ध्रुव कृत भगवत् स्तुतिः
ध्रुव उवाच |
योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां
संजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना |
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
प्राणान्नमो भगवते पुरूषाय तुभ्यं || 1 ||
एकस्त्वमेव भगवन्निदमात्मशक्त्या
मायाख्ययोरुगुणया महदाद्यशेषं |
सृष्ट्वानुविश्य पुरुषस्तदसद्गुणेषु
नानेव दारुषु विभावसुवद्विभासि || 2 ||
त्वद्दत्तया वयुनयेदमचष्ट विश्वं
सुप्तप्रबुद्ध इव नाथ भवत्प्रपन्नः |
तस्यापवर्ग्यशरणं तव पादमूलं
विस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबंधो || 3 ||
नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया ते
ये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतोः |
अर्चंति कल्पकतरुं कुणपोपभोग्य-
मिच्छंति यत्स्पर्शजं निरयेऽपि नॄणां || 4 ||
या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म-
ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् |
सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत्
किंत्वंतकासिलुलितात्पततां विमानात् || 5 ||
भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसंगो
भूयादनंत महताममलाशयानां |
येनांजसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं
नेष्ये भवद्गुणकथामृतपानमत्तः || 6 ||
ते न स्मरंत्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं
ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहवित्तदाराः |
ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविंद-
सौगंध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसंगाः || 7 ||
तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य-
मर्त्यादिभिः परिचितं सदसद्विशेषं |
रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकं
नातः परं परम वेद्मि न यत्र वादः || 8 ||
कल्पांत एतदखिलं जठरेण गृह्णन्
शेते पुमान् स्वदृगनंतसखस्तदंके |
यन्नाभिसिंधुरुहकांचनलोकपद्म-
गर्भे द्युमान् भगवते प्रणतोऽस्मि तस्मै || 9 ||
त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा
कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः |
यद्बुद्ध्यवस्थितिमखंडितया स्वदृष्ट्या
द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से || 10 ||
यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतंति
विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् |
तद्ब्रह्म विश्वभवमेकमनंतमाद्य-
मानंदमात्रमविकारमहं प्रपद्ये || 11 ||
सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादपद्म-
माशीस्तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः |
अप्येवमार्य भगवान् परिपाति दीनान्
वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् || 12 ||
इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे चतुर्थः स्कंधे नवमोऽध्याये ध्रुव कृत भगवत्स्तुतिः ||
अर्थ
ध्रुव कृत भगवत् स्तुति: श्रीमद्भागवतम् में वर्णित यह स्तुति, पाँच वर्षीय बालक ध्रुव द्वारा भगवान विष्णु के प्रत्यक्ष दर्शन के उपरांत की गई अत्यंत पवित्र प्रार्थना है। अपनी माता के वचनों से प्रेरित होकर, ध्रुव ने घोर वन में नारायण का ध्यान कर गहन तपस्या की और जब भगवान प्रकट हुए, तब उसने इस स्तुति का गायन किया। इस स्तुति का प्रत्येक श्लोक ध्रुव की गहरी भक्ति, ज्ञान, कृतज्ञता और परमात्मा के प्रति अटूट समर्पण को अद्भुत ढंग से व्यक्त करता है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि भगवान की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता और भक्तों के प्रति उनकी असीम करुणा का उद्घोष करने वाला एक गहन आध्यात्मिक अनुभव है।
ध्रुव अपने पहले श्लोक में, अपने भीतर प्रवेश कर, अपनी सुप्त वाणी, इंद्रियों और प्राणशक्ति को अपनी स्वयं की शक्ति से पुनर्जीवित करने वाले अखिल-शक्तिशाली भगवान को नमस्कार करते हैं। यह इस सत्य को दर्शाता है कि भगवान ही हमारे अंतर्मन में निवास करते हैं और हमारे सभी कार्यों को शक्ति प्रदान करते हैं। दूसरे श्लोक में, वे कहते हैं कि सृष्टि से लेकर प्रलय तक जो कुछ भी होता है, वह सब भगवान की शक्ति, भगवान की माया और भगवान का ही स्वरूप है। वे भगवान की तुलना लकड़ी में छिपी अग्नि से करते हैं, यह दर्शाते हुए कि भगवान सभी विषयों में व्याप्त हैं। भगवान सृष्टि के बाहर भी हैं और भीतर भी।
तीसरे श्लोक में, ध्रुव आश्चर्यचकित होकर पूछते हैं कि मोक्ष प्रदान करने वाले भगवान की शरण एक बार मिल जाए, तो फिर उससे कौन दूर हट सकता है? वे कहते हैं कि भगवान की शरण ही निरंतर आनंद प्रदान करती है। चौथे श्लोक में, ध्रुव इस बात पर खेद व्यक्त करते हैं कि भगवान की माया से मोहित होकर कुछ लोग क्षणिक शारीरिक सुखों के लिए मोक्षदाता कल्पवृक्ष रूपी भगवान से ऐसे तुच्छ भोगों की इच्छा करते हैं, जो नरक में भी मनुष्यों को प्राप्त नहीं होते। पाँचवें श्लोक में, वे कहते हैं कि भगवान के चरण-कमलों के ध्यान से और उनकी कथाओं को सुनने से जो आनंद और शांति मिलती है, वह इस लोक में या ब्रह्मलोक में भी नहीं मिल सकती। इस प्रकार के शाश्वत आनंद को छोड़कर नश्वर सुखों के पीछे भागना व्यर्थ है, यह उनकी गहरी समझ है।
छठे श्लोक में, ध्रुव अनंत गुणों वाले भगवान में अपनी भक्ति को निरंतर प्रवाहित होते रहने की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि भवसागर को पार करने के लिए भगवान के गुण और उनकी कथाएँ ही एकमात्र नौका हैं। सातवें श्लोक में, वे कहते हैं कि घर, संपत्ति, संबंधी – ये सभी भगवान से प्रेम करने वालों के लिए तुच्छ प्रतीत होते हैं, क्योंकि अंततः भगवान से प्रेम करने वालों के लिए सांसारिक बंधन महत्वहीन हो जाते हैं। आठवें श्लोक में, ध्रुव बताते हैं कि प्राणियों से लेकर देवताओं तक सभी रूप भगवान की महान शक्तियों के प्रतिफल हैं, फिर भी भगवान उनसे कहीं अधिक परिपूर्ण हैं। नौवें श्लोक में, वे कहते हैं कि जब संपूर्ण सृष्टि का विनाश हो जाता है, तब भी भगवान की नाभि से ब्रह्मा का कमल उत्पन्न होता है, इस प्रकार वे भगवान को ब्रह्मांड का आदि नियंत्रक घोषित करते हैं।
दसवें श्लोक में, ध्रुव भगवान को नित्य शुद्ध, नित्य मुक्त और स्थिर स्वभाव वाला बताते हैं। वे कहते हैं कि भगवान संसार के परिवर्तनों को देखते हैं, परंतु उन परिवर्तनों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ग्यारहवें श्लोक में, वे कहते हैं कि सभी विरोधी शक्तियाँ भगवान में ही समाहित होती हैं – वही परब्रह्म का स्वरूप है। भगवान आदि और अंत रहित परम आनंदमय हैं। अंत में, बारहवें श्लोक में, ध्रुव अपनी स्तुति का समापन करते हुए कहते हैं कि भगवान के चरण-कमल सभी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं, और जिस प्रकार एक गाय अपने बछड़े को प्रेम से बचाती है, उसी प्रकार भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। यह स्तुति भक्ति की पराकाष्ठा और भगवान की सर्वोच्चता का उद्घोष करने वाली एक महान कृति है।
लाभ (Benefits):
- मन की शांति और स्थिरता: इस स्तुति का निरंतर पाठ करने से मन की बेचैनी दूर होती है और गहरी शांति व स्थिरता प्राप्त होती है।
- अटूट भक्ति की वृद्धि: भगवान की अनंत महिमा का गान करने वाली यह स्तुति भक्तों में भगवान के प्रति अटूट प्रेम और श्रद्धा का संचार करती है।
- आध्यात्मिक ज्ञानोदय: भगवान की सर्वव्यापकता, माया शक्ति और मोक्ष के स्वरूप के प्रति ध्रुव की समझ पाठकों में भी आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाती है।
- इच्छाओं की पूर्ति: जैसा कि ध्रुव ने कहा है कि भगवान के चरण-कमल सभी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं, शुद्ध भक्ति से इस स्तुति का पाठ करने वालों की सकारात्मक इच्छाएँ पूरी होती हैं।
- सांसारिक बंधनों से मुक्ति: यह स्तुति बताती है कि भगवान की शरण ही भवसागर को पार करने में सहायक है, जिससे अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ध्रुव कृत भगवत् स्तुति क्या है?
इस स्तुति का पाठ कब करना चाहिए?
ध्रुव कृत भगवत् स्तुति के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तुति का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तुति का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तुति का मूल स्रोत क्या है?
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