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धूप आरती

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धूप आरती

– 1। आरती –

आरती सायिबाबा सौख्यदातार जीवा |
चरणरजतालीँ द्यावा दासाँ विसावा भक्ताँ विसावा ||
आरती सायिबाबा ||

जाळुनियाँ अनंग स्वस्वरूपीँ राहे दंग |
मुमुक्षुजनाँ दावी निज डोळाँ श्रीरंग डोळाँ श्रीरंग || 1
आरती सायिबाबा ||

जया मनी जैसा भाव तया तैसा अनुभव |
दाविसी दयाघना ऐसी तुझी ही माव तुझी ही माव || 2
आरती सायिबाबा ||

तुमचे नाम ध्याता हरे संसृति व्यथा |
अगाध तव करणी मार्ग दाविसी अनाथा दाविसी अनाथा || 3
आरती सायिबाबा ||

कलियुगीँ अवतार सगुण(पर)ब्रह्म साचार |
अवतीर्ण झालासे स्वामी दत्त दिगंबर दत्त दिगंबर || 4
आरती सायिबाबा ||

आठाँ दिवसाँ गुरुवारीँ भक्त करिती वारी |
प्रभुपद पहावया भवभय निवारी भय निवारी || 5
आरती सायिबाबा ||

माझा निजद्रव्यठेवा तव चरण रज सेवा |
मागणेँ हेँचि आताँ तुम्हाँ देवाधिदेवा देवाधिदेवा || 6
आरती सायिबाबा ||

इच्छित दीन चातक निर्मल तोय निजसुख |
पाजावेँ माधवा या संभाळ आपुली भाक आपुली भाक || 7

आरती सायिबाबा सौख्यदातार जीवा |
चरणरजतालीँ द्यावा दासाँ विसावा भक्ताँ विसावा ||
आरती सायिबाबा ||

– 2। शिरडी माझे पंढरपुर –

शिरडी माझेँ पंढरपुर | सायिबाबा रमावर |
बाबा रमावर | सायिबाबा रमावर || 1

शुद्ध भक्ती चंद्रभागा | भाव पुंडलिक जागा |
पुंडलिक जागा | भाव पुंडलिक जागा || 2

या हो या हो अवघे जन | करु बाबांसी वंदन |
सायीसी वंदन | करु बाबांसी वंदन || 3

गणू म्हणे बाबा सायी | धाँव पाव माझे आयी |
पाव माझे आयी | धाँव पाव माझे आयी || 4

– 3। घालीन लोटांगन –

घालीन लोटांगन वंदीन चरण
डोळ्यानीँ पाहिन रूप तुझेँ |
प्रेमेँ आलिंगिन आनंदेँ पूजिन
भावेँ ओवाळिन म्हणे नामा || 1 ||

त्वमेव माता पिता त्वमेव
त्वमेव बंधु सखा त्वमेव |
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव || 2 ||

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावत् |
करोमि यद्यत्सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि || 3 ||

अच्युतं केशवं रामनारायणं
कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिं |
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं
जानकीनायकं रामचंद्रं भजे || 4 ||

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे |
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे || 5 ||

श्री गुरुदेव दत्त ||

– 4। नमस्काराष्टक –

अनंता तुला तेँ कसेँ रे स्तवावेँ
अनंता तुला तेँ कसेँ रे नमावेँ |
अनंता मुखांचा शिणे शेष गाताँ
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 1 ||

स्मरावेँ मनीँ त्वत्पदाँ नित्य भावेँ
उरावेँ तरी भक्तिसाठी स्वभावेँ |
तरावेँ जगा तारूनी मायताता
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 2 ||

वसे जो सदा दावया संतलीला
दिसे अज्ञ लोकांपरी जो जनाँला |
परी अंतरी ज्ञान कैवल्यदाता
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 3 ||

बरा लाधला जन्म हा मानवाचा
नरा सार्थका साधनीभूत साचा |
धरूँ सायिप्रेमा गळाया अहंता
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 4 ||

धरावेँ करीँ सान अल्पज्ञ बाला
करावेँ आम्हाँ धन्य चुंबोनि गाला |
मुखीँ घाल प्रेमेँ खरा ग्रास आताँ
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 5 ||

सुरादिक ज्यांच्या पदा वंदिताती
शुकादिक ज्यांतेँ समानत्व देती |
प्रयागादि तीर्थेपदीँ नम्र होताँ
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 6 ||

तुझ्या ज्या पदा पाहताँ गोपबाली
सदा रंगली चित्स्वरूपी मिळाली |
करी रासक्रीडा सवेँ कृष्णनाथा
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 7 ||

तुला मागतोँ मागणेँ एक द्यावेँ
करा जोडितोँ दीन अत्यंत भावेँ |
भवी मोहनीराज हा तारिँ आताँ
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 8 ||

– 5। ऐसा येयी बा –

ऐसा येयी बा | सायी दिगंबरा |
अक्षयरूप अवतारा |
सर्वहि व्यापक तूँ | शृतिसारा |
अनसूयात्रि कुमारा | बाबा येयी बा ||

काशी स्नान जप प्रतिदिवशीँ |
कोल्हापुर भिक्षेसी |
निर्मल नदि तुंगा जल प्राशी |
निद्रा माहुर देशीँ || 1
ऐसा येयी बा ||

झोळी लोंबतसे वाम करीँ |
त्रिशूल डमरूधारी |
भक्ता वरद सदा सुखकारी |
देशील मुक्ती चारी || 2
ऐसा येयी बा ||

पायी पादुका जपमाला |
कमंडलू मृगछाला |
धारण करिशी बा |
नागजटा मुकुट शोभतो माथाँ || 3
ऐसा येयी बा ||

तत्पर तुझ्या या जे ध्यानीँ |
अक्षय त्यांचे सदनीँ |
लक्ष्मी वास करी दिनरजनीँ |
रक्षिसि संकट वारूनि || 4
ऐसा येयी बा ||

या परिध्यान तुझेँ गुरुराया |
दृश्य करीँ नयनाँ या |
पूर्णानंदसुखेँ ही काया |
लाविसि हरिगुण गाया || 5

ऐसा येयी बा | सायी दिगंबरा |
अक्षयरूप अवतारा |
सर्वहि व्यापक तूँ | शृतिसारा |
अनसूयात्रि कुमारा | बाबा येयी बा ||

– 6। श्रीसायिनाथ महिम्न स्तोत्रं –

सदा सत्स्वरूपं चिदानंदकंदं
जगत्संभवस्थानसंहारहेतुं |
स्वभक्तेच्छयामानुषं दर्शयंतं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 1 ||

भवध्वांत विध्वंस मार्तंड मीड्यं
मनोवागतीतं मुनिर्ध्यानगम्यं |
जगद्व्यापकं निर्मलं निर्गुणं त्वां
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 2 ||

भवांभोधिमग्नार्दितानां जनानां
स्वपादाश्रितानां स्वभक्तिप्रियाणां |
समुद्धारणार्थं कलौ संभवंतं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 3 ||

सदा निंबवृक्षस्य मूलाधिवासात्
सुधास्राविणं तिक्तमप्यप्रियं तं |
तरुं कल्पवृक्षाधिकं साधयंतं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 4 ||

सदा कल्पवृक्षस्य तस्याधिमूले
भवद्भावबुद्ध्या सपर्यादिसेवां |
नृणां कुर्वतां भुक्तिमुक्तिप्रदं तं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 5 ||

अनेका शृता तर्क्य लीला विलासैः
समाविष्कृतेशान भास्वत् प्रभावं |
अहंभावहीनं प्रसन्नात्मभावं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 6 ||

सतां विश्रमाराममेवाभिरामं
सदा सज्जनैः संस्तुतं सन्नमद्भिः |
जनामोददं भक्तभद्रप्रदं तं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 7 ||

अजन्माद्यमेकं परं ब्रह्म साक्षात्
स्वयं संभवं राममेवावतीर्णं |
भवद्दर्शनात् संपुनीतः प्रभोऽहं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 8 ||

श्रीसायीश कृपानिधेऽखिलनृणां सर्वार्थसिद्धिप्रद
युष्मत्पादरजः प्रभावमतुलं धातापि वक्ताऽक्षमः |
सद्भक्त्या शरणं कृतांजलिपुटः संप्रापितोऽस्मि प्रभो
श्रीमत्सायिपरेशपादकमलान् नान्यच्छरण्यं मम || 9 ||

सायिरूपधर राघवोत्तमं
भक्तकामविबुधद्रुमं प्रभुं |
माययोपहतचित्तशुद्धये
चिंतयाम्यहमहर्निशं मुदा || 10 ||

शरत्सुधांशुप्रतिमप्रकाशं
कृपातपात्रं तव सायिनाथ |
त्वदीय पादाब्ज समाश्रितानां
स्वच्छायया तापमपाकरोतु || 11 ||

उपासनादैवत सायिनाथ
स्तवैर्मयोपासनिना स्तुतस्त्वं |
रमेन्मनो मे तव पादयुग्मे
भृंगो यथाब्जे मकरंदलुब्धः || 12 ||

अनेक जन्मार्जित पापसंक्षयो
भवेद्भवत्पादसरोज दर्शनात् |
क्षमस्व सर्वानपराधपुंजकान्
प्रसीद सायीश (सद्)गुरो दयानिधे || 13 ||

श्रीसायिनाथचरणामृतपूतचित्ता-
-स्तत्पादसेवनरताः सततं च भक्त्या |
संसारजन्यदुरितौघ विनिर्गतास्ते
कैवल्यधाम परमं समवाप्नुवंति || 14 ||

स्तोत्रमेतत् पठेद्भक्त्या यो नरस्तन्मनाः सदा |
सद्गुरुसायिनाथस्य कृपापात्रं भवेद्धृवं || 15 ||

– 7। श्रीगुरुप्रसाद याचना दशकं –

रुसो मम प्रियांबिका मजवरी पिताही रुसो
रुसो मम प्रियांगना प्रियसुतात्मजाही रुसो |
रुसो भगिनी बंधुही श्वशुर सासुबायि रुसो
न दत्तगुरु सायि मा मजवरी कधीहीँ रुसो || 1 ||

पुसो न सुनबायि त्या मज न भ्रातृजाया पुसो
पुसो न प्रिय सोयरे प्रिय सगे न ज्ञाती पुसो |
पुसो सुहृद ना सखा स्वजन नाप्तबंधू पुसो
परी न गुरु सायि मा मजवरी कधीहीँ रुसो || 2 ||

पुसो न अबला मुलेँ तरुण वृद्धही ना पुसो
पुसो न गुरु धाकुटेँ मज न थोर साने पुसो |
पुसो न च भलेबुरे सुजन साधुही ना पुसो
परी न गुरु सायि मा मजवरी कधीहीँ रुसो || 3 ||

रुसो चतुर तत्त्ववित् विबुध प्राज्ञ ज्ञानी रुसो
रुसोहि विदुषी स्त्रिया कुशल पंडिताही रुसो |
रुसो महिपती यती भजक तापसीही रुसो
न दत्तगुरु सायि मा मजवरी कधीहीँ रुसो || 4 ||

रुसो कवि ऋषी मुनी अनघ सिद्ध योगी रुसो
रुसो ही गृहदेवता नि कुलग्रामदेवी रुसो |
रुसो खल पिशाच्चही मलिन डाकिनीही रुसो
न दत्तगुरु सायि मा मजवरी कधीहीँ रुसो || 5 ||

रुसो मृग खग कृमी अखिल जीवजंतु रुसो
रुसो विटप प्रस्तरा अचल आपगाब्धी रुसो |
रुसो ख पवनाग्नि वार अवनि पंचतत्त्वेँ रुसो
न दत्तगुरु सायि मा मजवरी कधीहीँ रुसो || 6 ||

रुसो विमल किन्नरा अमल यक्षिणीही रुसो
रुसो शशि खगादिही गगनिँ तारकाही रुसो |
रुसो अमरराजही अदय धर्मराजा रुसो
न दत्तगुरु सायि मा मजवरी कधीहीँ रुसो || 7 ||

रुसो मन सरस्वती चपलचित्त तेँही रुसो
रुसो वपु दिशाखिला कठिण काल तोही रुसो |
रुसो सकल विश्वही मयि तु ब्रह्मगोळं रुसो
न दत्तगुरु सायि मा मजवरी कधीहीँ रुसो || 8 ||

विमूढ म्हणुनी हसो मज न मत्सराही डसो
पदाभिरुचि उल्हसो जननकर्दमीँ ना फसो |
न दुर्ग धृतिचा धसो अशिवभाव मागेँ खसो
प्रपंचि मन हेँ रुसो धृड विरक्ति चित्तीँ ठसो || 9 ||

कुणाचिही घृणा नसो न च स्पृहा कशाची असो
सदैव हृदयीँ वसो मनसि ध्यानिँ सायी वसो |
पदीँ प्रणय वोरसो निखिल दृश्य बाबा दिसो
न दत्तगुरु सायि मा उपरि याचनेला रुसो || 10 ||

– 8। पुष्पांजलि –

हरिः ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवा-
-स्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् |
ते ह नाकं महिमानः सचंत
यत्र पूर्वे साध्या संति देवाः ||

ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने
नमो वयं वैश्रवणाय कूर्महे |
स मे कामान् कामकामाय मह्यं
कामेश्वरो वैश्रवणो दधातु |
कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ||

ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भोज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं
पारमेष्ठ्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं
समंतपर्यायी स्यात्सार्वभौमः सार्वायुष आँतादापरार्धात्
पृथिव्यैसमुद्रपर्यंतायाः एकराळिति ||

तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो
मरुत्तस्यावसन् गृहे |
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति ||

श्रीनारायण वासुदेवाय सच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ् महराज् की जै ||

– 9। प्रार्थना –

करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधं |
विहितमविहितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीप्रभो सायिनाथ ||

श्रीसच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ् महराज् की जै ||

राजाधिराज योगिराज परब्रह्म सायिनाथ् महाराज्
श्रीसच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ् महराज् की जै ||

अर्थ

“धूप आरती” संग्रह श्री साईंनाथ, यानी शिरडी साईं बाबा पर केंद्रित एक भक्तिपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें प्राथमिक आरती भजन, क्षेत्रीय आरती (शिरडी/पंढरपुर), तुकाराम के भक्ति पद, नमन (नमस्कराष्टक), “ऐसा येई बा” आह्वान, साई महिम्न स्तोत्र, गुरु-प्रसाद याचिकाएँ, पुष्पांजलि अनुष्ठान और समापन प्रार्थनाएँ शामिल हैं। ये सभी मिलकर आह्वान, स्तुति, ध्यान, सामुदायिक पूजा, प्रसाद वितरण और व्यक्तिगत याचिकाओं का एक पूर्ण पूजा क्रम बनाते हैं।

आरती के प्रारंभिक भाग में, साईं बाबा को सुख के दाता और शरणागतों के रक्षक के रूप में वर्णित किया गया है। उनके नाम का स्मरण करने से संसार के दुख दूर होते हैं, ऐसा विश्वास इसमें निहित है। 'शिरडी पंढरपुर' खंड भक्त को पवित्र भूगोल और परंपरा में स्थापित करता है, शिरडी के पवित्र वातावरण और भक्तों की भावनाओं को याद दिलाता है। 'घालीन लोटांगन' और अन्य भक्ति पद गुरु-देवता-भक्त संबंध, साईं की सेवा में प्रेम और सभी प्रकार के आचरण का संकेत देते हैं। 'नमस्कराष्टक' सार रूप में साईं के चरण कमलों में पूर्ण समर्पण और पुण्य तीर्थ स्थलों के दर्शन से पुण्य लाभ की कामना करता है।

“ऐसा येई बा” पल्लवी साईं बाबा के विशेष रूपों, दर्शन के लक्षणों, आयुधों और रक्षात्मक प्रकृति को सरल और नित्य आचरण में प्रस्तुत करती है। साईंनाथ महिम्न स्तोत्र साईं के स्वरूप – सद्गुरु, परब्रह्म, करुणानिधि – को सभी दृष्टिकोणों से कवर करता है; इसके पाठ से भक्त को चरण कटाक्ष और पुण्य प्रसाद प्राप्त होता है। 'गुरुप्रसाद याचना दशकम्' भक्तों की पारिवारिक, संबंधित और आध्यात्मिक प्रार्थनाओं को इसमें शामिल करता है। अंत में, 'पुष्पांजलि' और 'प्रार्थना' आरती को पूर्ण करने और प्रसाद ग्रहण करने का संकेत देते हैं, जो कृतज्ञता, दान और पवित्र संगति पर जोर देते हैं।

लाभ (Benefits):

  • नियमित आरती अभ्यास के माध्यम से आंतरिक शांति, मानसिक स्थिरता और भक्तिपूर्ण एकाग्रता विकसित होती है।
  • साईं और गुरु के आश्रय का स्मरण करने से चिंता, दुख और भय कम होते हैं।
  • गुरु-भक्ति मजबूत होती है और गुरु कृपा का अनुभव करने के लिए हृदय खुलता है।
  • समाज में प्रसाद वितरण के माध्यम से एकता और सेवा भाव में वृद्धि होती है।
  • दैनिक आचरण में जीवनशैली में समृद्धि, स्वास्थ्य और सुरक्षा आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिरडी साईं संध्या धूप आरती क्या है?
यह श्री साईं बाबा को समर्पित भक्ति भजनों, स्तोत्रों और प्रार्थनाओं का एक संग्रह है, जिसे विशेष रूप से शाम की पूजा के दौरान गाया जाता है। यह बाबा के प्रति गहरी भक्ति, कृतज्ञता और समर्पण व्यक्त करता है।
इस आरती का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इसे आमतौर पर शाम के समय, दीप आरती के बाद या दिन की अंतिम पूजा के रूप में पढ़ा जाता है। इसे शुद्ध मन और पूर्ण भक्ति के साथ पढ़ना चाहिए।
शिरडी साईं धूप आरती का पाठ करने से क्या लाभ मिलते हैं?
इस आरती का पाठ करने से आंतरिक शांति, मानसिक स्थिरता, भय और दुखों से मुक्ति मिलती है, और गुरु कृपा का अनुभव होता है। यह जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि लाता है।
इस धूप आरती का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति जो साईं बाबा में विश्वास और श्रद्धा रखता है, इस आरती का पाठ कर सकता है। इसमें जाति, धर्म या लिंग का कोई भेद नहीं है।
इस आरती का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः इसे दिन में एक बार, शाम के समय पाठ करने का रिवाज है। हालाँकि, भक्त अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार इसे अधिक बार भी पढ़ सकते हैं।
इस धूप आरती का मूल या स्रोत क्या है?
यह आरती शिरडी साईं बाबा की दैनिक पूजा परंपरा का एक अभिन्न अंग है। यह विभिन्न भक्ति भजनों और स्तोत्रों का संकलन है, जो साईं बाबा के भक्तों द्वारा रचित हैं।

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