भगवन्मानसपूजा
हृदंभोजे कृष्णः सजलजलदश्यामलतनुः
सरोजाक्षः स्रग्वी मुकुटकटकाद्याभरणवान् |
शरद्राकानाथप्रतिमवदनः श्रीमुरळिकां
वहन् ध्येयो गोपीगणपरिवृतः कुंकुमचितः || 1 ||
पयोंभोधेर्द्वीपान्मम हृदयमायाहि भगव-
-न्मणिव्रातभ्राजत्कनकवरपीठं भज हरे |
सुचिह्नौ ते पादौ यदुकुलज नेनेज्मि सुजलै-
-र्गृहाणेदं दूर्वाफलजलवदर्घ्यं मुररिपो || 2 ||
त्वमाचामोपेंद्र त्रिदशसरिदंभोऽतिशिशिरं
भजस्वेमं पंचामृतफलरसाप्लावमघहन् |
द्युनद्याः काळिंद्या अपि कनककुंभस्थितमिदं
जलं तेन स्नानं कुरु कुरु कुरुष्वाऽचमनकं || 3 ||
तटिद्वर्णे वस्त्रे भज विजयकांताधिहरण
प्रलंबारिभ्रातर्मृदुलमुपवीतं कुरु गळे |
ललाटे पाटीरं मृगमदयुतं धारय हरे
गृहाणेदं माल्यं शतदळतुलस्यादिरचितं || 4 ||
दशांगं धूपं सद्वरद चरणाग्रेऽर्पितमिदं
मुखं दीपेनेंदुप्रभवरजसं देव कलये |
इमौ पाणी वाणीपतिनुत सकर्पूररजसा
विशोध्याग्रे दत्तं सलिलमिदमाचाम नृहरे || 5 ||
सदा तृप्तान्नं षड्रसवदखिलव्यंजनयुतं
सुवर्णामत्रे गोघृतचषकयुक्ते स्थितमिदं |
यशोदासूनो तत्परमदययाशान सखिभिः
प्रसादं वांछद्भिः सह तदनु नीरं पिब विभो || 6 ||
सचूर्णं तांबूलं मुखशुचिकरं भक्षय हरे
फलं स्वादु प्रीत्या परिमळवदास्वादय चिरं |
सपर्यापर्याप्त्यै कनकमणिजातं स्थितमिदं
प्रदीपैरारार्तिं जलधितनयाश्लिष्ट रुचये || 7 ||
विजातीयैः पुष्पैरतिसुरभिभिर्बिल्वतुलसी
युतैश्चेमं पुष्पांजलिमजित ते मूर्ध्नि निदधे |
तव प्रादक्षिण्यक्रमणमघविध्वंसि रचितं
चतुर्वारं विष्णो जनिपथगतेश्चांतविदुषा || 8 ||
नमस्कारोऽष्टांगः सकलदुरितध्वंसनपटुः
कृतं नृत्यं गीतं स्तुतिरपि रमाकांत त इयं |
तव प्रीत्यै भूयादहमपि च दासस्तव विभो
कृतं छिद्रं पूर्णं कुरु कुरु नमस्तेऽस्तु भगवन् || 9 ||
सदा सेव्यः कृष्णः सजलघननीलः करतले
दधानो दध्यन्नं तदनु नवनीतं मुरळिकं |
कदाचित्कांतानां कुचकलशपत्राळिरचना
समासक्तः स्निग्धैः सह शिशुविहारं विरचयन् || 10 ||
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविंदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ भगवन्मानसपूजा संपूर्णं |
अर्थ
भगवन्मानसपूजा जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत सुंदर और गहन भक्ति स्तोत्र है। यह स्तोत्र बाहरी पूजा विधियों से भिन्न, भगवान को हमारे हृदय के मंदिर में, मन के पुष्पों और भावनाओं से पूजने के 'मानसिक पूजा' के महत्व को प्रतिपादित करता है। इसमें कवि अद्भुत रूप से उस परम तत्व को चित्रित करते हैं जहाँ भगवान को हमारे मन का अतिथि मानकर, प्रत्येक पूजा विधि को मानसिक रूप से अर्पित किया जाता है। यह भगवान के साथ एक गहरा, व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने में सहायक है।
इस स्तोत्र में, भक्त सर्वप्रथम भगवान कृष्ण को अपने हृदय कमल में ध्यान करता है। कवि प्रार्थना करता है कि कृष्ण नीले मेघ के समान श्याम वर्ण वाले, कमल जैसे नेत्रों वाले, सुंदर मुकुट, कंगन आदि आभूषणों से सुशोभित, शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के समान मुख वाले, श्री मुरली धारण किए हुए, गोपियों से घिरे हुए और कुमकुम से अलंकृत होकर मन के सरोवर में दर्शन दें। वह क्षीरसागर के द्वीप से अपने हृदय में आकर, मणियों के समूह से चमकते हुए स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान होने के लिए भगवान को आमंत्रित करता है।
तत्पश्चात, भक्त मानसिक रूप से कृष्ण के सुंदर चरणों को पवित्र जल से धोता है, दूर्वा, फल और जल से अर्घ्य समर्पित करता है। त्रिलोक को पावन करने वाले गंगाजल, पंचामृत और यमुना जल से स्नान कराकर, आचमन के लिए जल अर्पित करता है। इसके बाद, बिजली के समान चमकते वस्त्र, कोमल उपवीत, मृगमद (कस्तूरी) मिश्रित चंदन का तिलक, और शतदल (कमल), तुलसी आदि दिव्य पुष्पों से बनी मालाएं मानसिक रूप से अर्पित करता है।
धूप, दीप, नैवेद्य, और पान — ये सभी अविचल भक्ति के साथ मन में ही कल्पित और अर्पित किए जाते हैं। यशोदासूता, गोपालकृष्ण कहकर भक्त कृष्ण को प्रसाद ग्रहण करने और जल पीने के लिए आमंत्रित करता है। इसके बाद तांबूल, फल और सुगंधित द्रव्य — ये सभी शुद्ध मानसिक पूजा के रूप में अर्पित किए जाते हैं। पुष्पांजलि, बिल्व, तुलसी जैसे दिव्य पुष्पों को मन में समर्पित कर, कृष्ण के दिव्य चरित्र को प्रदक्षिणा मानकर, चार प्रदक्षिणाओं के समान विनम्र चित्तयात्रा करता है। अष्टांग नमस्कार, नृत्य, गायन, स्तोत्र — ये सभी केवल भगवान के प्रेम के लिए अर्पित किए जाते हैं। अंत में, भक्त स्वयं को कृष्ण का शाश्वत दास घोषित करता है और पूजा में हुई त्रुटियों को भगवान से पूर्ण करने की प्रार्थना करता है। समापन श्लोक में, कवि कृष्ण को शिशु रूप में, दही-मक्खन से खेलते हुए, मुरली बजाते हुए, और गोपियों के साथ क्रीड़ा करते हुए एक मनमोहक रूप में चित्रित करता है, जिन्हें मन में नित्य सेवा योग्य माना गया है। यह संपूर्ण स्तोत्र मन के माध्यम से ही भगवान का दर्शन करने, अनुभव करने और उन तक पहुँचने का परम योग मार्ग प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- मन की शुद्धि और एकाग्रता: यह मानसिक पूजा मन को भगवान की ओर केंद्रित करके, अनावश्यक विचारों से दूर रखती है, उसे शुद्ध करती है और एकाग्रता बढ़ाती है।
- आंतरिक संबंध की स्थापना: बाहरी अनुष्ठानों के बिना सीधे हृदय से भगवान की आराधना करने से, एक गहरा, भावनात्मक और व्यक्तिगत आध्यात्मिक संबंध मजबूत होता है।
- आत्म शांति और आनंद: भगवान के साथ आंतरिक रूप से एकाकार होने का अनुभव मन को अत्यधिक शांति, संतोष और अविचल आनंद प्रदान करता है।
- बाहरी बंधनों से मुक्ति: पूजा के लिए किसी बाहरी सामग्री की आवश्यकता न होने के कारण, भक्त देश, काल और परिस्थितियों की सीमाओं से ऊपर उठकर कहीं भी, कभी भी भगवान की पूजा करने में सक्षम होता है।
- भक्ति भाव की वृद्धि: केवल मन से ही संपूर्ण पूजा का निष्पादन करने से, भक्ति अधिक तीव्र और प्रामाणिक रूप से बढ़ती है, जिससे भगवान के प्रति प्रेम में वृद्धि होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवन्मानसपूजा क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
भगवन्मानसपूजा के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवन्मानसपूजा स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या रचयिता कौन हैं?
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