श्री आद्या स्तोत्रं
ब्रह्मोवाच |
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि आद्यास्तोत्रं महाफलं |
यः पठेत् सततं भक्त्या स एव विष्णुवल्लभः || 1 ||
मृत्युर्व्याधिभयं तस्य नास्ति किंचित् कलौ युगे |
अपुत्रा लभते पुत्रं त्रिपक्षं श्रवणं यदि || 2 ||
द्वौ मासौ बंधनान्मुक्ति विप्रवक्त्रात् श्रुतं यदि |
मृतवत्सा जीववत्सा षण्मासं श्रवणं यदि || 3 ||
नौकायां संकटे युद्धे पठनाज्जयमाप्नुयात् |
लिखित्वा स्थापयेद्गेहे नाग्निचौरभयं क्वचित् || 4 ||
राजस्थाने जयी नित्यं प्रसन्नाः सर्वदेवता |
ॐ ह्रीं |
ब्रह्माणी ब्रह्मलोके च वैकुंठे सर्वमंगळा || 5 ||
इंद्राणी अमरावत्यामंबिका वरुणालये |
यमालये कालरूपा कुबेरभवने शुभा || 6 ||
महानंदाग्निकोणे च वायव्यां मृगवाहिनी |
नैरृत्यां रक्तदंता च ऐशान्यां शूलधारिणी || 7 ||
पाताळे वैष्णवीरूपा सिंहले देवमोहिनी |
सुरसा च मणिद्विपे लंकायां भद्रकाळिका || 8 ||
रामेश्वरी सेतुबंधे विमला पुरुषोत्तमे |
विरजा औड्रदेशे च कामाक्ष्या नीलपर्वते || 9 ||
काळिका वंगदेशे च अयोध्यायां महेश्वरी |
वाराणस्यामन्नपूर्णा गयाक्षेत्रे गयेश्वरी || 10 ||
कुरुक्षेत्रे भद्रकाळी व्रजे कात्यायनी परा |
द्वारकायां महामाया मथुरायां महेश्वरी || 11 ||
क्षुधा त्वं सर्वभूतानां वेला त्वं सागरस्य च |
नवमी शुक्लपक्षस्य कृष्णस्यैकादशी परा || 12 ||
दक्षसा दुहिता देवी दक्षयज्ञविनाशिनी |
रामस्य जानकी त्वं हि रावणध्वंसकारिणी || 13 ||
चंडमुंडवधे देवी रक्तबीजविनाशिनी |
निशुंभशुंभमथिनी मधुकैटभघातिनी || 14 ||
विष्णुभक्तिप्रदा दुर्गा सुखदा मोक्षदा सदा |
आद्यास्तवमिमं पुण्यं यः पठेत् सततं नरः || 15 ||
सर्वज्वरभयं न स्यात् सर्वव्याधिविनाशनं |
कोटितीर्थफलं तस्य लभते नात्र संशयः || 16 ||
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः |
नारायणी शीर्षदेशे सर्वांगे सिंहवाहिनी || 17 ||
शिवदूती उग्रचंडा प्रत्यंगे परमेश्वरी |
विशालाक्षी महामाया कौमारी शंखिनी शिवा || 18 ||
चक्रिणी जयदात्री च रणमत्ता रणप्रिया |
दुर्गा जयंती काळी च भद्रकाळी महोदरी || 19 ||
नारसिंही च वाराही सिद्धिदात्री सुखप्रदा |
भयंकरी महारौद्री महाभयविनाशिनी || 20 ||
इति श्रीब्रह्मयामले ब्रह्मनारदसंवादे श्री आद्या स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री आद्या स्तोत्रं भगवती आद्याशक्ति की सर्वव्यापकता, महिमा और रक्षा शक्ति का वर्णन करने वाला एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। ब्रह्मा जी ने नारद जी को इस स्तोत्र का उपदेश दिया था, जिसमें आद्याशक्ति को ब्रह्मांड के प्रत्येक लोक, प्रत्येक खंड और प्रत्येक शक्तिपीठ में विभिन्न शक्ति रूपों में विस्तृत रूप से पहचाना गया है। यह स्तोत्र कहता है कि जो भक्त इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ता है, वह भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हो जाता है और उसे आदिशक्ति का पूर्ण संरक्षण प्राप्त होता है।
स्तोत्र के प्रारंभिक श्लोकों में इसके पाठ से प्राप्त होने वाले महान फलों का वर्णन किया गया है। भक्त को मृत्यु, रोगभय, अकाल मृत्यु और आपदाएं कभी नहीं घेरतीं। निस्संतान को पुत्र की प्राप्ति होती है, बंधनों में फंसे लोग दो महीने के भीतर मुक्त हो जाते हैं। मृत शिशु वाली माताओं को जीवित पुत्र का आशीर्वाद मिलता है। युद्ध या किसी भी संकट में पाठ करने से विजय प्राप्त होती है। इसे लिखकर घर में रखने से चोरी और अग्नि भय समाप्त हो जाता है। राजदरबार में (न्यायालयों और प्रशासनिक मामलों में) नित्य विजय मिलती है और सभी देवता प्रसन्न होते हैं।
स्तोत्र का मध्य भाग देवी के अनेक अवतारों और उनके विभिन्न देशों, तटों, पर्वतों, युद्धक्षेत्रों और तीर्थों में स्थित रूपों का एक-एक करके दर्शन कराता है। वह ब्रह्मलोक में ब्रह्माणी, वैकुंठ में सर्वमंगला, इंद्र की अमरावती में इंद्राणी, वरुण के लोक में अंबिका, यमलोक में कालरूपा, कुबेर के भवन में शुभा, अग्निकोण में महानंदा, वायव्य में मृगवाहिनी, नैऋत्य में रक्तदंता और ईशान में शूलधारिणी के रूप में निवास करती हैं। पाताल में वह वैष्णवी, सिंहल में देवमोहिनी, मणिद्वीप में सुरसा और लंका में भद्रकालिका हैं। रामेश्वर में रामेश्वरी, पुरुषोत्तम में विमला, काशी में अन्नपूर्णा, गया में गयाेश्वरी, कुरुक्षेत्र में भद्रकाली, द्वारका में महामाया और मथुरा में माहेश्वरी के रूप में वह प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार, आद्याशक्ति हर क्षेत्र, हर तीर्थ और हर पवित्र स्थान पर अपने विभिन्न रूपों में भक्तों की रक्षा करती हैं।
फलश्रुति में कहा गया है कि इस स्तोत्र का पाठ करने वाले के सभी रोग, ज्वर, दृष्टिदोष और बाधाएं दूर हो जाती हैं। यह करोड़ों तीर्थ यात्राओं का फल प्रदान करता है और शांति व ऐश्वर्य प्रदान करता है। देवी जया, विजया, नारायणी, सिंहवाहिनी, शिवदूती, महामाया, दुर्गा, जयंती, काली, नारसिंही, वाराही जैसे रूपों में भक्त के चारों ओर एक सुरक्षा चक्र बनाती हैं। भयंकर शत्रु, रोग, भूत-प्रेत बाधाएं और अकाल मृत्यु का भय भक्त के पास नहीं आ सकता। संक्षेप में, श्री आद्या स्तोत्र आद्याशक्ति के सभी रूपों के आवाहन के माध्यम से भक्त के जीवन को शुभ फलों से भरने वाला एक दिव्य स्तोत्र है।
लाभ (Benefits):
- संपूर्ण सुरक्षा: मृत्यु, बीमारियों, अकाल दुर्घटनाओं और किसी भी प्रकार के भय से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
- पुत्र प्राप्ति: निस्संतान दंपतियों को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।
- बंधन मुक्ति: कारावास में फंसे या किसी भी बंधन में पड़े व्यक्ति शीघ्र ही मुक्त हो जाते हैं।
- युद्ध और संकटों में विजय: युद्ध, जल में, जंगल में, यात्रा में या किसी भी संकटपूर्ण स्थिति में विजय प्राप्त होती है।
- धन और संपत्ति की रक्षा: स्तोत्र को घर में रखने से चोरी, अग्नि दुर्घटनाओं और अन्य आपदाओं से बचाव होता है।
- न्याय और अधिकार में सफलता: न्यायालयीन मामलों और प्रशासनिक कार्यों में विजय तथा सफलता प्राप्त होती है।
- करोड़ों तीर्थयात्राओं का फल: इस स्तोत्र के पाठ से करोड़ों तीर्थयात्राओं का पुण्य फल मिलता है, साथ ही शांति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री आद्या स्तोत्रं क्या है?
श्री आद्या स्तोत्रं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री आद्या स्तोत्रं का पाठ करने के मुख्य लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
श्री आद्या स्तोत्रं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री आद्या स्तोत्रं का उद्गम क्या है?
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