श्री बगळामुखी स्तोत्रं
ॐ अस्य श्रीबगळामुखीस्तोत्रस्य-नारदऋषिः श्री बगळामुखी देवता- मम सन्निहितानां विरोधिनां वाङ्मुख-पदबुद्धीनां स्तंभनार्थे स्तोत्रपाठे विनियोगः
मध्येसुधाब्धि मणिमंटप रत्नवेदि
सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णां |
पीतांबराभरण माल्यविभूषितांगीं
देवीं भजामि धृतमुद्गरवैरि जिह्वां || 1 ||
जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं
वामेन शत्रून् परिपीडयंतीं |
गदाभिघातेन च दक्षिणेन
पीतांबराढ्यां द्विभुजां भजामि || 2 ||
चलत्कनककुंडलोल्लसितचारुगंडस्थलां
लसत्कनकचंपक द्युतिमदिंदुबिंबाननां |
गदाहत विपक्षकां कलितलोलजिह्वांचलां
स्मरामि बगळामुखीं विमुखवाङ्मनस्स्तंभिनीं || 3 ||
पीयूषो दधिमध्यचारु विलस द्रक्तोत्पले मंटपे
सत्सिंहासन मौळिपातितरिपुं प्रेतासनाध्यासिनीं |
स्वर्णाभां करपीडितारिरसनां भ्राम्यद्गदां विभ्रमां
इत्थं ध्यायति यांति तस्य विलयं सद्योथ सर्वापदः || 4 ||
देवित्त्वच्चरणांबुजार्चनकृते यः पीत पुष्पांजलीन्
भक्त्या वामकरे निधाय च मनुं मंत्री मनोज्ञाक्षरं |
पीठध्यानपरोऽथ कुंभकवशाद्बीजं स्मरेत्पार्थिव-
स्तस्यामित्रमुखस्य वाचि हृदये जाड्यं भवेत्तत्क्षणात् || 5 ||
वादी मूकति कंकति क्षितिपतिर्वैश्वानरश्शीतिति
क्रोधीशाम्यति दुर्जनस्सुजनति क्षिप्रानुगः खंजति |
गर्वी खर्वति सर्वविच्च जडति त्वद्यंत्रणा यंत्रितः
श्रीनित्ये बगळामुखि प्रतिदिनं कल्याणि तुभ्यं नमः || 6 ||
मंत्रस्तावदयं विपक्षदलने स्तोत्रं पवित्रं च ते
यंत्रं वादिनियंत्रणं त्रिजगतां जैत्रं च चित्रं च ते |
मातः श्रीबगळेति नाम ललितं यस्यास्ति जंतोर्मुखे
त्वन्नामग्रहणेन संसदि मुख स्तंभो भवेद्वादिनां || 7 ||
दुष्टस्तंभनमुग्रविघ्नशमनं दारिद्र्यविद्रावणं
भूभृद्भीशमनं चलन्मृगदृशां चेतस्समाकर्षणं |
सौभाग्यैकनिकेतनं समदृशः कारुण्यपूर्णामृतं
मृत्योर्मारणमाविरस्तु पुरतो मातस्त्वदीयं वपुः || 8 ||
मातर्भंजय मे विपक्षवदनां जिह्वां च संकीलय
ब्राह्मीं मुद्रय नाशयाशुधिषणामुग्रां गतिं स्तंभय |
शत्रूंश्चूर्णय देवि तीक्ष्णगदया गौरांगि पीतांबरे
विघ्नौघं बगळे हर प्रणमतां कारुण्यपूर्णेक्षणे || 9 ||
मातर्भैरवि भद्रकाळि विजये वाराहि विश्वाश्रये
श्रीविद्ये समये महेशि बगळे कामेशि रामे रमे |
मातंगि त्रिपुरे परात्परतरे स्वर्गापवर्गप्रदे
दासोऽहं शरणागतः करुणया विश्वेश्वरि त्राहिमां || 10 ||
संरंभे सौरसंघे प्रहरणसमये बंधनेवारिमध्ये
विद्यावादेविवादे प्रतिकृतिनृपतौ दिव्यकाले निशायां |
वश्ये वा स्तंभने वा रिपुवधसमये निर्जने वा वने वा
गच्छंस्तिष्ठंस्त्रिकालं यदि पठति शिवं प्राप्नुयादाशु धीरः || 11 ||
त्वं विद्या परमा त्रिलोकजननी विघ्नौघसंछेदिनी
योषाकर्षणकारिणी त्रिजगतामानंदसंवर्धिनी |
दुस्फोटोच्चाटनकारिणी जनमनस्संमोहसंदायिनी
जिह्वाकीलनभैरवी विजयते ब्रह्मास्त्रमंत्रो यथा || 12 ||
विद्यालक्ष्मीस्सर्वसौभाग्यमायुः
पुत्रैः पौत्रैः सर्वसाम्राज्यसिद्धिः |
मानो भोगो वश्यमारोग्यसौख्यं
प्राप्तं तत्तद्भूतलेऽस्मिन्नरेण || 13 ||
यत्कृतं च जपं होमं गदितं परमेश्वरी |
दुष्टानां निग्रहार्थाय तद्गृहाण नमोऽस्तु ते || 14 ||
पीतांबरां तां द्विभुजां त्रिनेत्रां गात्रगोज्ज्वलां |
शिलामुद्गरहस्तां च स्मरेत्तां बगळामुखीं || 15 ||
ब्रह्मास्त्रमिति विख्यातं त्रिषु लोकेषु विश्रुतं |
गुरुभक्ताय दातव्यं नदेयं यस्य कस्यचित् || 16 ||
नित्यं स्तोत्रमिदं पवित्रमिह यो देव्याः पठत्यादरात्
धृत्वायंत्रमिदं तथैव समरे बाहौ करे वा गळे |
राजानोऽप्यरयो मदांधकरिणस्सर्पा मृगेंद्रादिकाः
ते वै यांति विमोहिता रिपुगणा लक्ष्मीः स्थिरास्सिद्धयः || 17 ||
इति श्री रुद्रयामळे तंत्रे श्री बगळामुखी स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री बगळामुखी स्तोत्रं भगवती बगळामुखी की असीम स्तंभन (स्थिर करने) और निग्रह (वश में करने) शक्तियों का आह्वान करने वाला एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। यह देवी, दश महाविद्याओं में से एक, शत्रुओं के वचन, मन, बुद्धि और कर्मों को अचलायमान कर देती हैं, और भक्तों को अपराजेय सुरक्षा प्रदान करने वाली त्रिकालज्ञा हैं। स्तोत्र में उन्हें पीतवर्ण में, पीताम्बर धारण किए हुए, पीताभरणों से सुशोभित और स्वर्ण के समान कांति से चमकती हुई महा तेजोमयी के रूप में वर्णित किया गया है।
स्तोत्र के आरंभ में, देवी का ध्यान सुधासागर के मध्य में स्थित मणिमंडप में, रत्नवेदी पर सिंहासन पर पीतवर्ण की कांति से विराजमान होने के रूप में किया जाता है। वे अपने बाएँ हाथ में शत्रु की जिह्वा को पकड़े हुए और दाहिने हाथ में गदा से उसके दुर्भावों को नष्ट करती हुई दिखाई देती हैं। यह स्वरूप भक्तों के लिए शत्रुओं के वचनों को मूक कर देने वाली दिव्य शक्ति का प्रतीक है। उनका मुखमंडल उज्ज्वल चंद्रबिंब के समान चमकता है, और स्वर्ण कुंडल तथा चंपक पुष्प की कांति उनके सौंदर्य को और बढ़ाती है। ऐसे तेजोमय रूप का ध्यान करने वाले भक्त के शत्रुओं की शक्ति तुरंत समाप्त हो जाती है।
श्लोकों में बताया गया है कि बगळा देवी भक्त के जीवन की सभी नकारात्मकताओं — दुष्ट शक्तियों, दरिद्रता, विघ्नों, क्रूर विचारों और मानसिक अस्थिरता — को नष्ट कर देती हैं। स्तोत्र में उनकी स्तंभन शक्ति का उल्लेख है जो वाद-विवाद करने वालों की वाणी को रोकती है, शत्रुओं की बुद्धि को भ्रमित करती है, दुर्जनों के अहंकार का नाश करती है, और राजद्वेष को शांत करती है। वे भक्तों की सदैव रक्षा करने वाली विश्व-आश्रय देवी हैं, और शरणागतों के लिए सदा शरण हैं।
श्लोक बगळा देवी को शक्तिमय रूपों — भैरवी, भद्रकाली, माहेश्वरी, वाराही, मातंगी, त्रिपुरासुंदरी — के रूप में वर्णित करते हैं, यह दर्शाते हुए कि उनकी परम शक्ति सब कुछ को लय कर सकती है। फलश्रुति में कहा गया है कि यह स्तोत्र तीनों लोकों में ब्रह्मास्त्र के समान कार्य करता है। इसका पाठ करने वाले को सुरक्षा, धन, आयु, आरोग्य, राजकीय कृपा, शत्रु-नियंत्रण, वशीकरण, विजय और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्तोत्र यह भी पुष्टि करता है कि बगळामुखी के नाम मात्र के स्मरण से ही शत्रुओं की वाणी तुरंत रुक जाती है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु स्तंभन और सुरक्षा: शत्रुओं के वाणी, बुद्धि और दुर्भावनाओं को पूर्णतः स्थिर कर देता है, जिससे भक्त सभी प्रकार के क्रूर कर्मों से सुरक्षित रहते हैं।
- वाद-विवाद में विजय: किसी भी प्रकार के बहस, कानूनी मामलों या प्रतिस्पर्धी स्थितियों में अद्भुत और अप्रत्याशित विजय प्रदान करता है।
- नकारात्मक शक्तियों का निवारण: दुष्ट शक्तियों, द्रोहियों, अघातों और काले जादू जैसे नकारात्मक प्रभावों से भक्तों की रक्षा करता है।
- साहस और आत्मविश्वास वृद्धि: भय, दरिद्रता और बाधाओं को दूर कर भक्तों में अदम्य साहस, आत्मविश्वास और वाक्पटुता लाता है।
- धन और राजकीय कृपा: आर्थिक समृद्धि लाने के साथ-साथ, सरकारी अधिकारियों या उच्च पदस्थ व्यक्तियों से अनुकूलता और कृपा प्राप्त करने में सहायक होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री बगळामुखी स्तोत्रं क्या है?
श्री बगळामुखी स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
श्री बगळामुखी स्तोत्र पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
किन्हें श्री बगळामुखी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
श्री बगळामुखी स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री बगळामुखी स्तोत्र का उद्गम क्या है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
