षेज् आरति
ओवाळूँ आरती माझ्या सद्गुरुनाथा माझा सायिनाथा |
पाचाही तत्त्वांचा दीप लाविला आताँ ||
निर्गुणाची स्थिती कैसी आकारा आली | बाबा आकारा आली |
सर्वाँ घटीँ भरूनि उरली सायी माऊली ||
ओवाळूँ आरती माझ्या सद्गुरुनाथा माझा सायिनाथा |
पाचाही तत्त्वांचा दीप लाविला आताँ || 1 ||
रज तम सत्व तिघे माया प्रसवली | बाबा माया प्रसवली |
मायेचिये पोटीँ कैसी माया उद्भवली ||
ओवाळूँ आरती माझ्या सद्गुरुनाथा माझा सायिनाथा |
पाचाही तत्त्वांचा दीप लाविला आताँ || 2 ||
सप्तसागरीँ कैसा खेळ मांडिला | बाबा खेळ मांडिला |
खेळूनीया खेळ अवघा विस्तार केळा ||
ओवाळूँ आरती माझ्या सद्गुरुनाथा माझा सायिनाथा |
पाचाही तत्त्वांचा दीप लाविला आताँ || 4 ||
ब्रह्मांडीची रचना कैसी दाखविली डोलाँ | बाबा दाखविली डोलाँ |
तुका म्हणे माझा स्वामी कृपाळू भोळा ||
ओवाळूँ आरती माझ्या सद्गुरुनाथा माझा सायिनाथा |
पाचाही तत्त्वांचा दीप लाविला आताँ || 4 ||
– 2। आरती ज्ञानरायाची –
आरती ज्ञानराजा | महाकैवल्यतेजा |
सेविती साधुसंत | मनु वेधला माझा |
आरती ज्ञानराजा ||
लोपलेँ ज्ञान जगीँ | हित नेणती कोणी |
अवतार पांडुरंग | नाम ठेविलेँ ज्ञानी || 1 ||
आरती ज्ञानराजा | महाकैवल्यतेजा |
सेविती साधुसंत | मनु वेधला माझा |
आरती ज्ञानराजा ||
कनकाचे ताट करीँ | उभ्या गोपिका नारी |
नारद तुंबरहो | सामगायन करी || 2 ||
आरती ज्ञानराजा | महाकैवल्यतेजा |
सेविती साधुसंत | मनु वेधला माझा |
आरती ज्ञानराजा ||
प्रगट गुह्य बोले | विश्व ब्रह्मचि केले |
रामजनार्दनीँ | पायी मस्तक ठेविलेँ || 3 ||
आरती ज्ञानराजा | महाकैवल्यतेजा |
सेविती साधुसंत | मनु वेधला माझा |
आरती ज्ञानराजा ||
– 3। आरती तुकारामाची –
आरती तुकारामा | स्वामी सद्गुरुधामा |
सच्चिदानंदमूर्ती | पाय दाखवीँ आम्हाँ ||
आरती तुकारामा ||
राघवेँ सागराँता | (जैसे) पाषाण तारीलेँ |
तैसे (हे) तुकोबाचे | अभंग (उदकी) रक्षिलेँ || 1 ||
आरती तुकारामा | स्वामी सद्गुरुधामा |
सच्चिदानंदमूर्ती | पाय दाखवीँ आम्हाँ ||
आरती तुकारामा ||
तुकिता तुलनेसी | ब्रह्म तुकासी आलेँ |
म्हणोनी रामेश्वरेँ | चरणीँ मस्तक ठेविलेँ || 2 ||
आरती तुकारामा | स्वामी सद्गुरुधामा |
सच्चिदानंदमूर्ती | पाय दाखवीँ आम्हाँ ||
आरती तुकारामा ||
– 4। जय जय सायीनाथ –
जय जय सायिनाथ आताँ पहुडावेँ मंदिरीँ हो | ( * 2 *)
आळवितो सप्रेमेँ तुजला आरति घेउनि करीँ हो |
जय जय सायिनाथ आताँ पहुडावेँ मंदिरीँ हो ||
रंजविसी तू मधुर बोलुनी माय जशी निज मुला हो | ( * 2 * )
भोगिसि व्याधी तूँच हरूनिया निजसेवकदुःखाला हो | ( * 2 * )
धाँवुनि भक्तव्यसन हरिसी दर्शन देसी त्याला हो | ( * 2 * )
झाले असतील कष्ट अतिशय तुमचे या देहाला हो || 1 ||
जय जय सायिनाथ आताँ पहुडावेँ मंदिरीँ हो |
आळवितो सप्रेमेँ तुजला आरति घेउनि करीँ हो |
जय जय सायिनाथ आताँ पहुडावेँ मंदिरीँ हो ||
क्षमा शयन सुंदर ही शोभा सुमनशेज त्यावरी हो | ( * 2 * )
घ्यावी थोडी भक्तजनांची पूजनादि चाकरी हो | ( * 2 * )
ओवाळितोँ पंचप्राण ज्योति सुमती करीँ हो | ( * 2 * )
सेवा किंकर भक्त प्रीती अत्तर परिमळ वारी हो || 2 ||
जय जय सायिनाथ आताँ पहुडावेँ मंदिरीँ हो |
आळवितो सप्रेमेँ तुजला आरति घेउनि करीँ हो |
जय जय सायिनाथ आताँ पहुडावेँ मंदिरीँ हो ||
सोडुनि जाया दुःख वाटतेँ बाबांचा चरणाँसी हो |
सोडुनि जाया दुःख वाटतेँ सयींचा चरणाँसी हो |
आज्ञेस्तव हा आशीर्प्रसाद घेउनि निजसदनासी हो | ( * 2 * )
जातोँ आताँ येउँ पुनरपि त्वच्चरणांचे पाशीँ हो | ( * 2 * )
उठवू तुजला सायिमाउले निजहित साधायासी हो || 3 ||
जय जय सायिनाथ आताँ पहुडावेँ मंदिरीँ हो |
आळवितो सप्रेमेँ तुजला आरति घेउनि करीँ हो |
जय जय सायिनाथ आताँ पहुडावेँ मंदिरीँ हो ||
– 5। आताँ स्वामी –
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा अवधूता |
बाबा करा सायिनाथा |
चिन्मय हेँ सुखधामा जाउनि पहुडा एकांता ||
वैराग्याचा कुंचा घेउनि चौक झाडीला |
बाबा चौक झाडीला |
तयावरी सुप्रेमाचा शिडकावा दिधला ||
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा अवधूता |
बाबा करा सायिनाथा |
चिन्मय हेँ सुखधामा जाउनि पहुडा एकांता || 1 ||
पायघड्या घातल्या सुंदर नवविधा भक्ति |
बाबा नवविधा भक्ती |
ज्ञानांच्या समया लावुनि उजलळ्या ज्योती ||
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा अवधूता |
बाबा करा सायिनाथा |
चिन्मय हेँ सुखधामा जाउनि पहुडा एकांता || 2 ||
भावार्थाचा मंचक हृदयाकाशी टांगिला |
हृदयाकाशीँ टांगिला |
मनाची सुमने करूनि केलेँ शेजेला ||
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा अवधूता |
बाबा करा सायिनाथा |
चिन्मय हेँ सुखधामा जाउनि पहुडा एकांता || 3 ||
द्वैताँचे कपाट लावुनि एकत्र केलेँ |
बाबा एकत्र केलेँ |
दुर्बुद्धीच्या गाँठी सोडूनि पडदे सोडिले ||
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा अवधूता |
बाबा करा सायिनाथा |
चिन्मय हेँ सुखधामा जाउनि पहुडा एकांता || 4 ||
आशा तृष्णा कल्पनेचा साँडुनि गलबला |
बाबा साँडुनि गलबला |
दया क्षमा शांति दासी उभ्या सेवेला ||
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा अवधूता |
बाबा करा सायिनाथा |
चिन्मय हेँ सुखधामा जाउनि पहुडा एकांता || 5 ||
अलक्ष्य उन्मनी घेउनी (बाबा) नाजुक दुशाला |
बाबा नाजुक दुशाला |
निरंजन सद्गुरु स्वामी निजे शेजेला || (भेदः-निजविल)
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा अवधूता |
बाबा करा सायिनाथा |
चिन्मय हेँ सुखधामा जाउनि पहुडा एकांता || 6 ||
सद्गुरु सायिनाथ् महराज् की जै ||
श्रीगुरुदेव दत्त ||
– 6। प्रसाद मिळण्याकरितां –
पाहेँ प्रसादाची वाट | द्यावेँ धुवोनिँया ताट |
शेष घेउनी जायीन | तुमचेँ झालिया भोजन || 1 ||
झालोँ एकसवा | तुम्हा आळवोनीया देवा |
शेष घेउनी जायीन | तुमचेँ झालिया भोजन || 2 ||
तुका म्हणे चित्ता | करूनि राहिलो निवांत |
शेष घेउनी जायीन | तुमचेँ झालिया भोजन || 3 ||
– 7। प्रसाद मिळाल्यावर –
पावला प्रसाद आताँ विठोँ निजावेँ |
बाबा आता निजावे |
आपुला तो श्रम कळोँ येतसे भावेँ ||
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा गोपाळा |
बाबा सायी दयाळा |
पुरले मनोरथ जातो आपुले स्थळा || 1 ||
तुम्हाँसी जागवूँ आम्ही आपुल्या चाडा |
बाबा आपुल्या चाडा |
शुभाशुभ कर्मे दोष हरावया पीडा ||
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा गोपाळा |
बाबा सायी दयाळा |
पुरले मनोरथ जातो अपुले स्थळा || 2 ||
तुका म्हणे दिधिलेँ उच्छिष्टाँचे भोजन |
उच्छिष्टाँचे भोजन |
नाहीँ निवडिलेँ आम्हां आपुल्या भिन्न ||
आताँ स्वामी सुखेँ निद्रा करा गोपाळा |
बाबा सायी दयाळा |
पुरले मनोरथ जातो अपुले स्थळा || 3 ||
सद्गुरु सायीनाथ् महराज् की जै ||
राजाधिराज योगिराज परब्रह्म सायिनाथ् महाराज्
श्रीसच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ् महराज् की जै ||
अर्थ
“शेज आरती” (ओवाळू आरती, ज्ञानराय आरती, तुकाराम आरती, जय जय साईनाथ, आता स्वामी और प्रसाद वितरण) का यह संग्रह श्री साई/गुरु साधना से संबंधित एक गंभीर आरती परंपरा है। यह भगवान साईबाबा की रात्रि पूजा विधि है, जो दिन के अंत में उन्हें विश्राम देने और भक्तों द्वारा अपनी अंतिम प्रार्थना अर्पित करने का एक महत्वपूर्ण समय है। यह आरती केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गुरुभक्ति, ज्ञान और वैराग्य के मार्ग को दर्शाने वाला एक गहन आध्यात्मिक अनुभव है।
इस आरती का पहला भाग सद्गुरु साईनाथ के निर्गुण (निराकार) और साकार (सगुण) स्वरूप का आह्वान करता है। पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से प्रज्वलित दीपक जलाकर, सृष्टि पर उनके प्रभुत्व, आंतरिक शक्ति और तत्वानुभूति को पूजा के बल से आमंत्रित किया जाता है। यह साई माउली (माँ साई) के सभी प्राणियों में व्याप्त होने के सिद्धांत पर प्रकाश डालता है। बाद के भाग (ज्ञानराय, तुकाराम) भक्ति, ज्ञान, ऐश्वर्य और सत्कर्म सेवा जैसे गुणों को स्मरण कराते हैं। तुकाराम आचार्य के परिचय के साथ नमस्कार, सद्गुरु आश्रम की विनम्रता, सत्संग और भक्ति गीतों के साथ आरती को पूर्ण किया जाता है।
आरती में यह भी समझाया गया है कि रज, तम और सत्व नामक त्रिगुणों से माया कैसे उत्पन्न होती है, और कैसे माया स्वयं माया से ही उद्भव होती है, जो साईबाबा के मायातीत स्वरूप को इंगित करता है। यह साईबाबा के सप्तसागरों में खेलने की लीलाओं और उनकी विशाल सृष्टि के विस्तार का वर्णन करता है। यह बताता है कि कैसे उन्होंने ब्रह्मांड की रचना भक्तों को अपनी आँखों से दिखाई, जो सद्गुरु की दिव्य दृष्टि और कृपा को दर्शाता है। संत तुकाराम साईबाबा को कृपालु और भोला (सीधे स्वभाव का) बताते हैं, जो उनकी अनंत करुणा को उजागर करता है।
“जय जय साईनाथ” के वचन भक्ति की महिमा, भौतिक और आध्यात्मिक कष्टों से मुक्ति, साई दर्शन से प्राप्त आनंद, सेवकों के पालन और आशीर्वाद के परिणामों को संगीतमय रूप से गाते हैं। “आता स्वामी” खंड शांति, निर्वेकता (वैराग्य), गुरुभक्ति और हृदय की शुद्धि का वर्णन करता है, जो भक्ति को आंतरिक रूप से स्थापित करने के लिए मार्गदर्शन देता है। अंतिम भाग – प्रसाद मिलन और प्रसाद मिळाल्यावर – आरती के बाद श्रद्धापूर्वक प्रसाद बांटने की परंपरा, प्रसन्नता और दान-धर्म के महत्व की याद दिलाते हैं। यह संपूर्ण आरती संकलन गुरु-देवता के प्रति अनुराग को प्रोत्साहित करता है और भक्ति को शांति, धैर्य, शुद्धि और दिव्य आशीर्वाद प्रदान करता है। नियमानुसार और श्रद्धा से आरती करने तथा प्रसाद ग्रहण करने से जीवन में शांति, आध्यात्मिक प्रगति, परिवार कल्याण और अधिक भक्ति प्राप्त होती है।
लाभ (Benefits):
- मानसिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति: गुरु/साई कृपा से मन को असीम शांति मिलती है और आध्यात्मिक रूप से मजबूत होने में मदद मिलती है।
- अज्ञान का नाश और ज्ञान में वृद्धि: इस आरती के नियमित पाठ से अज्ञान दूर होता है, ध्यान शक्ति बढ़ती है और तत्वानुभूति होती है।
- कष्टों से मुक्ति और आशीर्वाद: भौतिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, और साईबाबा के दिव्य आशीर्वाद जीवन में शांति लाते हैं।
- सामाजिक सद्भाव और एकता: प्रसाद वितरण की परंपरा समुदाय में एकता और आपसी सहयोग की भावना को बढ़ावा देती है।
- सद्गुरु भक्ति और शुभ कार्य फल: श्रद्धापूर्वक पूजा करने से दिव्य मार्गदर्शन, निर्णय लेने की शक्ति और सभी शुभ कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिरडी साई शेज आरती क्या है?
शेज आरती कब और कैसे करनी चाहिए?
शेज आरती के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
शेज आरती का पाठ किसे करना चाहिए?
शेज आरती का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
शेज आरती का उद्गम या महत्व क्या है?
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