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श्री अनंतपद्मनाभ मंगळ स्तोत्रं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री अनंतपद्मनाभ मंगळ स्तोत्रं

श्रियःकांताय कळ्याणनिधये निधयेऽर्थिनां |
श्रीशेषशायिने अनंतपद्मनाभाय मंगळं || 1 ||

स्यानंदूरपुरीभाग्यभव्यरूपाय विष्णवे |
आनंदसिंधवे अनंतपद्मनाभाय मंगळं || 2 ||

हेमकूटविमानांतः भ्राजमानाय हारिणे |
हरिलक्ष्मीसमेताय पद्मनाभाय मंगळं || 3 ||

श्रीवैकुंठविरक्ताय शंखतीर्थांबुधेः तटे |
रमया रममाणाय पद्मनाभाय मंगळं || 4 ||

अशेष चिदचिद्वस्तुशेषिणे शेषशायिने |
अशेषदायिने अनंतपद्मनाभाय मंगळं || 5 ||

यत्पदं परमं सेव्यं सदा पश्यंति सूरयः |
सेनापतिमुखास्तस्मै पद्मनाभाय मंगळं || 6 ||

चुतुर्मुखेश्वरमुखैः पुत्रपौत्रादिशालिने |
समस्तपरिवाराय पद्मनाभाय मंगळं || 7 ||

दिवाकरयतीशानयोगिहृत्पद्मभानवे |
परस्मै ब्रह्मणे अनंतपद्मनाभाय मंगळं || 8 ||

परांकुशप्रबंधोक्तिप्रथिताय परमात्मने |
पूर्णाय महते अनंतपद्मनाभाय मंगळं || 9 ||

वंचिभूपशिरोरत्नरश्मिनीराजितांघ्रये |
वांछिताखिलदायास्तु पद्मनाभाय मंगळं || 10 ||

सर्वावयवसौंदर्य सौवर्णसुषमा जुषे |
सदा सम्मोहनायास्तु पद्मनाभाय मंगळं || 11 ||

योगेश्वराय कृष्णाय नरसिंहाय योगिने |
योगमुद्राभिरामाय पद्मनाभाय मंगळं || 12 ||

अनंतपुरनाथाय निरंतरदयामुचे |
अनंतपद्मनाभाय नित्यश्रीः नित्यमंगळं || 13 ||

इति श्री अनंतपद्मनाभ मंगळ स्तोत्रं |

अर्थ

"श्री अनंतपद्मनाभ मंगळ स्तोत्रं" भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप, श्री अनंतपद्मनाभ स्वामी को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और मंगलकारी स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान के दिव्य गुणों, उनके महिमामयी रूप और भक्तों को प्राप्त होने वाले सौभाग्य का सुंदर वर्णन करता है। तिरुवनंतपुरम में शेषनाग पर विराजमान श्री अनंतपद्मनाभ स्वामी भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले करुणामय देवता के रूप में पूजे जाते हैं। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त होता है।

यह स्तोत्र केवल भगवान के गुणों का गान नहीं करता, बल्कि उनकी दिव्य लीलाओं और उनमें निहित परम चैतन्य को भी उजागर करता है। अनंतपद्मनाभ वैकुंठ के अधिपति हैं, जो लक्ष्मी के साथ आनंद सागर में विहार करते हुए दिव्य रूप में विराजमान हैं। वे समस्त चेतन और अचेतन वस्तुओं के स्वामी और पालक हैं। उनके चरण कमल सभी देवताओं, योगियों और सिद्ध पुरुषों द्वारा पूजे जाने वाले परम श्रेष्ठ स्थान हैं। यह स्तोत्र भगवान की अनंत करुणा, उनकी सर्वव्यापकता और उनका आश्रय लेने वालों को मिलने वाले मोक्ष मार्ग का भक्तिमय वर्णन करता है।

प्रथम श्लोक में श्री अनंतपद्मनाभ को लक्ष्मी के प्रिय, सभी मंगलों के निधि, याचकों के लिए आशा के भंडार और शेषनाग पर शयन करने वाले के रूप में स्तुति की गई है। दूसरा श्लोक उन्हें स्यानंदूरपुरी (तिरुवनंतपुरम) के भाग्यशाली स्वरूप और आनंद के सागर के रूप में महिमामंडित करता है। तीसरा श्लोक हेमकुट विमान में, यानी स्वर्ण विमान में, लक्ष्मी के साथ प्रकाशित उनके सौंदर्य का वर्णन करता है। शंखतीर्थ के तट पर लक्ष्मी के साथ रमण करने की उनकी दिव्य लीला का वर्णन चौथे श्लोक में है, जो वैकुंठ का त्याग कर (या भूलोक के वैकुंठ में निवास कर) भक्तों पर कृपा करने की उनकी उदारता को दर्शाता है।

पांचवां श्लोक उन्हें समस्त चेतन-अचेतन वस्तुओं के स्वामी, शेषशायी और सब कुछ प्रदान करने वाले दाता के रूप में प्रशंसित करता है। छठे श्लोक में कहा गया है कि उनके परम चरणों की सेवा सूर्य आदि देवता और सेनापति (कार्तिकेय) जैसे प्रमुख हमेशा करते हैं। सातवें श्लोक में, उन्हें चतुर्मुख ब्रह्मा, ईश्वर आदि देवताओं और पुत्र-पौत्रादि को भी आशीर्वाद देने वाले, समस्त परिवार के रक्षक के रूप में सराहा गया है। आठवां श्लोक उन्हें दिवाकर (सूर्य) जैसे यतियों और योगियों के हृदय कमल में प्रकाशित होने वाले सूर्य के समान, परब्रह्म स्वरूप के रूप में पहचानता है। नौवां श्लोक उन्हें परांकुश प्रबंधों (नम्माழ்वार के दिव्य प्रबंधों) द्वारा कीर्तिमान परम आत्मा के रूप में, पूर्ण और महान शक्ति के रूप में वर्णित करता है। इस प्रकार, यह स्तोत्र भगवान अनंतपद्मनाभ की सर्वव्यापकता, दिव्यता और मंगलमय गुणों को हृदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत करता है।

प्रयोजन (Benefits):

  • **ऐश्वर्य और समृद्धि:** अनंतपद्मनाभ स्वामी की आराधना जीवन में सभी प्रकार के ऐश्वर्य, धन और समृद्धि लाती है। आर्थिक बाधाएं दूर होती हैं और प्रगति संभव होती है।
  • **मानसिक शांति और भक्ति:** इस स्तोत्र का पाठ मन को असीम शांति प्रदान करता है और भगवान के प्रति अटूट भक्ति विकसित करता है। यह आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने में सहायक है।
  • **पारिवारिक सुख और सुरक्षा:** भगवान की कृपा से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। बच्चों की उन्नति और परिवार के सदस्यों को सभी प्रकार की दैवीय सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • **स्वास्थ्य और दीर्घायु:** अनंतपद्मनाभ मंगल स्तोत्र का पाठ उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और सभी रोगों से मुक्ति प्रदान करता है।
  • **मनोवांछित फल प्राप्ति:** भक्तों की सभी सद्भावनापूर्ण इच्छाएं पूरी होती हैं। इष्ट सिद्धि और जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री अनंतपद्मनाभ मंगळ स्तोत्रं क्या है?
यह भगवान विष्णु के अनंतपद्मनाभ स्वरूप की स्तुति करने वाली एक मंगलकारी प्रार्थना है। यह स्तोत्र भगवान के दिव्य गुणों और भक्तों को उनके द्वारा प्रदान किए जाने वाले शुभ फलों का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम, विशेष रूप से गुरुवार और वैष्णव त्योहारों पर करना श्रेष्ठ होता है। किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले इसका पाठ करना लाभदायक माना जाता है।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से ऐश्वर्य, समृद्धि, मानसिक शांति, पारिवारिक सुख, दैवीय सुरक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। यह आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान अनंतपद्मनाभ में श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से धन, संतान, शांति और मोक्ष की इच्छा रखने वाले इसे पढ़ सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम एक बार या 3, 5, 11, 108 बार भक्तिपूर्वक पाठ किया जा सकता है। संख्या से अधिक भक्ति और श्रद्धा महत्वपूर्ण है।
इस स्तोत्र का मूल या स्रोत क्या है?
यह मंगल स्तोत्र हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा में, विशेष रूप से तिरुवनंतपुरम के श्री अनंतपद्मनाभ स्वामी मंदिर की आराधना के भाग के रूप में विकसित हुआ है। इसके रचयिता के बारे में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह प्राचीन काल से प्रचलित है।

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