्वापदः || 9 ||
देवि त्वच्चरणांबुजार्चनकृते यः पीतपुष्पांजलिं
मुद्रां वामकरे निधाय च पुनर्मंत्री मनोज्ञाक्षरीं |
पीठध्यानपरोपि कुंभकवशाद्बीजं स्मरेत्प्रार्थितं
तस्या मित्रचयस्य संसदि मुख स्तंभो भवेत्तत्क्षणात् || 10 ||
(ॐ ह्रीं बगळामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा)
मंत्रस्तावदयं विपक्षदळने स्तोत्रं पवित्रं च ते
यंत्रंवादिनि यंत्रिणं त्रिजगतां जैत्रं स चित्रं च तत् |
श्रीमातर्बगळेति नाम ललितं यस्यास्ति जंतोर्मुखे
तन्नामस्मरणेन वाग्भवमुख स्तंभोभवेत्तत्क्षणात् || 11 ||
दुष्टस्तंभनमुग्रविघ्नशमनं दारिद्र्यविद्रावणं
भूभृत्त्संभनकारणं मृगदृशां चेतस्समाकर्षणं |
सौभाग्यैकनिकेतनं मम दृशां कारुण्यपूर्णेक्षणे
मृत्योर्मारणमाविरस्तु पुरतो मातस्त्वदीयं वपुः || 12 ||
संख्याग्रे चोरदंड प्रहरणसमये बंधने वैरिमध्ये
विद्यावादे विवादे प्रकटितनृपतौ युद्धकाले निशायां |
वश्ये च स्तंभने वा रिपुवधसमये प्राणबाधे रणे वा
गच्छंतीष्टं त्रिकालं तव पठनमिदं कारयेदाशु धीरः || 13 ||
मातर्भंजय मद्विपक्षवदनं जिह्वां च संकीलय
ब्राह्मीं मुद्रय मुद्रयाशुधिषणामंघ्र्योर्गतिं स्तंभय |
शत्रून् चूर्णय चूर्णयाशु गदया गौरांगि पीतांबरे
विघ्नौघं बगळे हर प्रतिदिनं कौमारि वामेक्षणे || 14 ||
मातर्भैरवि भद्रकाळि विजये वाराहि विश्वाश्रये
श्रीनित्ये बगळे महेशि समये रामे सुरामे रमे |
मातंगि त्रिपुरे परात्परतरे स्वर्गापवर्गप्रदे
वंदेहं शरणागतोस्मिकृपया विश्वेश्वरी त्राहि मां || 15 ||
त्वं विद्या परमा त्रिलोकजननी व्योषाननं छेदिनी
योषाकर्षणकारिणी च सुमहाबंधैकसंभेदिनी |
दुष्टोच्चाटनकारिणी रिपुमनस्संदोहसंदायिनी
जिह्वाकीलनभैरवी विजयते ब्रह्मास्त्रसारायणी || 16 ||
यः कृतं जपसंख्यानां चिंतितं परमेश्वरी |
शत्रूणां बुद्धिनाशाय गृहाण मदनुग्रहात् || 17 ||
वैडूर्यहारपरिशोभितहेममालां
मध्येतिपीन कुचयोर्धृतपीतवस्त्रां |
व्याघ्राधिरूढ परिपूरित रत्नशोभां
नित्यं स्मरामि बगळां रिपुवक्त्र कीलां || 18 ||
एकाग्र मानसो भूत्वा स्तोष्यत्यंबां सुशोभनां |
रजन्या रचितां मालां करे धृत्वा जपेच्छुचिः || 19 ||
वामे पाणौ तु पाशं च तस्याधस्ताद्धृढं शुभं |
दक्षे करेऽक्षसूत्रं च अधःपद्मं च धारिणीं || 20 ||
चामुंडे चंडिकोष्ट्रे हुतवहदयिते श्यामले श्रीभुजंगी
दुर्गे प्रत्यंगिराद्ये मुररिपुभगिनी भार्गवीवामनेत्रे |
नानारूपप्रभेदे स्थितिलयजननं पालयद्भर्गहृद्ये
विश्वाद्ये विश्वजैत्री त्रिपुरः बगळे विश्ववंद्ये त्वमेका || 21 ||
चक्रं खड्गं मुसलमभयं दक्षिणाभिश्च दोर्भिः
शंखं खेटं हलमपि च गदां बिभ्रतीं वामदोर्भिः |
सिंहारूढामयुगनयनां श्यामलां कंजवक्त्रां
वंदे देवीं सकलवरदां पंचमीं मातृमध्यां || 22 ||
द्वात्रिंशदायुतयुतैश्चतुरष्टहस्तै-
रष्टोत्तरैश्शतकरैश्च सहस्रहस्तैः |
सर्वायुधैरयुत बाहुभिरन्वितां तां
देवीं भजामि बगळां रसनाग्रहस्तां || 23 ||
सर्वतश्शुभकरां द्विभुजां तां
कंबुहेम नवकुंडल कर्णां |
शत्रुनिर्दळनकारणकोपां
चिंतयामि बगळां हृदयाब्जे || 24 ||
जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं
वामेन शत्रून् परिपीडयंतीं |
गदाभिघातेन च दक्षिणेन
पीतांबराढ्यां द्विभुजां नमामि || 25 ||
वंदे वारिजलोचनां वसुकरां पीतांबराडंबरां
पीतांभोरुहसंस्थितां त्रिनयनां पीतांगरागोज्ज्वलां |
शब्दब्रह्ममयीं महाकविजयीं त्रैलोक्यसम्मोहनीं
विद्युत्कोटि निभां प्रसन्न बगळां प्रत्यर्थिवाक्त्संभिनीं || 26 ||
दुःखेन वा यदि सुखेन च वा त्वदीयं
स्तुत्वाऽथ नामबगळे समुपैति वश्यं |
निश्चित्य शत्रुमबलं विजयं त्वदंघ्रि
पद्मार्चकस्य भवतीति किमत्र चित्रं || 27 ||
विमोहितजगत्त्रयां वशगतावनवल्लभां
भजामि बगळामुखीं भवसुखैकसंधायिनीं |
गेहं नातति गर्वितः प्रणमति स्त्रीसंगमो मोक्षति
द्वेषी मित्रति पापकृत्सुकृतति क्ष्मावल्लभोधावति || 28 ||
मृत्युर्वैधृतिदूषणं सुगुणति त्वत्पादसंसेवनात्
त्वां वंदे भवभीतिभंजनकरीं गौरीं गिरीशप्रियां |
नित्यं यस्तु मनोहरं स्तवमिदं दिव्यं पठेत्सादरं
धृत्वा यंत्रमिदं तथैव समरे बाह्वोः करे वा गळे || 29 ||
राजानो वरयोषितोथकरिणस्सर्वामृगेंद्रा वशाः
स्तोत्रैर्यांति विमोहिता रिपुगणा लक्ष्मीः स्थिरा सिद्धयः |
निर्निद्रे बगळे समुद्रनिलये रौद्र्यादि वाङ्मुद्रिके
भद्रे रुद्रमनोहरे त्रिभुवनत्राणे दरिद्रापहे || 30 ||
सद्रत्नाकर भूमिगोज्वल करी निस्तंद्रि चांद्रानने
नीहाराद्रिसुते निसर्गसरळे विद्ये सुराद्ये नमः |
देवी तस्य निरामयात्मजमुखान्यायूंषि दद्यादिदं
ये नित्यं प्रजपंति भक्ति भरितास्तेभ्यस्स्तवं निश्चितं || 31 ||
नूनं श्रेयो वश्यमारोग्यतां च प्राप्तस्सर्वं भूतले साधकस्तु |
भक्त्या नित्यं स्तोत्रमेतत्पठन्वै विद्यां कीर्तिं वंशवृद्धिं च विंदेत् || 32 ||
इति श्रीरुद्रयामळे श्रीबगळामुखीस्तोत्रं ||
अर्थ
श्री बगळामुखी स्तोत्रं 2 एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र स्तोत्र है जो देवी बगळामुखी की स्तम्भन शक्ति का आह्वान करता है। यह स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि बीजा मंत्रों, न्यास और देवी के स्पष्ट ध्यान (विजुअलाइजेशन) का एक संयोजन है। इसका उद्देश्य आलोचकों के वाक्यों, दुर्भावनापूर्ण इरादों, शत्रुओं की चालों और किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों को रोकना है। यह भक्तों को सभी बाधाओं से सुरक्षा प्रदान करता है और भयमुक्त जीवन की ओर अग्रसर करता है।
इस स्तोत्र का आध्यात्मिक महत्व गहरा है। ध्यान में, देवी बगळामुखी को पीले वस्त्रों में, स्वर्ण मंडप में एक सिंहासन पर विराजमान, एक हाथ में गदा और दूसरे हाथ में शत्रु की जिह्वा पकड़े हुए दर्शाया गया है। यह शत्रुओं के शब्दों, उनके दुर्भावनापूर्ण विचारों और कार्यों को तुरंत स्तम्भित (निष्क्रिय) करने की देवी की क्षमता का प्रतीक है। न्यास शरीर में दैवीय ऊर्जा को स्थापित करता है और पाठ के लिए तैयार करता है। बीजा मंत्र सीधे देवी की शक्ति का आह्वान करते हैं, जिससे स्तोत्र का प्रभाव बढ़ जाता है।
स्तोत्र में पाठ के नियम, पीठ-पूजा विधि, पीले वस्त्रों और वस्तुओं का उपयोग, और विशिष्ट नक्षत्र/योग के संकेत दिए गए हैं। यह केवल मंत्रोच्चारण नहीं, बल्कि एक समग्र साधना पद्धति है। पालक, समर, वाद-विवाद, चोरी या बंधन जैसी कठिन परिस्थितियों में यह स्तोत्र विशेष सुरक्षा, विजय और शत्रु निग्रह प्रदान करता है। यह कानूनी मामलों, बहस-विवादों और किसी भी प्रकार की प्रतियोगिताओं में विजय दिलाने में सहायक होता है।
श्रद्धा और भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने वालों के शत्रु मौन हो जाते हैं, उनकी कुचालें विफल हो जाती हैं। यह स्तोत्र भक्तों को शक्ति, धन, साहस, वाक् सिद्धि (वाणी की शक्ति), परिवार में विकास, आर्थिक समृद्धि और सामान्य बाधा निवारण प्रदान करता है। फलश्रुति के अनुसार, यदि इस स्तोत्र को यंत्र के रूप में धारण किया जाए या घर/मंदिर में पाठ किया जाए, तो शत्रुओं का स्वभाव बदल जाता है, उन पर विजय प्राप्त होती है, विघ्नों का नाश होता है, परम रक्षा मिलती है और मूल धर्म के अनुसार मोक्ष के लक्ष्य भी प्राप्त होते हैं। यह स्तोत्र जीवन में निर्भयता, स्थिरता और विजय प्रदान करने वाला एक पूर्ण भक्ति मार्ग है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु निग्रह: शत्रुओं के दुर्भावनापूर्ण शब्दों, साजिशों और कार्यों को तुरंत रोककर उन्हें निष्क्रिय कर देता है।
- वाद-विवाद में विजय: कानूनी मामलों, बहस, प्रतियोगिताओं और किसी भी प्रकार के विवादों में सफलता प्राप्त करने में सहायता करता है।
- भय और दुर्गति निवारण: भय, संकटों, दरिद्रता और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान कर मन को शांति और स्थिरता देता है।
- वाक् सिद्धि और धैर्य: वाणी की शक्ति (वाक् सिद्धि) को बढ़ाता है, भक्तों को साहस, आत्मविश्वास और स्पष्ट विचार शक्ति प्रदान करता है।
- ऐहिक और आध्यात्मिक प्रगति: आर्थिक स्थिरता, पारिवारिक उन्नति, सामाजिक सफलता और आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति प्राप्त करने में सहायक होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री बगळामुखी स्तोत्रं 2 क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री बगळामुखी स्तोत्रं 2 का उद्गम क्या है?
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