श

शरणागति गद्यं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
0 व्यूज़

शरणागति गद्यं

यो नित्यमच्युतपदांबुजयुग्मरुक्म
व्यामोहतस्तदितराणि तृणाय मेने |
अस्मद्गुरोर्भगवतोऽस्य दयैकसिंधोः
रामानुजस्य चरणौ शरणं प्रपद्ये ||

वंदे वेदांतकर्पूरचामीकर करंडकं |
रामानुजार्यमार्याणां चूडामणिमहर्निशं ||

ॐ || भगवन्नारायणाभिमतानुरूप स्वरूपरूप गुणविभवैश्वर्य शीलाद्यनवधिकातिशय असंख्येय कल्याणगुणगणां पद्मवनालयां भगवतीं श्रियं देवीं नित्यानपायिनीं निरवद्यां देवदेवदिव्यमहिषीं अखिलजगन्मातरं अस्मन्मातरं अशरण्यशरण्यां अनन्यशरणः शरणमहं प्रपद्ये ||

पारमार्थिक भगवच्चरणारविंद युगळैकांतिकात्यंतिक परभक्ति परज्ञान परमभक्तिकृत परिपूर्णानवरत नित्यविशदतमानन्य प्रयोजनानवधिकातिशय प्रिय भगवदनुभवजनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचित अशेषशेषतैकरतिरूप नित्यकैंकर्यप्राप्त्यपेक्षया पारमार्थिकी भगवच्चरणारविंद शरणागतिः यथावस्थिता अविरताऽस्तु मे ||

अस्तु ते | तयैव सर्वं संपत्स्यते ||

अखिलहेयप्रत्यनीक कल्याणैकतान, स्वेतर समस्तवस्तुविलक्षणानंत ज्ञानानंदैकस्वरूप, स्वाभिमतानुरूपैकरूपाचिंत्य दिव्याद्भुत नित्यनिरवद्य निरतिशयौज्ज्वल्य सौंदर्य सौगंध्य सौकुमार्य लावण्य यौवनाद्यनंतगुणनिधि दिव्यरूप, स्वाभाविकानवधिकातिशय ज्ञान बलैश्वर्य वीर्य शक्ति तेजस्सौशील्य वात्सल्य मार्दवार्जव सौहार्द साम्य कारुण्य माधुर्य गांभीर्यौदार्य चातुर्य स्थैर्य धैर्य शौर्य पराक्रम सत्यकाम सत्यसंकल्प कृतित्व कृतज्ञताद्यसंख्येय कल्याणगुणगणौघ महार्णव,
स्वोचित विविध विचित्रानंताश्चर्य नित्य निरवद्य निरतिशय सुगंध निरतिशय सुखस्पर्श निरतिशयौज्ज्वल्य किरीट मकुट चूडावतंस मकरकुंडल ग्रैवेयक हार केयूर कटक श्रीवत्स कौस्तुभ मुक्तादामोदरबंधन पीतांबर कांचीगुण नूपुराद्यपरिमित दिव्यभूषण, स्वानुरूपाचिंत्यशक्ति शंखचक्रगदाऽसि शार्ङ्गाद्यसंख्येय
नित्यनिरवद्य निरतिशय कल्याणदिव्यायुध,
स्वाभिमत नित्यनिरवद्यानुरूप स्वरूपरूपगुण विभवैश्वर्य शीलाद्यनवधिकातिशयासंख्येय कल्याणगुणगणश्रीवल्लभ, एवंभूत भूमिनीळानायक, स्वच्छंदानुवर्ति स्वरूपस्थिति प्रवृत्तिभेदाशेष शेषतैकरतिरूप
नित्यनिरवद्यनिरतिशय ज्ञान क्रियैश्वर्याद्यनंत कल्याणगुणगण शेष शेषाशन
गरुडप्रमुख नानाविधानंत परिजन परिचारिका परिचरित चरणयुगळ, परमयोगि वाङ्मनसाऽपरिच्छेद्य स्वरूप स्वभाव स्वाभिमत विविधविचित्रानंतभोग्य भोगोपकरण भोगस्थान समृद्धानंताश्चर्यानंत महाविभवानंत परिमाण नित्य निरवद्य निरतिशय श्रीवैकुंठनाथ, स्वसंकल्पानुविधायि स्वरूपस्थिति प्रवृत्ति स्वशेषतैकस्वभाव प्रकृति पुरुष कालात्मक विविध विचित्रानंत भोग्य भोक्तृवर्ग भोगोपकरण भोगस्थानरूप
निखिलजगदुदय विभव लयलील, सत्यकाम, सत्यसंकल्प, परब्रह्मभूत, पुरुषोत्तम,महाविभूते,

श्रीमन् नारायण, वैकुंठनाथ, अपार कारुण्य सौशील्य वात्सल्यौदार्यैश्वर्य सौंदर्य महोदधे, अनालोचितविशेषाशेषलोक शरण्य, प्रणतार्तिहर, आश्रित वात्सल्यैकजलधे, अनवरतविदित निखिलभूतजातयाथात्म्य, अशेषचराचरभूत निखिलनियमन निरत, अशेषचिदचिद्वस्तु शेषिभूत, निखिलजगदाधार, अखिलजगत्स्वामिन्, अस्मत्स्वामिन्, सत्यकाम,
सत्यसंकल्प, सकलेतरविलक्षण, अर्थिकल्पक, आपत्सख, श्रीमन्, नारायण, अशरण्यशरण्य, अनन्यशरणस्त्वत्पादारविंद युगळं शरणमहं प्रपद्ये ||

अत्र द्वयं |

पितरं मातरं दारान् पुत्रान् बंधून् सखीन् गुरून् |
रत्नानि धनधान्यानि क्षेत्राणि च गृहाणि च || 1

सर्वधर्मांश्च संत्यज्य सर्वकामांश्च साक्षरान् |
लोकविक्रांतचरणौ शरणं तेऽव्रजं विभो || 2

त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बंधुश्च गुरुस्त्वमेव |
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव || 3

पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् |
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव || 4

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यं |
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुं ||

मनोवाक्कायैरनादिकाल प्रवृत्तानंताकृत्यकरण कृत्याकरण भगवदपचार भागवतापचारासह्यापचाररूप नानाविधानंतापचारान् आरब्धकार्यान् अनारब्धकार्यान् कृतान् क्रियमाणान् करिष्यमाणांश्च सर्वानशेषतः क्षमस्व |

अनादिकालप्रवृत्तविपरीत ज्ञानमात्मविषयं कृत्स्न जगद्विषयं च विपरीतवृत्तं चाशेषविषयमद्यापि वर्तमानं वर्तिष्यमाणं च सर्वं क्षमस्व |

मदीयानादिकर्म प्रवाहप्रवृत्तां भगवत्स्वरूप तिरोधानकरीं विपरीतज्ञानजननीं स्वविषयायाश्च भोग्यबुद्धेर्जननीं देहेंद्रियत्वेन भोग्यत्वेन सूक्ष्मरूपेण चावस्थितां दैवीं गुणमयीं मायां दासभूतं शरणागतोऽस्मि तवास्मि दासः इति वक्तारं मां तारय |

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः एकभक्तिर्विशिष्यते |
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ||

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतं |
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिं ||

बहूनां जन्मनामंते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते |
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ||

इति श्लोकत्रयोदितज्ञानिनं मां कुरुष्व |

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया |
भक्त्या त्वनन्यया शक्यः मद्भक्तिं लभते परां |
इति स्थानत्रयोदित परभक्तियुक्तं मां कुरुष्व |

परभक्ति परज्ञान परमभक्त्येकस्वभावं मां कुरुष्व |
परभक्ति परज्ञान परमभक्तिकृत परिपूर्णानवरत नित्यविशदतमानन्य प्रयोजनानवधिकातिशय प्रिय भगवदनुभवोऽहं तथाविध भगवदनुभव जनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचिताशेष शेषतैकरतिरूप नित्यकिंकरो भवानि |

एवंभूत मत्कैंकर्यप्राप्त्युपायतयाऽवक्लुप्तसमस्त वस्तुविहीनोऽपि, अनंत तद्विरोधिपापाक्रांतोऽपि, अनंत मदपचारयुक्तोऽपि, अनंत मदीयापचारयुक्तोऽपि, अनंतासह्यापचार युक्तोऽपि, एतत्कार्यकारण भूतानादि विपरीताहंकार विमूढात्म स्वभावोऽपि, एतदुभयकार्यकारणभूतानादि विपरीतवासना संबद्धोऽपि, एतदनुगुण प्रकृति विशेषसंबद्धोऽपि, एतन्मूलाध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविक सुखदुःख तद्धेतु
तदितरोपेक्षणीय विषयानुभव ज्ञानसंकोचरूप मच्चरणारविंदयुगळैकांतिकात्यंतिक परभक्ति परज्ञान परमभक्ति विघ्नप्रतिहतोऽपि, येन केनापि प्रकारेण द्वयवक्ता त्वं केवलं मदीययैव दयया निश्शेषविनष्ट सहेतुक मच्चरणारविंदयुगळैकांतिकात्यंतिक परभक्ति परज्ञान परमभक्तिविघ्नः मत्प्रसादलब्ध मच्चरणारविंदयुगळैकांतिकात्यंतिक परभक्ति परज्ञान परमभक्तिः मत्प्रसादादेव साक्षात्कृत यथावस्थित मत्स्वरूपरूपगुणविभूति लीलोपकरणविस्तारः अपरोक्षसिद्ध मन्नियाम्यता मद्दास्यैक स्वभावात्म स्वरूपः मदेकानुभवः मद्दास्यैकप्रियः परिपूर्णानवरत नित्यविशदतमानन्य प्रयोजनानवधिकातिशयप्रिय मदनुभवस्त्वं तथाविध मदनुभव जनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचिताशेष शेषतैकरतिरूप नित्यकिंकरो भव |

एवंभूतोऽसि | आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविक दुःखविघ्नगंधरहितस्त्वं द्वयमर्थानुसंधानेन सह सदैवं वक्ता यावच्छरीरपातमत्रैव श्रीरंगे सुखमास्व ||

शरीरपातसमये तु केवलं मदीययैव दययाऽतिप्रबुद्धः मामेवावलोकयन् अप्रच्युत पूर्वसंस्कारमनोरथः जीर्णमिव वस्त्रं सुखेनेमां प्रकृतिं स्थूलसूक्ष्मरूपां विसृज्य तदानीमेव मत्प्रसादलब्ध मच्चरणारविंद युगळैकांतिकात्यंतिक परभक्ति परज्ञान परमभक्तिकृत परिपूर्णानवरत नित्यविशदतमानन्य प्रयोजनानवधिकातिशय प्रिय मदनुभवस्त्वं तथाविध मदनुभवजनितानवधिकातिशय प्रीतिकारिताशेषावस्थोचिताशेषशेषतैक रतिरूप नित्यकिंकरो भविष्यसि | मातेऽभूदत्र संशयः |

अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन |
रामो द्विर्नाभिभाषते |
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते |
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ||
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||
इति मयैव ह्युक्तं |

अतस्त्वं तव तत्त्वतो मत् ज्ञानदर्शन प्राप्तिषु निस्संशयः सुखमास्व ||

अंत्यकाले स्मृतिर्यातु तव कैंकर्यकारिता |
तामेनां भगवन्नद्य क्रियमाणां कुरुष्व मे ||

इति श्रीभगवद्रामानुज विरचितं शरणागति गद्यं |

अर्थ

श्री रामानुजाचार्य द्वारा रचित शरणागति गद्यं, भगवान श्रीमन्नारायण और देवी महालक्ष्मी को पूर्ण समर्पण का एक सर्वोच्च ग्रंथ है। यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि जीव की आंतरिक जागृति और दिव्य युगल की अनंत करुणा पर पूर्ण निर्भरता की घोषणा है। इस गद्य में भक्त अपनी अशक्तता, अपराधों और अनगिनत जन्मों के दोषों को स्वीकार करते हुए, ईश्वर की कृपा पर पूरी तरह से निर्भर हो जाता है। यह भगवान के अनंत कल्याणकारी गुणों और महालक्ष्मी की निरंतर प्रसन्नता का स्तुतिगान करता है।

इस पवित्र गद्य में, भक्त अपने स्वरूप, महालक्ष्मी के साथ भगवान के अनन्य संबंध, उनकी परब्रह्मता, नित्य सौंदर्य, नित्य करुणा और नित्य अनुकुलत्व की अत्यंत कोमल रूप में पूजा करता है। यह एक गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है, जो आत्मा की अंतिम मुक्ति के लिए शरणागति को एकमात्र मार्ग बताता है। देवी महालक्ष्मी, जो नित्यानपायिनी हैं, रक्षा का एकमात्र माध्यम हैं; और नारायण, अनंत कल्याणकारी गुणों के सागर, अखिल ब्रह्मांड के आधार हैं। भक्त अपने पापों से मुक्त होने और दिव्य साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए इस दिव्य युगल की करुणा के प्रति पूरी तरह से शरणागत होता है।

भक्त स्वयं को अनादि पापों के बंधन में जकड़ा हुआ, अपनी शक्ति से बाहर निकलने में असमर्थ एक तुच्छ जीव मानता है। इस गद्य का मूल रहस्य यह है कि मनुष्य अपने समस्त बंधु-बांधवों, धन, संबंधों, अहंकार और स्वयं कार्य करने की शक्ति को त्याग कर, "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" गीता के इस वाक्य के आधार पर भगवान के श्रीचरणों में पूर्णतः समर्पित हो जाए। यह केवल एक बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन और पूर्ण आत्म-समर्पण है, जहाँ भक्त अपने अस्तित्व को भगवान को पूरी तरह से सौंप देता है।

ऐसे पूर्ण शरणागत भक्त पर प्रसन्न होकर, भगवान उसे अंत में महत्वपूर्ण वरदान प्रदान करते हैं: शरीर त्याग के समय भगवन्मय स्मृति, समस्त पापों से मुक्ति, नित्य कैंकर्य की प्राप्ति, और भगवदनुभव में नित्य स्थिति। यह परमपद की प्राप्ति, अर्थात मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। यह गद्य श्री वैष्णव शरणागति दर्शन का शिखर है, जो दिव्य करुणा के साथ आत्मा के विलय का उद्घोष करता है, और भक्त को सभी शुभता तथा अंतिम मुक्ति का आश्वासन देता है।

लाभ (Benefits):

  • समस्त पापों का नाश: शरणागति गद्यं का पाठ करने से भक्त के पूर्वजन्म और इस जन्म के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, और आत्मा शुद्ध होकर दिव्य अनुग्रह की पात्र बनती है।
  • भय रहित स्थिति और मानसिक शांति: दिव्य संरक्षण में पूरी तरह से आत्मसमर्पण करने से सभी भय दूर होते हैं और आंतरिक शांति तथा संतोष प्राप्त होता है, जिससे जीवन में स्थिरता आती है।
  • भगवन्नामस्मरण में नित्य स्थिति: यह भगवान के साथ निरंतर संबंध स्थापित करने में मदद करता है, जिससे मन हमेशा दिव्य स्मरण में लीन रहता है और आध्यात्मिक प्रगति होती है।
  • परमपद की प्राप्ति (मोक्ष): पूर्ण शरणागति के माध्यम से, भक्त भगवान के नित्य धाम वैकुंठ को प्राप्त करता है और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष का अनुभव करता है।
  • नित्य कैंकर्य और भगवदनुभव: भगवान के सान्निध्य में नित्य सेवा करने का सौभाग्य और अनंत काल तक भगवान के दिव्य अनुभव को प्राप्त करने की योग्यता मिलती है, जो परम आनंद की स्थिति है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शरणागति गद्यं क्या है?
शरणागति गद्यं श्री रामानुजाचार्य द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान श्रीमन्नारायण और महालक्ष्मी देवी को पूर्ण आत्मसमर्पण का उपदेश देता है। यह भक्त द्वारा अपने सभी दोषों को स्वीकार करते हुए दिव्य करुणा के प्रति शरणागत होने का मार्ग बताता है।
शरणागति गद्यं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
शरणागति गद्यं का पाठ प्रतिदिन, विशेष रूप से प्रातः स्नान के बाद या संध्याकाल में देवता पूजा के समय किया जा सकता है। मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए इसे किसी भी समय भक्तिभाव से पढ़ा जा सकता है।
शरणागति गद्यं का पाठ करने के मुख्य लाभ क्या हैं?
इसका पाठ करने से समस्त पापों का नाश होता है, भय रहित स्थिति, मानसिक शांति, भगवान का निरंतर स्मरण और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह दिव्य संरक्षण और आशीर्वाद प्रदान करता है।
शरणागति गद्यं का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान पर अटूट श्रद्धा रखने वाले, मोक्ष की इच्छा रखने वाले और स्वयं को पूर्ण रूप से दिव्य शक्ति को समर्पित करने के इच्छुक कोई भी भक्त इसका पाठ कर सकते हैं। जाति, पंथ या लिंग के बावजूद सभी इसका पाठ करने के पात्र हैं।
शरणागति गद्यं का पाठ कितनी बार करना श्रेष्ठ है?
इस गद्य का पाठ प्रतिदिन कम से कम एक बार करना श्रेष्ठ माना जाता है। पूर्ण शरणागति के भाव से जितनी बार संभव हो, उतनी बार इसका पाठ किया जा सकता है, जिससे गहरा आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होता है।
शरणागति गद्यं की उत्पत्ति या इसके रचयिता कौन हैं?
शरणागति गद्यं की रचना श्रीवैष्णव परंपरा के महान आचार्य श्री रामानुजाचार्य ने की है। यह उनके गद्यत्रय का एक महत्वपूर्ण भाग है और श्रीवैष्णव भक्तों के लिए एक अत्यंत पवित्र ग्रंथ है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...