विकट संकष्टी चतुर्थी
विकट संकष्टी चतुर्थी क्या है
वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश के विकट रूप की पूजा होती है, इसलिए इसे विकट संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। इस दिन भक्त सूर्योदय से चंद्रोदय तक व्रत रखते हैं और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं। संकष्टी का अर्थ ही है संकट से छुड़ाने वाली।
विकट रूप का अर्थ
"विकट" का अर्थ है ऐसा रूप जिसे देखकर बुराई डर जाए। मुद्गल पुराण में गणेश जी के आठ अवतारों की कथा है, जिनमें हर अवतार मन के एक दोष को जीतता है। उसमें विकट अवतार मोर पर सवार होकर कामासुर का अंत करते हैं, यानी काम और लालसा पर विजय। इसलिए यह चतुर्थी इच्छाओं पर संयम और मन की शुद्धि के लिए खास मानी जाती है। संकटनाशन गणेश स्तोत्र के बारह नामों में भी "षष्ठं विकटमेव च" आता है।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार वैशाख कृष्ण चतुर्थी; अमांत (दक्षिण भारतीय) पंचांग में यही चैत्र कृष्ण चतुर्थी कहलाती है। व्रत उस दिन रखा जाता है जिस रात चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि हो। हनुमान जयंती वाली चैत्र पूर्णिमा के चार दिन बाद यह व्रत आता है।
कैसे मनाते हैं
- सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प; दिन भर फलाहार या निर्जल व्रत, अपनी सामर्थ्य के अनुसार।
- शाम को गणेश जी को दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या तिल-गुड़ के लड्डू चढ़ाना।
- संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा सुनना और जय गणेश देवा आरती।
- चंद्रोदय पर जल, दूध, रोली और अक्षत से चंद्र अर्घ्य, फिर प्रसाद लेकर पारण।
गर्मी के मौसम में आने से कई लोग निर्जल की बजाय फल और पानी वाला व्रत रखते हैं। हर महीने की संकष्टी की तारीखें संकष्टी चतुर्थी कैलेंडर पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विकट संकष्टी चतुर्थी किस महीने में आती है?
गणेश जी के विकट रूप का क्या महत्व है?
संकष्टी व्रत कब खोलें?
व्रत में क्या खा सकते हैं?
अगर चंद्रमा बादलों में छिप जाए तो?
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