- ॐ अनंताय नमः
- ॐ पद्मनाभाय नमः
- ॐ शेषाय नमः
- ॐ सप्तफणान्विताय नमः
- ॐ तल्पात्मकाय नमः
- ॐ पद्मकराय नमः
- ॐ पिंगप्रसन्नलोचनाय नमः
- ॐ गदाधराय नमः
- ॐ चतुर्भाहवे नमः
- ॐ शंखचक्रधराय नमः
- ॐ अव्ययाय नमः
- ॐ नवाम्रपल्लवाभासाय नमः
- ॐ ब्रह्मसूत्रविराजिताय नमः
- ॐ शिलासुपूजिताय नमः
- ॐ देवाय नमः
- ॐ कौंडिन्यव्रततोषिताय नमः
- ॐ नभस्यशुक्ल चतुर्दशी पूज्याय नमः
- ॐ फणेश्वराय नमः
- ॐ संघर्षणाय नमः
- ॐ चित् स्वरूपाय नमः
- ॐ सूत्र ग्रंधि सुसंस्तिताय नमः
- ॐ कौंडिन्यवरदाय नमः
- ॐ पृथ्वीधारिणी नमः
- ॐ पाताळनायकाय नमः
- ॐ सहस्राक्षाय नमः
- ॐ अखिलाधराय नमः
- ॐ सर्वयोगिकृपाकराय नमः
- ॐ सहप्रपद्मसं पूज्याय नमः
- ॐ केतकी कुसुमप्रियाय नमः
- ॐ सहस्रबाहवे नमः
- ॐ सहस्रशिरसे नमः
- ॐ श्रितजनप्रियाय नमः
- ॐ भक्तदुःखहराय नमः
- ॐ श्रीमते नमः
- ॐ भवसागरतारकाय नमः
- ॐ यमुनातीरसदृष्टाय नमः
- ॐ सर्वनागेंद्रवंदिताय नमः
- ॐ यमुनाराध्यपादाब्दाय नमः
- ॐ युधिष्ठिरसुपूजिताय नमः
- ॐ ध्येयाय नमः
- ॐ विष्णुपर्यंकाय नमः
- ॐ चक्षुश्रवणवल्लभाय नमः
- ॐ सर्वकामप्रदाय नमः
- ॐ सेव्याय नमः
- ॐ भीमसेनामृतप्रदाय नमः
- ॐ सुरासुरेंद्रसंपूज्याय नमः
- ॐ फणामणि विभूषिताय नमः
- ॐ सत्यमूर्तये नमः
- ॐ शुक्लतनवे नमः
- ॐ नीलवाससे नमः
- ॐ जगत् गुरवे नमः
- ॐ अव्यक्त पादाय नमः
- ॐ ब्रह्मण्याय नमः
- ॐ सुब्रह्मण्यनिवासभुवे नमः
- ॐ अनंतभोगशयनाय नमः
- ॐ दिवाकरमुनीडताय नमः
- ॐ मधुक वृक्ष संस्तानाय नमः
- ॐ दिवाकरवरप्रदाय नमः
- ॐ दक्षहस्त सदापूज्याय नमः
- ॐ शिवलिंगनिवष्टधिये नमः
- ॐ त्रिप्रतीहार संदृश्याय नमः
- ॐ मुखदापि पदांबुजाय नमः
- ॐ नृसिंह क्षेत्रनिलयाय नमः
- ॐ दुर्गासमन्विताय नमः
- ॐ मत्स्यतीर्थविहारिणे नमः
- ॐ धर्माधर्मादि रूपवते नमः
- ॐ महारोगायुधाय नमः
- ॐ वार्धितीरस्ताय नमः
- ॐ करुणानिधये नमः
- ॐ ताम्रपर्णी पार्श्ववर्तिने नमः
- ॐ धर्मपरायणाय नमः
- ॐ महाकाष्यप्रणेत्रे नमः
- ॐ नागलोकेश्वराय नमः
- ॐ स्वभुवे नमः
- ॐ रत्न सिंहासनासीनाय नमः
- ॐ स्फुरन्मकरकुंडलाय नमः
- ॐ सहस्रादित्य संकाशाय नमः
- ॐ पुराणपुरुषाय नमः
- ॐ ज्वलत् रत्नकिरीटाड्याय नमः
- ॐ सर्वाभरण भूषिताय नमः
- ॐ नागकन्याप्द्रत प्रांताय नमः
- ॐ दिक्नालकपरिपूजिताय नमः
- ॐ गंधर्वगानसंतुष्टाय नमः
- ॐ योगशास्त्र प्रवर्तकाय नमः
- ॐ देववैणिक संपूज्याय नमः
- ॐ वैकुंठाय नमः
- ॐ सर्वतोमुखाय नमः
- ॐ रत्नांगदलपद्बाहावे नमः
- ॐ बलभद्राय नमः
- ॐ प्रलंबघ्ने नमः
- ॐ कांतीकर्षणाय नमः
- ॐ भक्तवत्सलाय नमः
- ॐ रेवतीप्रियाय नमः
- ॐ निराधाराय नमः
- ॐ कपिलाय नमः
- ॐ कामपालाय नमः
- ॐ अच्युताग्रजाय नमः
- ॐ अव्यग्राय नमः
- ॐ बलदेवाय नमः
- ॐ महाबलाय नमः
- ॐ अजाय नमः
- ॐ वाताशनाधीशाय नमः
- ॐ महातेजसे नमः
- ॐ निरंजनाय नमः
- ॐ सर्वलोकप्रतापनाय नमः
- ॐ सज्यालप्रळयाग्नि मुखे नमः
- ॐ सर्वलोकैकसंमार्त्रे नमः
- ॐ सर्वेष्टार्ध प्रदायकाय नमः
|| इति श्री अनंत पद्मनाभस्वामि अशोत्तर शतनामावळि समाप्तं ||
अर्थ
श्री अनंत पद्मनाभ स्वामी अष्टोत्तर शतनामावली भगवान विष्णु के अनंत पद्मनाभ स्वरूप को समर्पित 108 पवित्र नामों का स्तोत्र है। यह नामावली भक्तों के लिए उस दिव्य स्वरूप के सभी गुणों और महिमा का स्मरण करने, ध्यान करने का एक उत्कृष्ट साधन है। केरल के तिरुवनंतपुरम में विराजमान श्री अनंत पद्मनाभ स्वामी, आदि शेष पर शयन मुद्रा में दर्शन देते हुए, सृष्टिकर्ता भगवान विष्णु का परम रूप हैं। इस नामावली का पाठ करने से भगवान के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित किया जा सकता है।
यह अष्टोत्तर शतनामावली केवल नामों का संग्रह नहीं है, बल्कि भगवान के अनंत गुणों, शक्तियों और दिव्य लीलाओं का सार है। "ॐ अनंताय नमः" पहले नाम से ही भगवान को कालातीत, देशातीत और सर्वव्यापी घोषित करता है। "पद्मनाभाय नमः" नाम बताता है कि उनकी नाभि से सृष्टि का कमल उत्पन्न हुआ, और वे ब्रह्मांड के निर्माता हैं। प्रत्येक नाम भगवान के एक अद्वितीय पहलू को उजागर करता है, जो उनकी सर्वशक्तिमत्ता, सर्वज्ञता और सर्वव्यापकता को दर्शाता है। इन नामों का निरंतर पाठ मन को शुद्ध करता है, शांति लाता है और आध्यात्मिक ज्ञानोदय के मार्ग को सुगम बनाता है।
"शेषाय नमः", "सप्तफणान्विताय नमः", "तल्पात्मकाय नमः" नाम भगवान के आदि शेष पर विश्राम करने की मुद्रा का वर्णन करते हैं, जो ब्रह्मांड की स्थिति और लय के कारण हैं। "गदाधराय नमः", "चतुर्बाहवे नमः", "शंखचक्रधराय नमः" नाम उनके दिव्य आयुधों और चार भुजाओं का वर्णन करते हैं, जो सृष्टि, स्थिति, संहार और मोक्ष के प्रतीक हैं। "कौंडिन्य व्रततोषिताय नमः" नाम कौंडिन्य ऋषि द्वारा किए गए व्रत से भगवान के प्रसन्न होकर वरदान देने की ऐतिहासिक घटना को याद दिलाता है, जो भक्ति और श्रद्धा के महत्व पर जोर देता है। "सहस्राक्षाय नमः", "सहस्रबाहवे नमः", "सहस्रशिरसे नमः" नाम भगवान के विश्वव्यापी रूप, उनकी सर्वव्यापकता और सभी जीवों में उनकी उपस्थिति को दर्शाते हैं।
इस नामावली में भगवान को "भक्तदुःखहराय नमः" (भक्तों के दुखों को हरने वाले) और "भवसागरतारकाय नमः" (संसार सागर से पार उतारने वाले) कहा गया है। यह भक्तों पर उनकी असीम करुणा और उन्हें लौकिक बंधनों से मुक्त करने की उनकी क्षमता पर जोर देता है। इन पवित्र नामों का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उत्थान और भगवान के अनंत आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। अनंत पद्मनाभ स्वामी के दिव्य नामों का स्मरण जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरता है और सभी बाधाओं को दूर करने में मदद करता है।
प्रयोजन (Benefits):
- दुःख निवारण और संरक्षण: इस नामावली का निष्ठापूर्वक पाठ करने से भक्तों के दुःख और कष्ट दूर होते हैं, और उन्हें भगवान का दिव्य संरक्षण प्राप्त होता है।
- आध्यात्मिक उत्थान और शांति: अनंत पद्मनाभ के नाम स्मरण से मन को शांति मिलती है, आध्यात्मिक प्रगति में सहायता मिलती है और भगवान के साथ गहरा संबंध स्थापित होता है।
- धन और समृद्धि: श्रीमान भगवान के नामों का पाठ करने से जीवन में धन, समृद्धि और सभी शुभ फल प्राप्त होते हैं।
- मोक्ष प्राप्ति: "भवसागरतारकाय" नाम के अनुसार, यह नामावली संसार के बंधन से मुक्ति पाने और मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाने में सहायता करती है।
- सभी मनोकामनाओं की पूर्ति: यह माना जाता है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस नामावली का पाठ करते हैं, उनकी सभी धर्मसम्मत मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री अनंत पद्मनाभ अष्टोत्तर शतनामावली क्या है?
इस नामावली का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस नामावली के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस नामावली का पाठ कौन कर सकता है?
इस नामावली का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस नामावली का उद्भव या स्रोत क्या है?
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