मध्याह्न आरति
– 1। पंचारती –
घेउनि(याँ) पंचारती करूँ बाबांसी आरती |
करूँ सायीसी आरती करू बाबांसी आरती || 1 ||
उठा उठा हो बांधव ओँवाळूँहा रमाधव |
सायी रमाधव ओँवाळूँह रमाधव || 2 ||
करूनिया स्थिर मन पाहूँ गंभीर हेँ ध्यान |
सायीँचे हेँ ध्यान पाहूँ गंभीर हेँ ध्यान || 3 ||
कृष्णनाथा दत्तसायी जडो चित्त तुझे पायी |
चित्त बाबा पायी जडो चित्त तुझे पायी || 4 ||
– 2। आरती –
आरती सायिबाबा सौख्यदातार जीवा |
चरणरजतालीँ द्यावा दासाँ विसावा भक्ताँ विसावा ||
आरती सायिबाबा ||
जाळुनियाँ अनंग स्वस्वरूपीँ राहे दंग |
मुमुक्षुजनाँ दावी निज डोळाँ श्रीरंग डोळाँ श्रीरंग || 1
आरती सायिबाबा ||
जया मनी जैसा भाव तया तैसा अनुभव |
दाविसी दयाघना ऐसी तुझी ही माव तुझी ही माव || 2
आरती सायिबाबा ||
तुमचे नाम ध्याता हरे संसृति व्यथा |
अगाध तव करणी मार्ग दाविसी अनाथा दाविसी अनाथा || 3
आरती सायिबाबा ||
कलियुगीँ अवतार सगुण(पर)ब्रह्म साचार |
अवतीर्ण झालासे स्वामी दत्त दिगंबर दत्त दिगंबर || 4
आरती सायिबाबा ||
आठाँ दिवसाँ गुरुवारीँ भक्त करीति वारी |
प्रभुपद पहावया भवभय निवारी भय निवारी || 5
आरती सायिबाबा ||
माझा निजद्रव्यठेवा तव चरण रज सेवा |
मागणेँ हेँचि आताँ तुम्हाँ देवाधिदेवा देवाधिदेवा || 6
आरती सायिबाबा ||
इच्छित दीन चातक निर्मल तोय निजसुख |
पाजावेँ माधवा या संभाळ आपुली भाक आपुली भाक || 7
आरती सायिबाबा सौख्यदातार जीवा |
चरणरजतालीँ द्यावा दासाँ विसावा भक्ताँ विसावा ||
आरती सायिबाबा ||
– 3। जय देव जय देव –
जय देव जय देव दत्ता अवधूता |
(हो) सायि अवधूता |
जोडूनि कर तव चरणीँ ठेवितो माथा |
जय देव जय देव ||
अवतरसीँ तूँ येता धर्मातेँ ग्लानी
नास्तिकाँनाही तू लाविसी निजभजनीँ |
दाविसी नाना लीला असंख्य रूपाँनी
हरिसी दीनांचे तू संकट दिनरजनी || 1 ||
जय देव जय देव दत्ता अवधूता |
(हो) सायि अवधूता |
जोडूनि कर तव चरणीँ ठेवितो माथा |
जय देव जय देव ||
यवनस्वरूपी एक्या दर्शन त्वाँ दिधलेँ
संशय निरसुनियाँ तद्वैता घालविलेँ |
गोपीचंदा मंदा त्वांची उद्धरिलेँ
मोमिन वंशी जन्मुनी लोकाँ तारियलेँ || 2 ||
जय देव जय देव दत्ता अवधूता |
(हो) सायि अवधूता |
जोडूनि कर तव चरणीँ ठेवितो माथा |
जय देव जय देव ||
भेद न तत्त्वीँ हिंदू यवनांचा काँहीँ
दावायासि झाला पुनरपि नरदेही |
पाहसि प्रेमानेँ तू हिंदूयवनाँही
दाविसी आत्मत्वाने व्यापक हा सायी || 3 ||
जय देव जय देव दत्ता अवधूता |
(हो) सायि अवधूता |
जोडूनि कर तव चरणीँ ठेवितो माथा |
जय देव जय देव ||
देवा सायीनाथ त्वत्पदनत भावेँ
परमायामोहित जनमोचन झणिँ व्हावेँ |
त्वत्कृपयाँ सकलांचे संकट निरसावेँ
देशिल तरी दे त्वद्यश कृष्णानेँ गावेँ || 4 ||
जय देव जय देव दत्ता अवधूता |
(हो) सायि अवधूता |
जोडूनि कर तव चरणीँ ठेवितो माथा |
जय देव जय देव ||
– 4। शिरडी माझे पंढरपुर –
शिरडी माझेँ पंढरपुर | सायिबाबा रमावर |
बाबा रमावर | सायिबाबा रमावर || 1
शुद्ध भक्ती चंद्रभागा | भाव पुंडलिक जागा |
पुंडलिक जागा | भाव पुंडलिक जागा || 2
या हो या हो अवघे जन | करा बाबांसी वंदन |
सायीसी वंदन | करा बाबांसी वंदन || 3
गणू म्हणे बाबा सायी | धाँव पाव माझे आयी |
पाव माझे आयी | धाँव पाव माझे आयी || 4
– 5। घालीन लोटांगन –
घालीन लोटांगन वंदीन चरण
डोळ्यानीँ पाहिन रूप तुझेँ |
प्रेमेँ आलिंगिन आनंदेँ पूजिन
भावेँ ओवाळिन म्हणे नामा || 1 ||
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव |
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव || 2 ||
कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतीस्वभावत् |
करोमि यद्यत्सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि || 3 ||
अच्युतं केशवं रामनारायणं
कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिं |
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं
जानकीनायकं रामचंद्रं भजे || 4 ||
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे |
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे || 5 ||
– 6। पुष्पांजलि –
श्रीगुरुदेव दत्त ||
हरिः ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवा-
-स्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् |
ते ह नाकं महिमानः सचंत
यत्र पूर्वे साध्या संति देवाः ||
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने
नमो वयं वैश्रवणाय कूर्महे |
स मे कामान् कामकामाय मह्यं
कामेश्वरो वैश्रवणो दधातु |
कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ||
ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भोज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं
पारमेष्ठ्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं
समंतपर्यायी स्यात्सार्वभौमः सार्वायुष आँतादापरार्धात्
पृथिव्यैसमुद्रपर्यंतायाः एकराळिति ||
तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो
मरुत्तस्यावसन् गृहे |
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति ||
श्रीनारायण वासुदेवाय सच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ् महराज् की जै ||
– 7। नमस्काराष्टक –
अनंता तुला तेँ कसेँ रे स्तवावेँ
अनंता तुला तेँ कसेँ रे नमावेँ |
अनंता मुखांचा शिणे शेष गाताँ
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 1 ||
स्मरावेँ मनीँ त्वत्पदाँ नित्य भावेँ
उरावेँ तरी भक्तिसाठी स्वभावेँ |
तरावेँ जगा तारूनी मायताता
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 2 ||
वसे जो सदा दावया संतलीला
दिसे अज्ञ लोकाँपरी जो जनाँला |
परी अंतरी ज्ञान कैवल्यदाता
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 3 ||
बरा लाधला जन्म हा मानवाचा
नरा सार्थका साधनीभूत साचा |
धरूँ सायिप्रेमा गळाया अहंता
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 4 ||
धरावेँ करीँ सान अल्पज्ञ बाला
करावेँ आम्हाँ धन्य चुंबोनि गाला |
मुखीँ घाल प्रेमेँ खरा ग्रास आताँ
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 5 ||
सुरादिक ज्यांच्या पदा वंदिताती
शुकादिक ज्यांतेँ समानत्व देती |
प्रयागादि तीर्थेपदीँ नम्र होताँ
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 6 ||
तुझ्या ज्या पदा पाहताँ गोपबाली
सदा रंगली चित्स्वरूपी मिळाली |
करी रासक्रीडा सवेँ कृष्णनाथा
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 7 ||
तुला मागतोँ मागणेँ एक द्यावेँ
करा जोडितोँ दीन अत्यंत भावेँ |
भवी मोहनीराज हा तारिँ आताँ
नमस्कार साष्टांग श्रीसायिनाथा || 8 ||
– 8। ऐसा येयी बा –
ऐसा येयी बा | सायी दिगंबरा |
अक्षयरूप अवतारा |
सर्वहि व्यापक तूँ | शृतिसारा |
अनसूयात्रि कुमारा | बाबा येयी बा ||
काशी स्नान जप प्रतिदिवशीँ |
कोल्हापुर भिक्षेसी |
निर्मल नदि तुंगा जल प्राशी |
निद्रा माहुर देशीँ || 1
ऐसा येयी बा ||
झोळी लोंबतसे वाम करीँ |
त्रिशूल डमरूधारी |
भक्ता वरद सदा सुखकारी |
देशील मुक्ती चारी || 2
ऐसा येयी बा ||
पायी पादुका जपमाला |
कमंडलू मृगछाला |
धारण करिशी बा |
नागजटा मुकुट शोभतो माथाँ || 3
ऐसा येयी बा ||
तत्पर तुझ्या या जे ध्यानीँ |
अक्षय त्यांचे सदनीँ |
लक्ष्मी वास करी दिनरजनीँ |
रक्षिसि संकट वारूनि || 4
ऐसा येयी बा ||
या परिध्यान तुझेँ गुरुराया |
दृश्य करीँ नयनाँ या |
पूर्णानंदसुखेँ ही काया |
लाविसि हरिगुण गाया || 5
ऐसा येयी बा | सायी दिगंबरा |
अक्षयरूप अवतारा |
सर्वहि व्यापक तूँ | शृतिसारा |
अनसूयात्रि कुमारा | बाबा येयी बा ||
– 9। श्रीसायिनाथ महिम्न स्तोत्रं –
सदा सत्स्वरूपं चिदानंदकंदं
जगत्संभवस्थानसंहारहेतुं |
स्वभक्तेच्छयामानुषं दर्शयंतं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 1 ||
भवध्वांत विध्वंस मार्तंड मीड्यं
मनोवागतीतं मुनिर्ध्यानगम्यं |
जगद्व्यापकं निर्मलं निर्गुणं त्वां
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 2 ||
भवांभोधिमग्नार्दितानां जनानां
स्वपादाश्रितानां स्वभक्तिप्रियाणां |
समुद्धारणार्थं कलौ संभवंतं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 3 ||
सदा निंबवृक्षस्य मूलाधिवासात्
सुधास्राविणं तिक्तमप्यप्रियं तं |
तरुं कल्पवृक्षाधिकं साधयंतं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 4 ||
सदा कल्पवृक्षस्य तस्याधिमूले
भवद्भावबुद्ध्या सपर्यादिसेवां |
नृणां कुर्वतां भुक्तिमुक्तिप्रदं तं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 5 ||
अनेका शृता तर्क्य लीला विलासैः
समाविष्कृतेशान भास्वत् प्रभावं |
अहंभावहीनं प्रसन्नात्मभावं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 6 ||
सतां विश्रमाराममेवाभिरामं
सदा सज्जनैः संस्तुतं सन्नमद्भिः |
जनामोददं भक्तभद्रप्रदं तं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 7 ||
अजन्माद्यमेकं परं ब्रह्म साक्षात्
स्वयं संभवं राममेवावतीर्णं |
भवद्दर्शनात् संपुनीतः प्रभोऽहं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं || 8 ||
श्रीसायीश कृपानिधेऽखिलनृणां सर्वार्थसिद्धिप्रद
युष्मत्पादरजः प्रभावमतुलं धातापि वक्ताऽक्षमः |
सद्भक्त्या शरणं कृतांजलिपुटः संप्रापितोऽस्मि प्रभो
श्रीमत्सायिपरेशपादकमलान् नान्यच्छरण्यं मम || 9 ||
सायिरूपधर राघवोत्तमं
भक्तकामविबुधद्रुमं प्रभुं |
माययोपहतचित्तशुद्धये
चिंतयाम्यहमहर्निशं मुदा || 10 ||
शरत्सुधांशुप्रतिमप्रकाशं
कृपातपात्रं तव सायिनाथ |
त्वदीय पादाब्ज समाश्रितानां
स्वच्छायया तापमपाकरोतु || 11 ||
उपासनादैवत सायिनाथ
स्तवैर्मयोपासनिना स्तुतस्त्वं |
रमेन्मनो मे तव पादयुग्मे
भृंगो यथाब्जे मकरंदलुब्धः || 12 ||
अनेक जन्मार्जित पापसंक्षयो
भवेद्भवत्पादसरोज दर्शनात् |
क्षमस्व सर्वानपराधपुंजकान्
प्रसीद सायीश (सद्)गुरो दयानिधे || 13 ||
श्रीसायिनाथचरणामृतपूतचित्ता-
-स्तत्पादसेवनरताः सततं च भक्त्या |
संसारजन्यदुरितौघ विनिर्गतास्ते
कैवल्यधाम परमं समवाप्नुवंति || 14 ||
स्तोत्रमेतत् पठेद्भक्त्या यो नरस्तन्मनाः सदा |
सद्गुरुसायिनाथस्य कृपापात्रं भवेद्धृवं || 15 ||
– 10। प्रार्थना –
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधं |
विहितमविहितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीप्रभो सायिनाथ ||
श्रीसच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ् महराज् की जै ||
राजाधिराज योगिराज परब्रह्म सायिनाथ् महाराज्
श्रीसच्चिदानंद सद्गुरु सायिनाथ् महराज् की जै ||
अर्थ
शिरडी साईं मध्याह्न आरति संग्रह श्री साईं/गुरु पूजा के अनुक्रम का एक महत्वपूर्ण भाग है। यह एक संपूर्ण आरति और प्रार्थना संपुट है, जो भक्तों को अपने गुरु से जुड़ने और उनकी कृपा प्राप्त करने में मदद करता है। यह पंचारति से शुरू होकर मुख्य आरति (आरति साईं बाबा), “जय देव जय देव” के जयकारे, शिरडी-पंढरपुर वैभव के आयाम, घालीन लोटांगण जैसे भक्तिपूर्ण कीर्तन, पुष्पांजलि, नमस्काराष्टक, और अंत में “ऐसा येयी बा” मंगलम तथा महिम्न स्तोत्र के माध्यम से साईं स्वरूप की विभिन्न कोणों से पूजा की जाती है। प्रत्येक भाग को भक्ति को अंतर्मुखी कर गुरु-भक्ति, शांति और मोक्ष की संकल्पना को बढ़ाने के लिए संरचित किया गया है।
इस आरति में साईं बाबा को सुखदाता, दुखहर, परब्रह्म स्वरूप शिव स्मृति और शिरडी-पंढरपुर की परंपराओं का स्मरण किया जाता है। 'आरति साईं बाबा' खंड साईं को जीवन के लिए सुखदाता, दुखहर्ता और दयालु आश्रय के रूप में वर्णित करता है। 'जय देव जय देव' खंड साईं को अवधूत और चमत्कार करने वाले के रूप में मनाता है, जिनकी कृपा संदेहों को दूर करती है, दुखों को ठीक करती है और भक्तों का उद्धार करती है। शिरडी-पंढरपुर के पद साईं को पवित्र भूगोल और संत परंपरा से जोड़ते हैं, उनकी दिव्यता को ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में स्थापित करते हैं।
'घालीन लोटांगण' और 'नमस्काराष्टक' के भाग पूर्ण समर्पण, दण्डवत प्रणाम और साईं के निरंतर स्मरण की परिवर्तनकारी शक्ति पर जोर देते हैं। 'ऐसा येयी बा' सरल आह्वान और भक्तिमय छवियों के माध्यम से साईं के साथ एक अंतरंग संबंध बनाने के लिए प्रेरित करता है। 'साईं महिम्न स्तोत्र' साईं के सर्वोच्च स्वरूप को गुरु, आश्रय और मुक्तिदाता के रूप में स्पष्ट करता है, भक्तों के लिए श्रद्धा की गहरी नींव प्रदान करता है। यह अनुक्रम पुष्पांजलि (पुष्प अर्पित करना) और क्षमा तथा आशीर्वाद के लिए प्रार्थना के साथ समाप्त होता है, जो विनम्रता और कृतज्ञता की भावना पैदा करता है।
इस मध्याह्न आरति का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से हृदय में शांति, मानसिक स्थिरता और गहरी भक्ति उत्पन्न होती है। यह दुख, भय और चिंता को कम करता है, गुरु-कृपा, सुरक्षा और व्यावहारिक सहायता का आह्वान करता है। सामूहिक आरति और प्रसाद वितरण सामुदायिक बंधनों को मजबूत करता है और सेवाभाव को बढ़ाता है। कुल मिलाकर, यह आरति आध्यात्मिक विकास, उद्देश्य की स्पष्टता और नैतिक जीवन का समर्थन करती है, भक्तों को साईं मार्ग पर आगे बढ़ाती है।
लाभ (Benefits):
- हृदय शांति और मानसिक स्थिरता: मध्याह्न में आरति का पाठ करने से मन शांत होता है, मानसिक तनाव कम होता है और एकाग्रता बढ़ती है।
- दुख और भय का निवारण: साईं बाबा के नामस्मरण और आरति से भक्तों के दुख, भय और चिंताएं दूर होती हैं, जिससे उन्हें आशा और साहस मिलता है।
- गुरु कृपा और सुरक्षा: यह आरति साईं बाबा की दिव्य कृपा का आह्वान करती है, जिससे भक्तों को सुरक्षा, मार्गदर्शन और सभी चुनौतियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक उन्नति: साईं बाबा के विभिन्न स्वरूपों का गुणगान करने से भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान, बोध और नैतिक दृढ़ता प्राप्त होती है।
- सामुदायिक सौहार्द: सामूहिक रूप से आरति में भाग लेने से भक्तों के बीच एकता, सेवाभाव और परस्पर प्रेम बढ़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिरडी साईं मध्याह्न आरति क्या है?
मध्याह्न आरति का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
मध्याह्न आरति के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस आरति का पाठ कौन कर सकता है?
मध्याह्न आरति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
मध्याह्न आरति का उद्गम क्या है?
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