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श्री महात्रिपुरसुंदरी हृदयं

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स्तोत्र
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श्री महात्रिपुरसुंदरी हृदयं

वंदे सिंदूरवर्णाभं वामोरुन्यस्तवल्लभं |
इक्षुवारिधिमध्यस्थमिभराजमुखं महः || 1 ||

गंभीरलहरीजालगंडूषितदिगंतरः |
अव्यान्माममृतांभोधिरनर्घमणिसंयुतः || 2 ||

मध्ये तस्य मनोहारि मधुपारवमेदुरं |
प्रसूनविगलन्माध्वीप्रवाहपरिपूरितं || 3 ||

किन्नरीगानमेदस्वि क्रीडाकंदरदंतुरं |
कांचनद्रुमधूलीभिः कल्पितावालवद्द्रुमं || 4 ||

मुग्धकोकिलनिक्वाणमुखरीकृतदिङ्मुखं |
मंदारतरुसंतानमंजरीपुंजपिंजरं || 5 ||

नासानाडिंधमस्मेरनमेरुसुमसौरभं |
आवृंतहसितांभोजदीव्यद्विभ्रमदीर्घिकं || 6 ||

मंदरक्तशुकीदष्टमातुलुंगफलान्वितं |
सविधस्यंदमानाभ्रसरित्कल्लोलवेल्लितं || 7 ||

प्रसूनपांसुसौरभ्यपश्यतोहरमारुतं |
वकुलप्रसवाकीर्णं वंदे नंदनकाननं || 8 ||

तन्मध्ये नीपकांतारं तरणिस्तंभकारणं |
मधुपालिविमर्दालिकलक्वाणकरंबितं || 9 ||

कोमलश्वशनाधूतकोरकोद्गतधूलिभिः |
सिंदूरितनभोमार्गं चिंतितं सिद्धवंदिभिः || 10 ||

मध्ये तस्य मरुन्मार्गलंबिमाणिक्यतोरणं |
शाणोल्लिखितवैदूर्यक्लुप्तसालसमाकुलं || 11 ||

माणिक्यस्तंभपटलीमयूखव्याप्तदिक्तटं |
पंचविंशतिसालाढ्यां नमामि नगरोत्तमं || 12 ||

तत्र चिंतामणिगृहं तडित्कोटिसमुज्ज्वलं |
नीलोत्पलसमाकीर्णनिर्यूहशतसंकुलं || 13 ||

सोमकांतमणिक्लुप्तसोपानोद्भासिवेदिकं |
चंद्रशालाचरत्केतुसमालीढनभोंतरं || 14 ||

गारुत्मतमणीक्लुप्तमंडपव्यूहमंडितं |
नित्यसेवापरामर्त्यनिबिडद्वारशोभितं || 15 ||

अधिष्ठितं द्वारपालैरसितोमरपाणिभिः |
नमामि नाकनारीणां सांद्रसंगीतमेदुरं || 16 ||

तन्मध्ये तरुणार्काभं तप्तकांचननिर्मितं |
शक्रादिमद्द्वारपालैः संततं परिवेष्टितं || 17 ||

चतुष्षष्टिमहाविद्याकलाभिरभिसंवृतं |
रक्षितं योगिनीबृंदै रत्नसिंहासनं भजे || 18 ||

मध्ये तस्य मरुत्सेव्यं चतुर्द्वारसमुज्ज्वलं |
चतुरस्रत्रिरेखाढ्यां चारुत्रिवलयान्वितं || 19 ||

कलादलसमायुक्तं कनदष्टदलान्वितं |
चतुर्दशारसहितं दशारद्वितयान्वितं || 20 ||

अष्टकोणयुतं दिव्यमग्निकोणविराजितं |
योगिभिः पूजितं योगियोगिनीगणसेवितं || 21 ||

सर्वदुःखप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनं |
विषज्वरहरं पुण्यं विविधापद्विदारणं || 22 ||

सर्वदारिद्र्यशमनं सर्वभूपालमोहनं |
आशाभिपूरकं दिव्यमर्चकानामहर्निशं || 23 ||

अष्टादशसुमर्माढ्यं चतुर्विंशतिसंधिनं |
श्रीमद्बिंदुगृहोपेतं श्रीचक्रं प्रणमाम्यहं || 24 ||

तत्रैव बैंदवस्थाने तरुणादित्यसन्निभं |
पाशांकुशधनुर्बाणपरिष्कृतकरांबुजं || 25 ||

पूर्णेंदुबिंबवदनं फुल्लपंकजलोचनं |
कुसुमायुधशृंगारकोदंडकुटिलभ्रुवं || 26 ||

चारुचंद्रकलोपेतं चंदनागुरुरूषितं |
मंदस्मितमधूकालिकिंजल्कितमुखांबुजं || 27 ||

पाटीरतिलकोद्भासिफालस्थलमनोहरं |
अनेककोटिकंदर्पलावण्यमरुणाधरं || 28 ||

तपनीयांशुकधरं तारुण्यश्रीनिषेवितं |
कामेश्वरमहं वंदे कामितार्थप्रदं नृणां || 29 ||

तस्यांकमध्यमासीनां तप्तहाटकसन्निभां |
माणिक्यमुकुटच्छायामंडलारुणदिङ्मुखां || 30 ||

कलवेणीकनत्फुल्लकह्लारकुसुमोज्ज्वलां |
उडुराजकृतोत्तंसामुत्पलश्यामलालकां || 31 ||

चतुर्थीचंद्रसच्छात्रफालरेखापरिष्कृतां |
कस्तूरीतिलकारूढकमनीयललंतिकां || 32 ||

भ्रूलताश्रीपराभूतपुष्पायुधशरासनां |
नालीकदलदायादनयनत्रयशोभितां || 33 ||

करुणारससंपूर्णकटाक्षहसितोज्ज्वलां |
भव्यमुक्तामणिचारुनासामौक्तिकवेष्टितां || 34 ||

कपोलयुगलीनृत्यकर्णताटंकशोभितां |
माणिक्यवालीयुगलीमयूखारुणदिङ्मुखां || 35 ||

परिपक्वसुबिंबाभापाटलाधरपल्लवां |
मंजुलाधरपर्वस्थमंदस्मितमनोहरां || 36 ||

द्विखंडद्विजराजाभगंडद्वितयमंडितां |
दरफुल्ललसद्गंडधवलापूरिताननां || 37 ||

पचेलिमेंदुसुषमापाटच्चरमुखप्रभां |
कंधराकांतिहसितकंबुबिंबोकडंबरां || 38 ||

कस्तूरीकर्दमाश्यामकंधरामूलकंदरां |
वामांसशिखरोपांतव्यालंबिघनवेणिकां || 39 ||

मृणालकांडदायादमृदुबाहुचतुष्टयां |
मणिकेयूरयुगलीमयूखारुणविग्रहां || 40 ||

करमूललसद्रत्नकंकणक्वाणपेशलां |
करकांतिसमाधूतकल्पानोकहपल्लवां || 41 ||

पद्मरागोर्मिकाश्रेणिभासुरांगुलिपालिकां |
पुंड्रकोदंडपुष्पास्त्रपाशांकुशलसत्करां || 42 ||

तप्तकांचनकुंभाभस्तनमंडलमंडितां |
घनस्तनतटीक्लुप्तकाश्मीरक्षोदपाटलां || 43 ||

कूलंकषकुचस्फारतारहारविराजितां |
चारुकौसुंभकूर्पासच्छन्नवक्षोजमंडलां || 44 ||

नवनीलघनश्यामरोमराजिविराजितां |
लावण्यसागरावर्तनिभनाभिविभूषितां || 45 ||

डिंभमुष्टितलग्राह्यमध्ययष्टिमनोहरां |
नितंबमंडलाभोगनिक्वणन्मणिमेखलां || 46 ||

संध्यारुणक्षौमपटीसंछन्नजघनस्थलां |
घनोरुकांतिहसितकदलीकांडविभ्रमां || 47 ||

जानुसंपुटकद्वंद्वजितमाणिक्यदर्पणां |
जंघायुगलसौंदर्यविजितानंगकाहलां || 48 ||

प्रपदच्छायसंतानजितप्राचीनकच्छपां |
नीरजासनकोटीरनिघृष्टचरणांबुजां || 49 ||

पादशोभापराभूतपाकारितरुपल्लवां |
चरणांभोजशिंजानमणिमंजीरमंजुलां || 50 ||

विबुधेंद्रवधूत्संगविन्यस्तपदपल्लवां |
पार्श्वस्थभारतीलक्ष्मीपाणिचामरवीजितां || 51 ||

पुरतो नाकनारीणां पश्यंतीं नृत्तमद्भुतं |
भ्रूलतांचलसंभूतपुष्पायुधपरंपरां || 52 ||

प्रत्यग्रयौवनोन्मत्तपरिफुल्लविलोचनां |
ताम्रोष्ठीं तरलापांगीं सुनासां सुंदरस्मितां || 53 ||

चतुरर्थध्रुवोदारां चांपेयोद्गंधिकुंतलां |
मधुस्नपितमृद्वीकमधुरालापपेशलां || 54 ||

शिवां षोडशवार्षीकां शिवांकतलवासिनीं |
चिन्मयीं हृदयांभोजे चिंतयेज्जापकोत्तमः || 55 ||

इति त्रिपुरसुंदर्या हृदयं सर्वकामदं |
सर्वदारिद्र्यशमनं सर्वसंपत्प्रदं नृणां || 56 ||

तापज्वरार्तिशमनं तरुणीजनमोहनं |
महाविषहरं पुण्यं मांगल्यकरमद्भुतं || 57 ||

अपमृत्युहरं दिव्यमायुष्यश्रीकरं परं |
अपवर्गैकनिलयमवनीपालवश्यदं || 58 ||

पठति ध्यानरत्नं यः प्रातः सायमतंद्रितः |
न विषादैः स च पुमान् प्राप्नोति भुवनत्रयं || 59 ||

इति श्रीमहात्रिपुरसुंदरीहृदयं संपूर्णं |

अर्थ

श्री महात्रिपुरसुंदरी हृदयं स्तोत्र, आदिशक्ति ललिता महेश्वरी के आंतरिक दिव्य स्वरूप को प्रकट करने वाला एक अत्यंत गहरा और रहस्यमय भजन है। यह उनकी अनंत सुंदरता, कृपा, करुणा और दिव्य संप्रभुता का सर्वोच्च अवतार है। यह स्तोत्र भक्त को देवी के सूक्ष्म ध्यान रूप में ले जाता है, श्रीचक्र में उनके प्रकटीकरण और कामेश्वर के साथ उनकी एकात्मकता को मन में स्थापित करने में मदद करता है। स्तोत्र के प्रारंभिक श्लोक देवी के सिंदूर वर्ण की तरह चमकते हुए रूप का वर्णन करते हैं, जिसमें वे दिव्य नंदनवन, सुगंधित पुष्पों, किन्नरों के संगीत और मणि-जड़ित दीप्तिमान मार्गों से भरे एक दिव्य लोक में विराजमान हैं।

यह स्तोत्र धीरे-धीरे भक्त को बाहरी दिव्य परिदृश्य से श्रीचक्र के आंतरिक गर्भगृह की ओर ले जाता है। इसके केंद्र में चिंतामणि गृह है, जो लाखों बिजली की चमक की तरह दीप्तिमान है, नीलम की दीवारों, रत्नजड़ित द्वारों और दिव्य परिचारकों से घिरा हुआ है। इस दीप्तिमान महल के भीतर, माणिक्य सिंहासन पर देवी कामेश्वर (शिव और शक्ति का ब्रह्मांडीय मिलन) के साथ विराजमान हैं। यह श्री विद्या का हृदय है: ब्रह्मांड को चेतना और आनंद के खेल के रूप में समझना। यह वर्णन केवल भौतिक नहीं है, बल्कि आंतरिक जागरण, शुद्धिकरण और भक्त के हृदय में कुंडलिनी के खिलने के चरणों का प्रतीक है।

तत्पश्चात् स्तोत्र देवी के दिव्य शरीर का विस्तृत, प्रेमपूर्ण और भक्तिमय वर्णन प्रस्तुत करता है। उनका चंद्रकला से सुशोभित ललाट, मंद मुस्कान से प्रकाशित मुख, करुणा से भरी दृष्टि, सुंदर कर्णभूषण, मणिमय मयूर पंखों की चमक, हंस के समान चाल, स्वर्ण कांति वाला वक्षस्थल, मणिमेखला से सुशोभित कमर और दिव्य चरण कमल – इस प्रकार देवी का रूप आध्यात्मिक ध्यान में जीवंत हो उठता है। प्रत्येक विवरण केवल सौंदर्य का वर्णन नहीं है, बल्कि शक्ति को आंतरिक रूप से देखने की ध्यान प्रक्रिया को दर्शाता है।

यह महात्रिपुरसुंदरी हृदयं केवल एक स्तोत्र नहीं है, बल्कि देवी के संपूर्ण सार को समाहित करने वाला एक ध्यान मार्गदर्शक है। इसका पाठ करने से भक्त देवी के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करते हैं, उनकी कृपा और शक्ति को अपने जीवन में आमंत्रित करते हैं। यह भौतिक और आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में समग्र कल्याण प्रदान करने की क्षमता रखता है। ऐसा माना जाता है कि इस हृदय स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने वाले तीनों लोकों के फल प्राप्त करते हैं।

लाभ (Benefits):

  • दरिद्रता, रोग और अपमृत्यु निवारण: इस स्तोत्र का पाठ दरिद्रता को दूर करता है, सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति दिलाता है और अकाल मृत्यु के भय को समाप्त करता है।
  • ऐश्वर्य, मंगल और आयु-आरोग्य प्राप्ति: भक्तों को अपार ऐश्वर्य, सभी शुभ फल, दीर्घायु और पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करता है।
  • भक्ति की रक्षा और शत्रु-दोष निवारण: यह भक्ति की रक्षा करता है, शत्रुओं और सभी दोषों से मुक्ति दिलाता है, जीवन की बाधाओं को दूर करता है।
  • मानसिक शांति और दिव्य अनुग्रह: ध्यान करने वालों को गहरी मानसिक शांति, निर्मल मन और देवी का प्रत्यक्ष दिव्य अनुग्रह प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री महात्रिपुरसुंदरी हृदयं क्या है?
यह आदिशक्ति ललिता महेश्वरी के आंतरिक दिव्य स्वरूप, उनकी सुंदरता, करुणा और शक्ति को प्रकट करने वाला एक गहरा स्तोत्र है। यह श्रीचक्र में देवी के ध्यान रूप को स्थापित करने में मदद करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ सामान्यतः सुबह या शाम को, स्नान करके शुद्ध होकर, देवी पर पूर्ण भक्ति और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। देवी के स्वरूप का ध्यान करते हुए पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
इस स्तोत्र का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ दरिद्रता, रोग और अकाल मृत्यु को दूर करता है। साथ ही यह ऐश्वर्य, मंगल, दीर्घायु, स्वास्थ्य, मानसिक शांति और देवी का दिव्य अनुग्रह प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
महात्रिपुरसुंदरी के भक्त, आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले, या देवी का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। यह सभी के लिए खुला है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
विशिष्ट परिणामों के लिए, इसे 11, 21, 108 बार या गुरु के निर्देशानुसार पाठ किया जा सकता है। प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पाठ करने से निरंतर आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
श्री महात्रिपुरसुंदरी हृदयं प्राचीन तांत्रिक ग्रंथों का एक हिस्सा है, विशेष रूप से श्री विद्या परंपरा से संबंधित है। यह देवी के गूढ़ और गहन पहलुओं को प्रकट करता है।

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