गजेंद्र मोक्षः
श्री शुक उवाच –
आसीद्गिरिवरो राजन् त्रिकूट इति विश्रुतः |
क्षीरोदेनावृतः श्रीमान् योजनायुतमुच्छ्रितः || 1 ||
तावता विस्तृतः पर्यक्त्रिभिः शृंगैः पयोनिधिं |
दिशश्च रोचयन्नास्ते रौप्यायसहिरण्मयैः || 2 ||
अन्यैश्च ककुभः सर्वा रत्नधातु विचित्रितैः |
नानाद्रुमलतागुल्मैः निर्घोषैः निर्झरांभसां || 3 ||
सदानिमज्यमानांघ्रिः समंतात्पय ऊर्मिभिः |
करोति श्यामलां भूमिं हरिन्मरकताश्मभिः || 4 ||
सिद्धचारणगंधर्वैर्विद्याधर महोरगैः |
किन्नरैरप्सरोभिश्च क्रीडद्भिर्जुष्टकंदरः || 5 ||
यत्र संगीतसन्नादैर्नदद्गुहममर्षया |
अभिगर्जंति हरयः श्लाघिनः परशंकया || 6 ||
नानारण्यपशुव्रात संकुलद्रोण्यलंकृतः |
चित्रद्रुमसुरोद्यान कलकंठ विहंगमः || 7 ||
सरित्सरोभिरच्छोदैः पुलिनैर्मणिवालुकैः |
देवस्त्रिमज्जनामोद सौरभांब्वनिलैर्युतः || 8 ||
तस्य द्रोण्यां भगवतो वरुणस्य महात्मनः |
उद्यानमृतुमन्नाम ह्याक्रीडं सुरयोषितां || 9 ||
सर्वतोऽलंकृतं दिव्यैर्नित्यपुष्पफलद्रुमैः |
मंदारैः पारिजातैश्च पाटलाशोकचंपकैः || 10 ||
चूतैः प्रियाळैः पनसैराम्रैराम्रातकैरपि |
क्रमुकैर्नारिकेळैश्च खर्जूरैर्बीजपूरकैः || 11 ||
मधूकैस्तालसालैश्च तमालै रसनार्जुनैः |
अरिष्टोदुंबरप्लक्षैर्वटैः किंशुकचंदनैः || 12 ||
पिचुमंदैः कोविदारैः सरळैः सुरदारुभिः |
द्राक्षेक्षु रंभाजंबूभिर्बदर्यक्षाभयामलैः || 13 ||
बिल्वैः कपित्थैर्जंबीरैर्वृतो भल्लातकैरपि |
तस्मिन्सरः सुविपुलं लसत्कांचनपंकजं || 14 ||
कुमुदोत्पलकल्हार शतपत्रश्रियोर्जितं |
मत्तषट्पद निर्घुष्टं शकुंतैः कलनिस्वनैः || 15 ||
हंसकारंडवाकीर्णं चक्राह्वैः सारसैरपि |
जलकुक्कुटकोयष्टि दात्यूहकलकूजितं || 16 ||
मत्स्यकच्छपसंचार चलत्पद्मरजःपयः |
कदंबवेतसनल नीपवंजुलकैर्वृतं || 17 ||
कुंदैः कुरवकाशोकैः शिरीषैः कूटजेंगुदैः |
कुब्जकैः स्वर्णयूथीभिर्नागपुन्नागजातिभिः || 18 ||
मल्लिकाशतपत्रैश्च माधवीजालकादिभिः |
शोभितं तीरजैश्चान्यैर्नित्यर्तुभिरलं द्रुमैः || 19 ||
तत्रैकदा तद्गिरिकाननाश्रयः
करेणुभिर्वारणयूथपश्चरन् |
सकंटकं कीचकवेणुवेत्रव-
-द्विशालगुल्मं प्ररुजन्वनस्पतीन् || 20 ||
यद्गंधमात्राद्धरयो गजेंद्रा
व्याघ्रादयो व्यालमृगाश्च खड्गाः |
महोरगाश्चापि भयाद्द्रवंति
सगौरकृष्णाः सरभाश्चमर्यः || 21 ||
वृका वराहा महिषर्क्षशल्या
गोपुच्छसालावृकमर्कटाश्च |
अन्यत्र क्षुद्रा हरिणाः शशादयः
चरंत्यभीता यदनुग्रहेण || 22 ||
स घर्मतप्तः करिभिः करेणुभि-
-र्वृतो मदच्युत्कलभैरभिद्रुतः |
गिरिं गरिम्णा परितः प्रकंपयन्
निषेव्यमाणोऽलिकुलैर्मदाशनैः || 23 ||
सरोऽनिलं पंकजरेणुरूषितं
जिघ्रन् विदूरान् मदविह्वलेक्षणः |
वृतः स्वयूथेन तृषार्दितेन त-
-त्सरोवराभ्याशमथागमद्द्रुतं || 24 ||
विगाह्य तस्मिन् अमृतांबु निर्मलं
हेमारविंदोत्पलरेणुवासितं |
पपौ निकामं निजपुष्करोद्धृतं
स्वात्मानमद्भिः स्नपयन्गतक्लमः || 25 ||
स पुष्करेणोद्धृतशीकरांबुभि-
-र्निपाययन् संस्नपयन् यथा गृही |
जिघ्रन् करेणुः कलभाश्च दुर्मना
ह्याचष्ट कृच्छ्रं कृपणोऽजमायया || 26 ||
तं तत्र कश्चिन्नृप दैवचोदितो
ग्राहो बलीयांश्चरणौ रुषाऽग्रहीत् |
यदृच्छयैवं व्यसनं गतो गजो
यथाबलं सोऽतिबलो विचक्रमे || 27 ||
तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो
विकृष्यमाणं तरसा बलीयसा |
विचुक्रुशुर्दीनधियोऽपरे गजाः
पार्ष्णिग्रहास्तारयितुं न चाशकन् || 28 ||
नियुध्यतोरेवमिभेंद्रनक्रयो-
-र्विकर्षतोरंतरतो बहिर्मिथः |
समाः सहस्रं व्यगमन् महीपते
सप्राणयोश्चित्रममंसतामराः || 29 ||
ततो गजेंद्रस्य मनोबलौजसां
कालेन दीर्घेण महानभूद्व्ययः |
विकृष्यमाणस्य जलेऽवसीदतो
विपर्ययोऽभूत्सकलं जलौकसः || 30 ||
इत्थं गजेंद्रः स यदाऽऽप संकटं
प्राणस्य देही विवशो यदृच्छया |
अपारयन्नात्मविमोक्षणे चिरं
दध्याविमां बुद्धिमथाभ्यपद्यत || 31 ||
नमामि मे ज्ञातय आतुरं गजाः
कुतः करिण्यः प्रभवंति मोक्षितुं |
ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतो
ह्यहं च तं यामि परं परायणं || 32 ||
यः कश्चनेशो बलिनोऽंतकोरगा-
-त्प्रचंडवेगादभिधावतो भृशं |
भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्भया-
-न्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहे || 33 ||
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे अष्टमस्कंधे द्वितीयोऽध्यायः || 2 ||
अर्थ
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र श्रीमद्भागवत पुराण के आठवें स्कंध में वर्णित एक अत्यंत भावपूर्ण और शरणागति प्रधान कथा है। यह भगवान की असीम करुणा और संकटकाल में की गई निश्छल प्रार्थना के महत्व को दर्शाता है। शुकदेव मुनि ने राजा परीक्षित को इस दिव्य कथा का वर्णन किया था। कथा का आरंभ त्रिकूट पर्वत के अनुपम सौंदर्य से होता है, जिसे स्वर्ग के समान बताया गया है। यह पर्वत देवताओं, गंधर्वों, किन्नरों और अप्सराओं का क्रीड़ास्थल था, जहाँ दिव्य वृक्ष, सुगंधित पवन, स्वच्छ जल, स्वर्ण कमलों से भरे सरोवर और दुर्लभ जीव-जंतु पाए जाते थे। यह समस्त सृष्टि के पालनहार श्रीहरि की अद्भुत रचना का प्रमाण था।
इसी रमणीय प्रदेश में गजेंद्र नामक एक विशालकाय गजराज अपने यूथ के साथ विचरण करता था। उसकी महाकाय देह से निकलने वाली गंध इतनी प्रभावशाली थी कि बाघ, सिंह और सर्प जैसे खूंखार जानवर भी उससे दूर भागते थे। एक दिन, गर्मी के तीव्र ताप से व्याकुल और प्यासे गजेंद्र ने अपने यूथ के साथ एक सुंदर सरोवर में प्रवेश किया। ठंडे जल में स्नान कर वह आनंदित हो रहा था, तभी उस सरोवर में रहने वाले एक भयंकर मगरमच्छ (ग्राह) ने उसके पैर को पकड़ लिया। एक ओर गजेंद्र, जो स्थल पर अत्यंत बलवान था, और दूसरी ओर मगरमच्छ, जो जल में अजेय था, के बीच एक भीषण युद्ध छिड़ गया। पुराणों के अनुसार, यह युद्ध हजारों वर्षों तक चलता रहा।
धीरे-धीरे, गजेंद्र जल में अपनी स्वाभाविक शक्ति खोने लगा और मगरमच्छ अपने प्राकृतिक निवास स्थान में अधिक शक्तिशाली होता गया। जब गजेंद्र पूरी तरह से अपनी शक्ति खोकर डूबने की कगार पर था, तब उसके यूथ के अन्य हाथी असहाय होकर केवल चीत्कार कर रहे थे। इस निर्णायक क्षण में, गजेंद्र ने यह अनुभव किया कि लौकिक शक्तियाँ उसे नहीं बचा सकतीं। अपने पूर्वजन्म के पुण्य और भगवद्भक्ति की स्मृति से, उसके अंतर्मन में दिव्य ज्ञान जागृत हुआ कि केवल परमात्मा की शरण ही एकमात्र उपाय है। आत्मनिष्ठा और पूर्ण शरणागति के साथ, उसने सोचा, 'मुझे इस मृत्यु के बंधन से कौन बचा सकता है? केवल सर्वेश्वर ही!' यह विचार कर, उसने अपनी सूंड में एक कमल का पुष्प धारण कर भगवान को अर्पित करते हुए, 'आदिमूल!' कहकर पुकारा।
गजेंद्र की इस हृदयविदारक पुकार को सुनते ही, श्री महाविष्णु समस्त लोकों के कार्यों को छोड़कर, अपने प्रिय भक्त की रक्षा के लिए गरुड़ पर सवार होकर तुरंत वहाँ पहुँच गए। आपत्काल में बंधु के समान प्रकट हुए श्रीहरि ने सरोवर में पहुँचकर अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का संहार किया और गजेंद्र को करुणापूर्ण मोक्ष प्रदान किया। यह घटना भगवान के भक्तवात्सल्य और शरणागति की महिमा का अद्वितीय उदाहरण है। गजेंद्र का पूर्ण समर्पण, उसकी निश्छल भक्ति और संकटकाल में उसे तुरंत मिली भगवान की सहायता – यही इस कथा का सार है। यह मानव के अहंकार और लौकिक शक्ति की सीमाओं को दर्शाते हुए, परमात्मा की सर्वोच्च शक्ति और उसकी शरण में आए हुए को मिलने वाले अभय का संदेश देती है।
प्रयोजन (Benefits):
- भय और संकटों से मुक्ति: इस स्तोत्र का पाठ करने या सुनने से मानसिक भय, चिंताएँ और जीवन के कष्ट दूर होते हैं, तथा मन में साहस और धैर्य की वृद्धि होती है।
- भगवान की कृपा प्राप्ति: गजेंद्र की तरह पूर्ण शरणागति भाव से भगवान से प्रार्थना करने वालों को श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है और उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
- मानसिक शांति और पापों का नाश: गजेंद्र मोक्ष के पाठ से मन को असीम शांति मिलती है और जन्म-जन्मांतर के पापों का निवारण होकर आत्मा की शुद्धि होती है।
- स्वास्थ्य और सुरक्षा: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। भगवान किसी भी प्रकार के खतरों, रोगों और शत्रुओं से रक्षा प्रदान करते हैं।
- परिवार पर दिव्य आशीर्वाद: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से परिवार में सुख, शांति, समृद्धि बनी रहती है और सदैव दैवीय आशीर्वाद प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र क्या है?
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
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