मुक्तकमंगळं
श्रीशैलेशदयापात्रं धीभक्त्यादिगुणार्णवं |
यतींद्रप्रवणं वंदे रम्यजामातरं मुनिं ||
लक्ष्मीचरणलाक्षांकसाक्षी श्रीवत्सवक्षसे |
क्षेमंकराय सर्वेषां श्रीरंगेशाय मंगळं || 1 ||
श्रियःकांताय कल्याणनिधये निधयेऽर्थिनां |
श्रीवेंकटनिवासाय श्रीनिवासाय मंगळं || 2 ||
अस्तु श्रीस्तनकस्तूरीवासनावासितोरसे |
श्रीहस्तिगिरिनाथाय देवराजाय मंगळं || 3 ||
कमलाकुचकस्तूरीकर्दमांकितवक्षसे |
यादवाद्रिनिवासाय संपत्पुत्राय मंगळं || 4 ||
श्रीनगर्यां महापुर्यां ताम्रपर्ण्युत्तरे तटे |
श्रीतिंत्रिणीमूलधाम्ने शठकोपाय मंगळं || 5 ||
श्रीमत्यै विष्णुचित्तार्यमनोनंदनहेतवे |
नंदनंदनसुंदर्यै गोदायै नित्यमंगळं || 6 ||
श्रीमन्महाभूतपुरे श्रीमत्केशवयज्वनः |
कांतिमत्यां प्रसूताय यतिराजाय मंगळं || 7 ||
मंगळाशासनपरैः मदाचर्यपुरोगमैः |
सर्वैश्च पूर्वैराचार्यैः सत्कृतायास्तु मंगळं || 8 ||
पित्रे ब्रह्मोपदेष्ट्रे मे गुरवे दैवताय च |
प्राप्याय प्रापकायाऽस्तु वेंकटेशाय मंगळं || 9 ||
श्रीमते रम्यजामातृ मुनींद्राय महात्मने |
श्रीरंगवासिने भूयात् नित्यश्रीः नित्यमंगळं || 10 ||
इति श्रीवरवरमुनि कृत मुक्तक मंगळं ||
अर्थ
मुक्तकमंगलं, श्री वैष्णव संप्रदाय के महान आचार्य श्री वरवर मुनि (मानवाळ मामुनिगल) द्वारा रचित एक दिव्य स्तोत्र है। यह श्री वैष्णव गुरु परंपरा, दिव्य देश (पवित्र मंदिर), आचार्यों, आळवारों और अंततः भगवान विष्णु के विभिन्न पवित्र रूपों को मंगलमय आशीर्वाद प्रदान करने वाला एक पवित्र मंगलाशासन कृति है। यह स्तोत्र श्री वैष्णव परंपरा के मूल सार को दर्शाता है - गुरु भक्ति, शरणागति, पवित्रता और आध्यात्मिक ज्ञान की अटूट परंपरा। यह इस सत्य को उजागर करता है कि 'जीव को मोक्ष के मार्ग पर ले जाने वाला आचार्य ही होता है'।
स्तोत्र का आरंभ श्री वेदान्त देशिक के गुणों और उनकी करुणामयी प्रकृति का वर्णन करते हुए उन्हें नमन करने के साथ होता है। इसके उपरांत, लक्ष्मी जी के चरण कमलों के निवास स्थान, श्री रंगनाथ को मंगल अर्पित किया जाता है, जो संपूर्ण जगत के कल्याण के दाता हैं। तिरुमाला के श्रीनिवास को कल्याण निधि और भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले वरद मूर्ति के रूप में स्तुति की जाती है। कांचीपुरम के श्री हस्तिगिरिनाथ (देवराज पेरुमाल) और यादवाद्रि के नारायण को भी मंगल कामना की जाती है, कवि उनके वक्षस्थल पर लक्ष्मी देवी की कस्तूरी सुगंध से सुशोभित शोभा का वर्णन करते हैं।
तिरुक्कुरंगुडि में इमली के वृक्ष के नीचे निवास करने वाले शठकोप महर्षि (नम्माळवार) और श्रीविल्लिपुत्तूर में अवतरित पेरियाळवार की पुत्री गोदादेवी (आंडाळ) को विशेष मंगल अर्पित किया जाता है। उनका अवतार वैष्णव परंपरा के लिए एक दिव्य प्रकाश स्तंभ है। यह स्तोत्र जगत् को मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले महान आचार्य यतिराज रामानुज को सम्मानित करता है। उन सभी पूर्व आचार्यों को भी मंगल कामना की जाती है, जिन्होंने मंगलाशासन की परंपरा को आगे बढ़ाया।
अंत में, तिरुवेंकडमुदैयान वेंकटेश और श्री रंगनाथ को नित्य मंगल अर्पित किया जाता है, सभी भक्तों के लिए शाश्वत शुभता की कामना की जाती है। यह स्तोत्र पाठ करने वाले को दिव्य कृपा, पवित्रता, समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उत्थान का आशीर्वाद प्रदान करता है। यह जीवन में मंगल, शांति, आध्यात्मिक ज्ञान और गुरु भक्ति को बढ़ाने वाला एक शक्तिशाली मंगल कवच है।
लाभ (Benefits):
- गुरुभक्ति और आचार्यों की कृपा प्राप्त होती है: इस स्तोत्र के पाठ से गुरु और आचार्यों के प्रति भक्ति बढ़ती है और उनकी दिव्य कृपा प्राप्त होती है।
- आत्मिक शांति और मानसिक संतोष: नियमित पाठ से मन को शांति और संतोष मिलता है, जिससे आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
- बाधाओं का निवारण और शुभ कार्यों की सफलता: जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सभी शुभ कार्य बिना किसी विघ्न के सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं।
- समृद्धि और कल्याण की प्राप्ति: यह स्तोत्र दिव्य सुरक्षा, समृद्धि और समग्र कल्याण लाता है, परिवार में सुख-शांति प्रदान करता है।
- भक्ति में स्थिरता और धर्मनिष्ठा: भक्ति में दृढ़ता आती है और धार्मिक जीवन में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रेरणा मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मुक्तकमंगळं स्तोत्र क्या है?
मुक्तकमंगळं स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
मुक्तकमंगळं स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
यह स्तोत्र किसे पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
मुक्तकमंगळं स्तोत्र का उद्गम या रचनाकार कौन हैं?
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