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श्री अष्टभुजाष्टकं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री अष्टभुजाष्टकं

श्रीमान् वेंकटनाथार्यः कवितार्किककेसरी |
वेदांताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ||

गजेंद्ररक्षात्वरितं भवंतं
ग्राहैरिवाहं विषयैर्विकृष्टः |
अपारविज्ञानदयानुभाव-
-माप्तं सतामष्टभुजं प्रपद्ये || 1 ||

त्वदेकशेषोऽहमनात्मतंत्र-
-स्त्वत्पादलिप्सां दिशता त्वयैव |
असत्समोऽप्यष्टभुजास्पदेश
सत्तामिदानीमुपलंभितोऽस्मि || 2 ||

स्वरूपरूपास्त्रविभूषणाद्यैः
परत्वचिंतां त्वयि दुर्निवारां |
भोगे मृदूपक्रमतामभीप्सन्
शीलादिभिर्वारयसीव पुंसां || 3 ||

शक्तिं शरण्यांतरशब्दभाजां
सारं च संतोल्य फलांतराणां |
त्वद्दास्यहेतोस्त्वयि निर्विशंकं
न्यस्तात्मनां नाथ बिभर्षि भारं || 4 ||

अभीतिहेतोरनुवर्तनीयं
नाथ त्वदन्यं न विभावयामि |
भयं कुतः स्यात् त्वयि सानुकंपे
रक्षा कुतः स्यात् त्वयि जातरोषे || 5 ||

त्वदेकतंत्रं कमलासहाय
स्वेनैव मां रक्षितुमर्हसि त्वं |
त्वयि प्रवृत्ते मम किं प्रयासै-
-स्त्वय्यप्रवृत्ते मम किं प्रयासैः || 6 ||

समाधिभंगेष्वपि संपतत्सु
शरण्यभूते त्वयि बद्धकक्ष्ये |
अपत्रपे सोढुमकिंचनोऽहं
दूराधिरोहं पतनं च नाथ || 7 ||

प्राप्ताभिलाषं त्वदनुग्रहान्मां
पद्मानिषेव्ये तव पादपद्मे |
आदेहपातादपराधदूर-
-मात्मांतकैंकर्यरसं विधेयाः || 8 ||

प्रपन्न जनपाथेयं प्रपित्सूनां रसायनं |
श्रेयसे जगतामेतच्छ्रीमदष्टभुजाष्टकं || 9 ||

शरणागतसंत्राणत्वराद्विगुणबाहुना |
हरिणा वेंकटेशीया स्तुतिः स्वीक्रियतामियं || 10 ||

कवितार्किकसिंहाय कळ्याणगुणशालिने |
श्रीमते वेंकटेशाय वेदांतगुरवे नमः ||

इति श्री वेदांतदेशिक कृतं श्री अष्टभुजाष्टकं |

अर्थ

श्री अष्टभुजाष्टकं, महान आचार्य श्री वेदांत देशिकाचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत हृदयस्पर्शी स्तोत्र है। यह भगवान विष्णु के 'अष्टभुज' (आठ भुजाओं वाले) रूप को पूर्ण समर्पण भाव से समर्पित है। इस स्तोत्र में, कवि अत्यंत भावुकता के साथ यह वर्णन करते हैं कि संकट काल में भगवान महाविष्णु अपने अष्टभुज विग्रह के साथ भक्तों के रक्षक के रूप में कैसे खड़े होते हैं। यह स्तोत्र शरणागति, भक्तियोग और दैवी सुरक्षा के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को दर्शाता है।

स्तोत्र के आरंभ में, कवि गजेंद्र मोक्ष की घटना का स्मरण करते हैं। वे कहते हैं कि जिस तरह भगवान ने ग्राह (मगरमच्छ) द्वारा पकड़े गए गजेंद्र को बचाने के लिए तुरंत गति की थी, उसी प्रकार वे स्वयं भी संसार के विषयों रूपी ग्राहों द्वारा खींचे जा रहे हैं और उसी परमात्मा से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि केवल भगवान की कृपा से ही बचाया जा सकता है। भगवान का पूर्ण स्वरूप, उनके दिव्य आयुध, दिव्य आभूषण और उनके शील गुण – ये सभी भक्त के पूर्ण समर्पण के कारण बनते हैं।

वेदांत देशिक कहते हैं कि अष्टभुज भगवान अपनी दया, ज्ञान और शक्ति से शरणागतों का भार सदैव अपनी भुजाओं में लेते हैं। 'जब उनकी करुणा हो तो भय कहाँ से आ सकता है? और जब वे क्रोधित हों तो कौन रक्षा कर सकता है?' – इन पंक्तियों के माध्यम से देशिक भक्त की पूर्ण अधीनता का वर्णन करते हैं। यह भगवान पर पूर्ण विश्वास और निर्भरता को दर्शाता है, जहाँ भक्त यह स्वीकार करता है कि भगवान ही एकमात्र रक्षक और भय-निवारक हैं। भक्त यदि शरणागति में स्थिर रहता है, चाहे जीवन में कितनी भी उथल-पुथल क्यों न हो, अष्टभुज परमात्मा उसे अपनी छत्रछाया में सुरक्षित रखते हैं।

अंत में, कवि प्रार्थना करते हैं कि भगवत् कृपा से उन्हें भगवान के चरण-कमलों की सेवा, नित्य कैंकर्य और जन्म-जन्मांतर तक अनवरत भक्ति प्राप्त होती रहे। यह स्तोत्र केवल काव्यात्मक प्रशंसा नहीं है, बल्कि दैवी कृपा के माध्यम से पूर्ण समर्पण, सुरक्षा और आंतरिक परिवर्तन की एक समग्र आध्यात्मिक घोषणा है। अष्टभुज भगवान की करुणा, शक्ति और शील भक्त के हृदय से भय को मिटाकर परमानंद से भर देते हैं, जिससे एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होता है।

लाभ (Benefits):

  • शरणागति का भाव दृढ़ होता है: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव मजबूत होता है, जिससे मन को शांति और स्थिरता मिलती है।
  • भय, चिंता और संकटों का निवारण: संकट के समय या मन में भय और चिंता होने पर इसका पाठ करने से दैवी सुरक्षा प्राप्त होती है और नकारात्मक भावनाएं दूर होती हैं।
  • भगवान का अनुग्रह, सुरक्षा और करुणा: अष्टभुज भगवान को शरणागत होने से उनकी अपार करुणा, अनुग्रह और सभी प्रकार की आपदाओं से सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • भक्ति, विश्वास और आंतरिक शक्ति में वृद्धि: भगवान की शक्ति और करुणा का वर्णन करने वाला यह स्तोत्र भक्तों में भक्ति, विश्वास और आध्यात्मिक धैर्य को बढ़ाता है।
  • जीवन में दैवाधीनता और सत्संकल्पों का सुदृढ़ीकरण: यह स्तोत्र यह बोध कराता है कि जीवन में सब कुछ भगवान की इच्छा के अधीन है, जिससे सत्कर्म करने के संकल्प मजबूत होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री अष्टभुजाष्टकं क्या है?
यह श्री वेदांत देशिकाचार्य द्वारा रचित भगवान विष्णु के अष्टभुज (आठ भुजाओं वाले) रूप को समर्पित एक भक्ति स्तोत्र है। यह भगवान से संकटों में रक्षा और करुणा की प्रार्थना करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
संकट के समय, भय या चिंता होने पर, या नित्य रूप से भगवान की कृपा और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए इस स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है।
श्री अष्टभुजाष्टकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से भय और चिंताएं दूर होती हैं तथा मन को शांति मिलती है। भगवान की कृपा, सुरक्षा और करुणा प्राप्त होती है, जिससे भक्ति और विश्वास बढ़ता है।
किसे इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
भगवान विष्णु के भक्त, विशेषकर वे जो जीवन में संकटों, भय और चिंताओं का सामना कर रहे हैं, तथा दैवी सुरक्षा और शरणागति की इच्छा रखते हैं, वे इसका पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
व्यक्ति अपनी श्रद्धा और समय के अनुसार प्रतिदिन एक बार या उससे अधिक बार इसका पाठ कर सकता है। नियमित पाठ से सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं।
श्री अष्टभुजाष्टकं की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
यह स्तोत्र 13वीं शताब्दी के महान दार्शनिक और कवि श्री वेदांत देशिकाचार्य द्वारा रचित है। यह उनकी अनेक भक्तिपूर्ण रचनाओं में से एक है।

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