वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी (करवा चौथ)
वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी क्या है
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी के वक्रतुंड रूप की संकष्टी होती है। उत्तर भारत में यही दिन करवा चौथ है, जब सुहागिनें पति की लंबी उम्र के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। इसलिए इस दिन एक ही चाँद को दो व्रतों का अर्घ्य मिलता है: गणेश भक्त संकष्टी के लिए और सुहागिनें करवा माता के लिए।
वक्रतुंड रूप का अर्थ
वक्रतुंड यानी मुड़ी हुई सूँड वाले। "वक्रतुण्ड महाकाय" श्लोक से हर पूजा शुरू होती है, और संकटनाशन स्तोत्र में भी पहला नाम "प्रथमं वक्रतुण्डं च" है। मुद्गल पुराण के अनुसार गणेश जी का पहला अवतार वक्रतुंड था, जो सिंह पर सवार होकर मत्सरासुर, यानी ईर्ष्या और जलन, का नाश करते हैं। मुड़ी हुई सूँड का अर्थ यह भी लिया जाता है कि सीधा रास्ता न हो तो भी वे भक्त तक पहुँचने का रास्ता निकाल लेते हैं।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग में कार्तिक कृष्ण चतुर्थी; अमांत पंचांग में यही आश्विन कृष्ण चतुर्थी है। व्रत उस दिन होता है जब चंद्रोदय के समय चतुर्थी हो। चार दिन बाद अहोई अष्टमी आती है।
कैसे मनाते हैं
- करवा चौथ रखने वाली महिलाएँ भोर में सरगी खाकर निर्जल व्रत रखती हैं; बाकी भक्त फलाहारी संकष्टी व्रत रखते हैं।
- शाम को गणेश जी, शिव-पार्वती और करवा माता की पूजा; मिट्टी के करवे में जल भरकर रखा जाता है।
- करवा चौथ व्रत कथा (वीरावती) या संकष्टी कथा सुनी जाती है।
- चंद्रोदय पर करवे से अर्घ्य; करवा चौथ वाली महिलाएँ छलनी से चाँद और फिर पति को देखकर व्रत खोलती हैं।
पूरी पूजा सामग्री करवा चौथ पूजा विधि और सामग्री में दी गई है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या करवा चौथ और संकष्टी चतुर्थी एक ही दिन होती हैं?
वक्रतुंड का क्या अर्थ है?
क्या पुरुष भी इस दिन व्रत रख सकते हैं?
करवा चौथ का व्रत कैसे खोलें?
अमांत पंचांग में यह किस महीने में है?
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