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दीनबंध्वष्टकं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रश्री महाविष्णु
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दीनबंध्वष्टकं

यस्मादिदं जगदुदेति चतुर्मुखाद्यं
यस्मिन्नवस्थितमशेषमशेषमूले |
यत्रोपयाति विलयं च समस्तमंते
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः || 1 ||

चक्रं सहस्रकरचारु करारविंदे
गुर्वी गदा दरवरश्च विभाति यस्य |
पक्षींद्रपृष्ठपरिरोपितपादपद्मो
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः || 2 ||

येनोद्धृता वसुमती सलिले निमग्ना
नग्ना च पांडववधूः स्थगिता दुकूलैः |
सम्मोचितो जलचरस्य मुखाद्गजेंद्रो
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः || 3 ||

यस्यार्द्रदृष्टिवशतस्तु सुराः समृद्धिं
कोपेक्षणेन दनुजा विलयं व्रजंति |
भीताश्चरंति च यतोऽर्कयमानिलाद्याः
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः || 4 ||

गायंति सामकुशला यमजं मखेषु
ध्यायंति धीरमतयो यतयो विविक्ते |
पश्यंति योगिपुरुषाः पुरुषं शरीरे
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः || 5 ||

आकाररूपगुणयोगविवर्जितोऽपि
भक्तानुकंपननिमित्तगृहीतमूर्तिः |
यः सर्वगोऽपि कृतशेषशरीरशय्यो
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः || 6 ||

यस्यांघ्रिपंकजमनिद्रमुनींद्रबृंदै-
-राराध्यते भवदवानलदाहशांत्यै |
सर्वापराधमविचिंत्य ममाखिलात्मा
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः || 7 ||

यन्नामकीर्तनपरः श्वपचोऽपि नूनं
हित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति |
दग्ध्वा ममाघमखिलं करुणेक्षणेन
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः || 8 ||

दीनबंध्वष्टकं पुण्यं ब्रह्मानंदेन भाषितं |
यः पठेत् प्रयतो नित्यं तस्य विष्णुः प्रसीदति || 9 ||

इति श्रीमत्परमहंस स्वामि ब्रह्मानंद विरचितं दीनबंध्वष्टकं |

अर्थ

दीनबंध्वष्टकं एक अत्यंत कोमल और गहन भक्ति से ओतप्रोत स्तोत्र है, जो भगवान को “दीनबंधु” – अर्थात दुःखियों, असहायों और शरणागतों के रक्षक के रूप में स्तुति करता है। यह स्तोत्र इस घोषणा के साथ आरंभ होता है कि भगवान ही सृष्टि, स्थिति और लय – जगत की उत्पत्ति से लेकर अंत तक की प्रत्येक प्रक्रिया के मूल, आधार और कारण हैं। यह प्रार्थना करता है कि वह परब्रह्म स्वरूप, जो ब्रह्मादि देवताओं के भी आधार हैं, भक्त के समक्ष प्रत्यक्ष हों और अपनी करुणामयी उपस्थिति से उसे धन्य करें।

स्तोत्र में भगवान के दिव्य स्वरूप का सजीव वर्णन किया गया है – उनके चक्र, गदा, और कमल जैसे आयुध, तथा गरुड़ पर विराजमान उनके चरण कमल। भक्त की यह तीव्र अभिलाषा व्यक्त होती है कि ये सभी रूप उसके हृदय में अनुग्रह के रूप में प्रकट हों। भगवान की असीम करुणा के अनेक उदाहरणों का स्मरण किया गया है: समुद्र से पृथ्वी का उद्धार करने वाला वराह अवतार, द्रौपदी के चीरहरण के समय उसकी लाज बचाना, और गजेंद्र को मगरमच्छ के चंगुल से मुक्त करना। ये सभी घटनाएँ भगवान के “दीनबंधु” स्वरूप को दर्शाती हैं, जो अपने भक्तों की पुकार पर तुरंत सहायता के लिए आते हैं।

भगवान की कृपा दृष्टि देवताओं को समृद्धि प्रदान करती है, जबकि उनकी क्रोधपूर्ण दृष्टि असुरों का संहार करती है। सूर्य, वायु और अग्नि जैसी प्रकृति की शक्तिशाली शक्तियाँ भी उनसे भयभीत रहती हैं और उनके आदेशों का पालन करती हैं। यज्ञों में सामवेद के ज्ञाता विद्वान उनकी महिमा का गान करते हैं; योगी उन्हें अपने हृदय में देखते हैं; और एकांत में साधना करने वाले साधक ध्यान के माध्यम से उनका अनुभव करते हैं। यद्यपि वे रूप, आकार और गुणों से परे परम सत्ता हैं, तथापि वे भक्तों के प्रेम और उद्धार के लिए विभिन्न अवतार धारण करते हैं और सभी लोकों की आत्मा के रूप में विद्यमान रहते हैं।

संसार के जलते हुए दुःखों से मुक्ति पाने के लिए मुनिजन उनके चरण कमलों की पूजा करते हैं। कलियुग में, उनका नाम स्मरण मात्र ही समस्त पापों को जलाकर आत्मा को शुद्ध करता है। स्तोत्र का समापन भक्त की करुणा भरी प्रार्थना के साथ होता है: हे प्रभु, अपनी एक करुणामयी दृष्टि से मेरे समस्त पापों को भस्म कर दो और मुझ पर अपनी दया शक्ति प्रदान करते हुए मेरे समक्ष प्रत्यक्ष हो जाओ। यह स्तोत्र भगवान की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता और दीन-दुःखियों के प्रति उनके अगाध प्रेम का उद्घोष करता है।

लाभ (Benefits):

  • भगवान की करुणा और रक्षा: यह स्तोत्र भगवान की असीम करुणा, सुरक्षा और अनुग्रह को आकर्षित करने में सहायक है, विशेषकर संकट के समय।
  • पापों का क्षय: इसे पढ़ने से पूर्व जन्म और वर्तमान जन्म के पापों के फल नष्ट होते हैं, जिससे आत्मा की शुद्धि होती है।
  • मानसिक शांति: भय, दुख, चिंता और भ्रम को दूर करके मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
  • सांसारिक कष्टों से मुक्ति: पारिवारिक, जीवन संबंधी और स्वास्थ्य समस्याओं से मुक्ति पाने तथा उनसे लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।
  • आध्यात्मिक विकास: नाम स्मरण की शक्ति को बढ़ाता है, भक्ति को गहरा करता है और आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दीनबंध्वष्टकं क्या है?
दीनबंध्वष्टकं आठ श्लोकों का एक भक्ति स्तोत्र है जो भगवान विष्णु को 'दीनबंधु' के रूप में समर्पित है। यह स्तोत्र भगवान को सृष्टि, स्थिति और लय का मूल कारण बताते हुए उनकी असीम करुणा का गुणगान करता है।
दीनबंध्वष्टकं का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, विशेष रूप से जब मन दुःखी हो, जीवन में कठिनाइयाँ हों, या भगवान की कृपा प्राप्त करने की इच्छा हो। प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
दीनबंध्वष्टकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से भगवान की करुणा, रक्षा और अनुग्रह प्राप्त होता है। यह पिछले और वर्तमान जन्म के पापों को नष्ट करता है, मानसिक शांति प्रदान करता है और सांसारिक कष्टों से मुक्ति दिलाता है।
दीनबंध्वष्टकं का पाठ कौन कर सकता है?
दीनबंध्वष्टकं का पाठ कोई भी व्यक्ति कर सकता है, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या लिंग का हो। भगवान में सच्ची श्रद्धा और भक्ति रखने वाला कोई भी भक्त इसका पाठ करके लाभ प्राप्त कर सकता है।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
सामान्यतः, इस स्तोत्र का प्रतिदिन एक या तीन बार पाठ किया जा सकता है। अधिक लाभ के लिए, कुछ भक्त इसे 11, 21, या 108 बार भी पाठ करते हैं, जिससे गहन आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होते हैं।
दीनबंध्वष्टकं स्तोत्र की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
दीनबंध्वष्टकं हिंदू धर्म के प्राचीन स्तोत्रों में से एक है। इसके विशिष्ट रचयिता या रचनाकाल के बारे में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह भक्ति परंपरा में सदियों से प्रचलित है।

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