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काकड आरती

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काँकड आरती

– 1। जोडूनियाँ कर –

जोडूनियाँ कर चरणीँ ठेविला माथा |
परिसावी विनंती माझी पंढरीनाथा || 1 ||

असो नसो भाव आलोँ तुझिया ठाया |
कृपादृष्टीँ पाहेँ मजकडे सद्गुरुराया || 2 ||

अखंडित असावेँ ऐसे वाटतेँ पायीँ |
सांडूनी संकोच ठाव थोडासा देयी || 3 ||

तुकाम्हणे देवा माझी वेडीवाँकुडी |
नामेँ भवपाश हातीँ आपुल्या तोडी || 4 ||

– 2। उठा पांडुरंगा –

उठा पांडुरंगा प्रभातसमयो पातला |
वैष्णवांचा मेळा गरुडपारीँ दाटला || 1 ||

गरूडपारापासुनी महाद्वारापर्यंत |
सुरवरांची मांदी उभी जोडूनिया हात || 2 ||

शुकसनकादिक नारदतुंबुर भक्तांच्या कोटी |
त्रिशूल डमरू घेउनि उभा गिरिजेचा पती || 3 ||

कलीयुगीचा भक्त नामा उभा कीर्तनी |
पाठीमागेँ उभी डोला लावुनियाँ जनी || 4 ||

– 3। उठा उठा श्री सायिनाथ गुरु –

उठा उठा श्रीसायिनाथ गुरु चरणकमल दावा |
आधिव्याधि भवताप वारुनी तारा जडजीवा ||

गेली तुम्हाँ सोडुनियाँ भवतमरजनी विलया
परि ही अज्ञानासी तुमची भुलवि योगमाया |
शक्ति न अम्हाँ यत्किंचितही तिजला साराया
तुम्हीच तीतेँ सारुनि दावा मुख जन ताराया || 1 ||

भो सायिनाथ महाराज भवतिमिरनाशक रवी
अज्ञानी आम्ही किती तव वर्णावी थोरवी |
ती वर्णिताँ भागले बहुवदनि शेष विधि कवी
सकृप होउनि महिमा तुमचा तुम्हीच वदवावा || 2 ||

आधिव्याधि भवताप वारुनी तारा जडजीवा |
उठा उठा श्रीसायिनाथ गुरु चरण कमलदावा |
आधिव्याधि भवताप वारुनी तारा जडजीवा ||

भक्त मनीँ सद्भाव धरूनि जे तुम्हाँ अनुसरले
ध्यायास्तव ते दर्शन तुमचेँ द्वारिँ उभे ठेले |
ध्यानस्था तुम्हाँस पाहुनी मन अमुचेँ धाले
परि त्वद्वचनामृत प्राशायातेँ आतुर झाले || 3 ||

उघडूनी नेत्रकमाला दीनबंधु रमाकांता |
पाहिँ बा कृपादृष्टीँ बालका जशी माता |
रंजवी मधुरवाणी हरीँ ताप सायिनाथ || 4 ||

आम्हीच अपुले काजास्तव तुज कष्टवितो देवा |
सहन करीशी एकुनी द्यावी भेट कृष्ण धावाँ || 5 ||

उठा उठा श्री सायिनाथ गुरु चरणकमल दावा |
आधिव्याधि भवताप वारुनी तारा जडजीवा || 6 ||

– 4। दर्शन द्या –

उठा पांडुरंगा आताँ दर्शन द्या सकळाँ |
झाला अरुणोदय सरली निद्रेची वेळा || 1 ||

संत साधू मुनी अवघे झालेती गोळा |
सोडा शेजे सुखे आताँ बघुँ द्या मुखकमळा || 2 ||

रंगमंडपी महाद्वारीँ झालीसे दाटी |
मन उतावीळ रूप पहावया दृष्टी || 3 ||

राही रखुमाबाई तुम्हाँ येऊँ द्या दया |
शेजे हालवूनी जागेँ करा देवराया || 4 ||

गरूड हनुमंत उभे पाहती वाट |
स्वर्गीँचे सुरवर घेउनि आले बोभाट || 5 ||

झाले मुक्तद्वार लाभ झाला रोकडा |
विष्णुदास नामा उभा घेउनि काँकडा || 6 ||

– 5। पंचारती –

घेउनियाँ पंचारती |
करूँ बाबांसी आरती || 1 ||

उठा उठा हो बांधव |
ओँवाळूँ हा रमाधवा || 2 ||

करूनिया स्थिर मन |
पाहूँ गंभीर हेँ ध्यान || 3 ||

कृष्णनाथा दत्तसायी |
जडो चित्त तुझे पायी || 4 ||

– 6। चिन्मयरूप –

काँकड आरति करीतोँ सायीनाथ देवा |
चिन्मयरूप दाखवीँ घेउनि बालक लघुसेवा ||

काम क्रोध मद मत्सर आटुनी काँकडा केला |
वैराग्याचे तूप घालुनि मी तो भिजविला |
सायीनाथ गुरुभक्ति ज्वलनेँ तो मी पेटविला |
तद्वृत्ती जाळूनी गुरुनेँ प्रकाश पाडीला |
द्वैततमा नासूनी मिळवी तत्स्वरूपीँ जीवा |
चिन्मयरूप दाखवीँ घेउनि बालक लघुसेवा || 1 ||

काँकड आरति करीतोँ सायीनाथ देवा |
चिन्मयरूप दाखवीँ घेउनि बालक लघुसेवा ||

भूखेचर व्यापूनी अवघे हृत्कमलीँ राहसी |
तोचि दत्तदेव शिरडी राहुनी पावसी |
राहूनी येथे अन्यत्रहि तू भक्ताँस्तव धावसी |
निरसुनिया संकटा दासा अनुभव दाविसी |
न कळे त्वल्लीलाही कोण्या देवा वा मानवा |
चिन्मयरूप दाखवीँ घेउनि बालक लघुसेवा || 2 ||

काँकड आरति करीतोँ सायीनाथ देवा |
चिन्मयरूप दाखवीँ घेउनि बालक लघुसेवा ||

त्वद्यशदुंदुभीने सारे अंबर हेँ कोंदलेँ |
सगुण मूर्ति पाहण्या आतुर जन शिरडी आले |
प्राशुनी त्वद्वचनामृत अमुचे देहभान हरपलेँ |
सोडूनियाँ दुरभिमान मानस त्वच्चरणीँ वाहिले |
कृपा करूनियाँ सायिमाउले दास पदरी घ्यावा |
चिन्मयरूप दाखवीँ घेउनि बालक लघुसेवा || 3 ||

काँकड आरति करीतोँ सायीनाथ देवा |
चिन्मयरूप दाखवीँ घेउनि बालक लघुसेवा ||

– 7। पंडरीनाथा –

भक्तिचिया पोटीँ बोध काँकडा ज्योती |
पंचप्राण जीवेँभावे ओवाळूँ आरती ||

ओवाळूँ आरती माझ्या पंढरीनाथा | (माझ्या सायीनाथा)
दोन्ही कर जोडोनी चरणीँ ठेविला माथा || 1 ||

काय महिमा वर्णू आताँ सांगणे किती |
कोटी ब्रह्महत्या मुख पाहताँ जाती || 2 ||

रायी रखुमाबायी उभ्या दोघी दो बाहीँ |
मयूरपिच्छ चामरेँ ढाळिति ठायीँ ठायी || 3 ||

तुका म्हणे दीप घेउनि उन्मनीत शोभा |
विटेवरी उभा दिसे लावण्यगाभा ||

ओवाळूँ आरती माझ्या पंढरीनाथा | (माझ्या सायीनाथा)
दोन्ही कर जोडोनी चरणीँ ठेविला माथा || 4 ||

– 8। उठा उठा (पद) –

उठा साधुसंत साधा आपुलालेँ हित |
जाईल जाईल हा नरदेह मग कैँचा भगवंत || 1 ||

उठोनियाँ पहाटेँ बाबा उभा असे विटे |
चरण तयांचे गोमटे अमृतदृष्टी अवलोका || 2 ||

उठा उठा हो वेगेँसीँ चला जाउँया राउळासी |
जळतील पातकांच्या राशी काँकड आरती देखिलिया || 3 ||

जागेँ करा रुक्मिणीवर देव आहे निजसुराँत |
वेगेँ लिंबलोण करा दृष्ट होईल तयासी || 4 ||

दारीँ वाजंत्री वाजती ढोल दमामे गर्जती |
होतसेँ काँकड आरती माझ्या सद्गुरु रायाँची || 5 ||

सिंहनाद शंखभेरी आनंद होतसेँ महाद्वारी |
केशवराज विटेवरी नामा चरण वंदितो || 6 ||

– भजन –

सायिनाथ गुरु माझे आई |
मजला ठाव द्यावा पायीँ ||
दत्तराज गुरु माझे आई |
मजला ठाव द्यावा पायीँ ||

श्रीसच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ महाराज की जै |

– 9। श्री सायिनाथ प्रभाताष्टक –

(पृथ्वी)
प्रभातसमयीँ नभा शुभ रविप्रभा पाँकली
स्मरे गुरु सदा अशा समयिँ त्या छळे ना कली |
म्हणोनि कर जोडूनी करूँ आता गुरुप्रार्थना
समर्थ गुरु सायिनाथ पुरवी मनोवासना || 1 ||

तमा निरसि भानु हा गुरुहि नासि अज्ञानता
परंतु गुरुची करी न रविही कधीँ साम्यता |
पुन्हाँ तिमिर जन्म घे गुरुकृपेनि अज्ञान ना
समर्थ गुरु सायिनाथ पुरवी मनोवासना || 2 ||

रवि प्रगट होउनि त्वरित घालवी आलसा
तसा गुरुहि सोडवी सकल दुष्कृतीलालसा |
हरोनी अभिमानही जडवि त्वत्पदीँ भावना
समर्थ गुरु सायिनाथ पुरवी मनोवासना || 3 ||

गुरुसि उपमा दिसे विधिहरीहरांची उणी
कुठोनि मग येई ती कवनीँ या उगी पाहुणी |
तुझीच उपमा तुला बरवि शोभते सज्जना
समर्थ गुरु सायिनाथ पुरवी मनोवासना || 4 ||

समाधि उतरोनियाँ गुरु चला मशिदीकडे
त्वदीय वचनोक्ति ती मधुर वारिती साँकडेँ |
अजातरिपु सद्गुरु अखिलपातका भंजना
समर्थ गुरु सायिनाथ पुरवी मनोवासना || 5 ||

अहा सुसमयासि या गुरु उठोनियाँ बैसले
विलोकुनि पदाश्रिता त्वदिय आपदे नासिलेँ |
असा सुहितकारि या जगतिँ कोणिही अन्य ना
समर्थ गुरु सायिनाथ पुरवी मनोवासना || 6 ||

असे बहुत शाहणा परि न ज्या गुरुचि कृपा
न तत्स्वहित त्या कळे करितसे रिकाम्या गपा |
जरी गुरुपदा धरी सुधृड भक्तिनेँ तो मना
समर्थ गुरु सायिनाथ पुरवी मनोवासना || 7 ||

गुरो विनँति मी करीँ हृदयमंदिरीँ या बसा
समस्त जग हेँ गुरुस्वरूपची ठसो मानसा |
घडो सतत सत्कृती मतिहि दे जगत्पावना
समर्थ गुरु सायिनाथ पुरवी मनोवासना || 8 ||

(स्रग्धारा)
प्रेमेँ या अष्टकासी पढुनि गुरुवरा प्रार्थिती जे प्रभातीँ
त्यांचे चित्तासि देतोँ अखिल हरूनियाँ भ्रांति मी नित्य शांति |
ऐसेँ हेँ सायिनाथेँ कथुनि सुचविलेँ जेवि या बालकासी
तेँवी त्या कृष्णपायी नमुनि सविनयेँ अर्पितोँ अष्टकासी || 9 ||

श्रीसच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ महाराज की जै |

– 10। सायि रहं नजर् करना –

सायि रहं नजर् करना बच्चोँका पालन् करना |
सायि रहं नजर् करना बच्चोँका पालन् करना ||

जाना तुमने जगत्पसारा सब् हि झूठ् जमाना |
जाना तुमने जगत्पसारा सब् हि झूठ् जमाना |
सायी रहं नजर् करना बच्चोँका पालन् करना |
सायी रहं नजर् करना बच्चोँका पालन् करना || 1 ||

मैँ अंधा हूँ बंदा आप् का मुझ् को चरण दिखलाना |
मैँ अंधा हूँ बंदा आप् का मुझ् को प्रभु दिखलाना |
सायी रहं नजर् करना बच्चोँका पालन् करना |
सायी रहं नजर् करना बच्चोँका पालन् करना || 2 ||

दास गनू कहे अब् क्या बोलूँ थक् गयि मेरी रसना |
दास गनू कहे अब् क्या बोलूँ थक् गयि मेरी रसना |
सायी रहं नजर् करना बच्चोँका पालन् करना |
सायी रहं नजर् करना बच्चोँका पालन् करना || 3 ||

– 11। रहं नजर् करो –

रहं नजर् करो अब् मोरे सायीँ
तुम बिन नहीँ मुझे माँ बाप् भायी ||
रहं नजर् करो ||

मैँ अंधा हूँ बंदा तुम्हारा |
मैँ अंधा हूँ बंदा तुम्हारा |
मैँ ना जानूँ मै ना जानूँ
मैँ ना जानुँ अल्ला इलाही || 1
रहं नजर् करो ||

खाली जमाना मैँने गमाया |
खाली जमाना मैँने गमाया |
साथी आखिरी (का) साथी आखिरी (का)
साथी आखिरी तू और् न कोयी || 2
रहं नजर् करो ||

अप्ने मसीद् का झाडू गनू है |
अप्ने मसीद् का झाडू गनू है |
मालिक् हमारे मालिक् हमारे
मालिक् हमारे तुं बाबा सायी || 3
रहं नजर् करो ||

– 12। जनि पद –

तुज काय देऊँ सावळ्या मी खाया तरी |
मी दुबळी बटिक नाम्याची जाण श्रीहरी ||

उच्छिष्ट तुला देणेँ ही गोष्ट ना बरी |
तूँ जगन्नाथ तुज देऊँ कशी रे भाकरी ||

नको अंत मदीय पाहूँ सख्या भगवंता | श्रीकांता |
मध्याह्नरात्र उलटोनि गेली हि आताँ | आण चित्ता ||

जा होईल तुझा रे काँकडा कीँ राउळांतरीँ |
आणतील भक्त नैवेद्यहि नानापरी ||

तुज काय देऊँ सावळ्या मी खाया तरी |
मी दुबळी बटिक नाम्याची जाण श्रीहरी ||

– 13। श्रीसद्गुरु पद –

श्रीसद्गुरु बाबा सायी
तुजवांचुनि आश्रय नाहीँ भूतली ||

मी पापी पतित धीमंदा |
तारणेँ मला गुरुनाथा झढकरी || 1 ||

तूँ शांतिक्षमेचा मेरू |
तूँ भवार्णवीँचेँ तारूँ गुरुवरा || 2 ||

गुरुवरा मजसि पामरा,
अताँ उद्धरा,
त्वरित लवलाही,
मी बुडतो भवभय डोही उद्धरा || 3

श्रीसद्गुरु बाबा सायी
तुजवांचुनि आश्रय नाहीँ भूतली ||

श्रीसच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ महाराज की जै |

राजाधिराज योगिराज परब्रह्म सायिनाथ महराज् की जै |

अर्थ

काकड आरती शिरडी साईंबाबा या पांडुरंग को समर्पित एक पवित्र सुबह की आरती है, जो सूर्योदय से पहले की जाती है। 'काकड' शब्द का अर्थ है भोर का समय, और यह आरती भक्तों द्वारा अपने सद्गुरु को सुबह जगाने और उनके दिव्य आशीर्वाद के साथ दिन की शुरुआत करने के लिए की जाने वाली एक भक्तिपूर्ण प्रार्थना है। यह केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गुरु भक्ति की गहरी अभिव्यक्ति, आध्यात्मिक जागृति और दिव्य कृपा का आह्वान करने का एक शक्तिशाली माध्यम है। यह आरती पांडुरंग की भक्ति परंपरा से प्रेरित है और भक्तों को साईंबाबा के दर्शन और आशीर्वाद के लिए तैयार करती है।

यह आरती कई भागों में विभाजित है, और प्रत्येक भाग का अपना अनूठा आध्यात्मिक महत्व है। 'जोडूनिया कर चरणी ठेवीला माथा' का अर्थ है कि भक्त अपने हाथ जोड़कर और सिर गुरु के चरणों में रखकर पूर्ण समर्पण व्यक्त करता है। इसमें भक्त अपनी प्रार्थनाएँ और इच्छाएँ गुरु के सामने रखता है और उनकी कृपादृष्टि की कामना करता है। 'उठा पांडुरंगा' भाग भगवान पांडुरंग को सुबह जगाने का आह्वान है, जिसमें भक्तों की भीड़ उनके दर्शन के लिए इंतजार कर रही है। यह भगवान के दर्शन के लिए भक्तों की तीव्र लालसा और भक्ति को दर्शाता है।

'उठा उठा श्री साईंनाथ गुरु' भाग सीधे सद्गुरु साईंनाथ को संबोधित करता है, उनसे जागने और अपने चरण कमलों के दर्शन देने का अनुरोध करता है। भक्त साईंनाथ की कृपा से अपनी शारीरिक और मानसिक बीमारियों, सांसारिक कष्टों और अज्ञानता से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। साईंनाथ से प्रार्थना की जाती है कि वे अपने दिव्य प्रकाश से भक्तों के जीवन के अंधकार को दूर करें और उन्हें सत्य के मार्ग पर मार्गदर्शन करें। यह आरती केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि भक्तों के हृदय से निकली गहरी प्रेम, श्रद्धा और विश्वास की प्रतिध्वनि है।

कुल मिलाकर, काकड आरती गुरु भक्ति को मजबूत करती है, मन को शांति और स्थिरता प्रदान करती है, और आध्यात्मिक प्रगति में सहायता करती है। यह भक्तों को सद्गुरु के साथ गहरा संबंध स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है। साईंनाथ की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करने, उनकी कृपा प्राप्त करने और भवसागर को पार करने के लिए यह आरती एक दिव्य सेतु है।

लाभ (Benefits):

  • मानसिक शांति: इस आरती का पाठ करने या सुनने से मन को असीम शांति और स्थिरता मिलती है, चिंता और तनाव कम होते हैं।
  • आध्यात्मिक जागृति: यह गुरु भक्ति को मजबूत करती है और आध्यात्मिक चेतना को बढ़ाती है, जिससे जीवन में स्पष्टता और मार्गदर्शन मिलता है।
  • नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा: साईंनाथ की दिव्य कृपा भक्तों को बीमारियों, भय और अन्य नकारात्मक शक्तियों से बचाती है।
  • सामुदायिक एकता: सामूहिक रूप से काकड आरती में भाग लेने से भक्तों के बीच एकता और सद्भाव बढ़ता है, जिससे एक भक्तिमय वातावरण बनता है।
  • गुरु कृपा का अनुभव: सद्गुरु साईंनाथ की निकटता और उनके आशीर्वाद का अनुभव करने में मदद करती है, जिससे जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

काकड आरती क्या है?
काकड आरती शिरडी साईंबाबा या पांडुरंग को समर्पित एक पवित्र सुबह की आरती है, जो सूर्योदय से पहले की जाती है। यह अपने सद्गुरु को जगाने और उनके आशीर्वाद के साथ दिन की शुरुआत करने की एक भक्तिपूर्ण प्रार्थना है।
काकड आरती का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
काकड आरती का पाठ प्रतिदिन सुबह, सूर्योदय से पहले किया जाता है। भक्तों को स्नान करके, साईंबाबा की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाकर, पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका पाठ करना चाहिए।
काकड आरती के मुख्य लाभ क्या हैं?
काकड आरती का पाठ करने से मानसिक शांति, आध्यात्मिक जागृति, नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा, सामुदायिक एकता और सद्गुरु साईंनाथ की कृपा का अनुभव होता है। यह भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।
काकड आरती का पाठ कौन कर सकता है?
साईंबाबा या पांडुरंग में श्रद्धा और भक्ति रखने वाला कोई भी व्यक्ति काकड आरती का पाठ कर सकता है। इसमें कोई जाति, धर्म या लिंग का बंधन नहीं है, सभी इसका पाठ करके लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
काकड आरती का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
काकड आरती का पाठ आमतौर पर दिन में एक बार, सुबह के समय किया जाता है। नियमित रूप से प्रतिदिन इसका पाठ करना अधिक फलदायी होता है। भक्त अपनी सुविधा अनुसार पाठ कर सकते हैं।
काकड आरती का उद्गम क्या है?
काकड आरती पांडुरंग की भक्ति परंपरा से प्रेरित है। शिरडी में साईंबाबा के दर्शन के लिए भक्तों द्वारा उन्हें सुबह जगाने हेतु इसे विकसित किया गया था। यह साईंबाबा की दैनिक पूजा विधि का एक अभिन्न अंग है।

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