श्री आदिशेष स्तवं
श्रीमद्विष्णुपदांभोज पीठायुत फणातलं |
शेषत्वैक स्वरूपं तं आदिशेषमुपास्महे || 1 ||
अनंतां दधतं शीर्षैः अनंतशयनायितं |
अनंते च पदे भांतं तं अनंतमुपास्महे || 2 ||
शेषे श्रियःपतिस्तस्य शेषभूतं चराचरं |
प्रथमोदाहृतिं तत्र श्रीमंतं शेषमाश्रये || 3 ||
वंदे सहस्रस्थूणाख्य श्रीमहामणिमंडपं |
फणा सहस्ररत्नौघैः दीपयंतं फणीश्वरं || 4 ||
शेषः सिंहासनी भूत्वा छत्रयित्वा फणावळिं |
वीरासनेनोपविष्टे श्रीशेऽस्मिन्नधिकं बभौ || 5 ||
पर्यंकीकृत्य भोगं स्वं स्वपंतं तत्र माधवं |
सेवमानं सहस्राक्षं नागराजमुपास्महे || 6 ||
शरदभ्ररुचिः स्वांक शयित श्यामसुंदरा |
शेषस्य मूर्तिराभाति चैत्रपर्व शशांकवत् || 7 ||
सौमित्री भूय रामस्य गुणैर्दास्यमुपागतः |
शेषत्वानुगुणं शेषः तस्यासीन्नित्यकिंकरः || 8 ||
अत्त्वालोकान् लयांबोधौ यदा शिशयिषुर्हरिः |
वटपत्रतनुः शेषः तल्पं तस्याभवत्तदा || 9 ||
पादुकीभूत रामस्य तदाज्ञां परिपालयन् |
पारतंत्र्येऽति शेषे त्वं शेष तां जानकीमपि || 10 ||
चिरं विहृत्य विपिने सुखं स्वपितुमिच्छतोः |
सीताराघवयोरासेदुपधानां फणीश्वरः || 11 ||
देवकीगर्भमाविश्य हरेस्त्रातासि शेष भोः |
सत्संतानार्थिनस्तस्मात् त्वत्प्रतिष्टां वितन्वते || 12 ||
गृहीत्वा स्वशिशुं याति वसुदेवे व्रजं द्रुतं |
वर्ष त्री भूय शेष त्वं तं रिरक्षिषुरन्वगाः || 13 ||
प्रसूनद्भिः फणारत्नैः निकुंजे भूय भोगिराट् |
राधामाधवयोरासीत् संकेतस्थानमुत्तमं || 14 ||
भगवच्छेषभूतैस्त्वं अशेषैः शेष गीयसे |
आदिशेष इति श्रीमान् सार्थकं नाम ते ततः || 15 ||
अनंतश्चास्मि नागानां इति गीतासु सन्नुतः |
अनंतोऽनंतकैंकर्य संपदाप्येत्यनंत तां || 16 ||
अहो विविधरोऽप्येषः शेषः श्रीपति सेवनात् |
सहस्रशीर्ष्योऽनंतोऽभूत् सहस्राक्षः सहस्रपात् || 17 ||
हरेः श्रीपाद चिह्नानि धत्ते शीर्षैः फणीश्वरः |
चिह्नानि स्वामिनो दासैः धर्तव्यानिति बोधयन् || 18 ||
अनंत सेविनः सर्वे जीर्णां त्वचमिवोरगः |
विमुच्य विषयासक्तिं शेषत्वे कुर्वते रतिं || 19 ||
श्री श्रीशनाय साहस्रीं युगपत्परिकीर्तयन् |
सहस्रवदनः शेषो नूनं द्विरसनोऽभवत् || 20 ||
अन्योन्य वैरमुत्सृज्य फणीश्वर खगेश्वरौ |
शयनं वाहनं विष्णोः अभूतां त्वत्पदाश्रयौ || 21 ||
वपुः शब्दमनोदोषान्विरस्य शृतिगोचरं |
दर्शयंतं परब्रह्मं तं शेषं समुपास्महे || 22 ||
शेषतल्पेन रंगेशः शेषाद्रौ वेंकटेश्वरः |
हस्ति काळेश्वरः शेष भूषणेन विराजते || 23 ||
भवत्पादुकात्वं ते महत्त्वा पादुको गुणः |
शिरसा धारयंति त्वां भक्त्या शेषयः स मे || 24 ||
भागवत शेषतायाः महत्त्वमावेदयन्नयं शेषः |
गुरुरस्य वामपादे विष्णोर्वाहस्य वीरकटकमाभूत् || 25 ||
शेषः पीतांबरं विष्णोः तद्विष्णुधृतमंबरं |
शेषवस्त्रमिति ख्यात्या भक्त सम्मान्यतां गतं || 26 ||
दुर्मतिं जननीं त्यक्त्वा श्रीपतिं शरणं गतः |
तेन दत्त्वाभयोऽनंतः तस्यासेन्नित्यकिंकरः || 27 ||
गर्गाय मुनये ज्योतिर्विद्यां यः समुपादिशत् |
देवर्षिगणसंपूज्यं तं अनंतमुपास्महे || 28 ||
वंदेऽनंतं मुदाभांतं रुचा श्वेतं सुरार्चितं |
हरिपादाब्ज शरणं तदीयास्याब्ज तोषणं || 29 ||
श्रीमते विष्णुभक्ताय शंखचक्रादिधारिणे |
वारुणी कीर्ति सहितायानंतायास्तु मंगळं || 30 ||
इमं स्तुतिं अनंतस्य भक्त्या नित्यं पठंति ये |
सर्पबाधा न तेषां स्यात् पुत्रिणः स्युः हरेः प्रियाः || 31 ||
इति श्रीआदिशेष स्तवं ||
अर्थ
श्री आदिशेष स्तवं भगवान नारायण के नित्य सेवक आदिशेष की महिमा का बखान करने वाला एक दिव्य स्तोत्र है। श्रीमन नारायण के चरण-कमलों का आसन, शयन स्थान, छत्र, वाहन और एक परमनिष्ठ सहचर के रूप में आदिशेष सदैव उनकी सेवा में लीन रहते हैं। यह स्तोत्र आदिशेष की अनंत महिमा, उनकी अटूट भक्ति और भगवान के प्रति उनके त्याग को उजागर करता है। आदिशेष भगवान विष्णु की प्रत्येक दिव्य आवश्यकता के अनुसार स्वयं को रूपांतरित करने की क्षमता रखते हैं। उनका अस्तित्व शुद्धता और आध्यात्मिक चमक से ओत-प्रोत है, जो अनंत शक्ति, भक्ति और पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।
आदिशेष केवल सर्पों के राजा नहीं हैं, वे अनंत शक्ति, शुद्ध ज्ञान और अचल भक्ति के प्रतीक हैं। उनके सहस्र फण अनंत ज्ञान और सुरक्षा का प्रतीक हैं। वे भगवान विष्णु के चरण-कमलों को अपने सहस्र फणों पर धारण करते हैं और अनमोल रत्नों की चमक से लोकों को प्रकाशित करने वाले परम पूजनीय देवता के रूप में पूजे जाते हैं। स्तोत्र के प्रारंभिक श्लोकों में उन्हें श्रीमन नारायण के चरण-कमलों को धारण करने वाले, हजारों फणों से सुशोभित और अनेक रत्नों के प्रकाश से लोकों को प्रकाशित करने वाले सर्वोच्च के रूप में स्तुति की जाती है। उनका प्रत्येक रूप भगवान की सेवा में समर्पित है, जो दास्य भाव का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करता है।
यह स्तोत्र आदिशेष को भगवान विष्णु के लिए सिंहासन, छत्र, पलंग और शयन के रूप में परिवर्तित होने की क्षमता वाला बताता है। रामावतार में, उन्होंने लक्ष्मण के रूप में जन्म लिया और श्री रामचंद्र की आज्ञाओं का पालन करते हुए निरंतर सेवा करके अपनी शेषता को प्रकट किया। कृष्णावतार में, उन्होंने देवकी के गर्भ में प्रवेश करके कृष्ण की रक्षा में सहायता की, और जब वासुदेव कृष्ण को गोकुल ले जा रहे थे, तब वर्षा से बचाने के लिए अपने फणों को फैलाया। श्रीरंगम में वे रंगनाथ के शयन के रूप में, और तिरुमाला में शेषाद्रि के रूप में वेंकटेश को सेवा प्रदान करते हैं, इस प्रकार अनेक दिव्य स्वरूपों में स्वयं को भगवान विष्णु की चरण सेवा में समर्पित करते हैं।
राधा-माधव के मिलन स्थल वृंदावन के निकुंजों में रत्नजड़ित फणों से प्रकाश बिखेरने वाले भोगीराज आदिशेष ही हैं। उनका शरीर शुद्ध ज्ञान का स्वरूप है, जो भक्तों के मन से अज्ञान और अहंकार को दूर कर परब्रह्म के स्पष्ट दर्शन का मार्ग प्रशस्त करता है। भक्तों को अपने अहंकार को पुराने सर्प की केंचुल की तरह त्यागकर नित्य विष्णु भक्ति को बढ़ाना चाहिए, यही आदिशेष का तत्व है। देवर्षि, योगीश्वर और महर्षि सभी आदिशेष की महिमा का गुणगान करते हैं। इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से सर्प दोष दूर होते हैं, संतान सुख और श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है।
लाभ (Benefits):
- सर्प दोष और भय से मुक्ति: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से सर्प दोष, सर्प भय और अन्य अशुभताएँ दूर होती हैं।
- परिवार में शांति और संतान सुख: यह परिवार में सुरक्षा, सद्भाव और संतान प्राप्ति लाता है, जिससे घर में शांति बनी रहती है।
- विष्णु भक्ति और सेवा भाव में वृद्धि: भगवान विष्णु के प्रति भक्ति, दास्य भाव और निःस्वार्थ सेवा की भावना बढ़ती है, जो आध्यात्मिक उन्नति में सहायक है।
- अज्ञान और अहंकार का नाश: मन से अज्ञान, अहंकार दूर होकर शुद्धता, ज्ञान का प्रकाश और आत्मज्ञान बढ़ता है।
- श्रीहरि की कृपा प्राप्ति: आदिशेष की कृपा से श्रीमन नारायण की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में समृद्धि और सफलता आती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री आदिशेष स्तवं क्या है?
श्री आदिशेष स्तवं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री आदिशेष स्तवं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
श्री आदिशेष स्तवं का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना उचित है?
श्री आदिशेष स्तवं का मूल क्या है?
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