शाकम्भरी जयंती (शाकम्भरी पूर्णिमा)
शाकम्भरी पूर्णिमा क्या है
पौष पूर्णिमा को माँ शाकम्भरी की जयंती मनाई जाती है। शाकम्भरी देवी दुर्गा का वह रूप हैं जिन्होंने अकाल के समय अपने शरीर से साग, फल, कंद-मूल और अनाज प्रकट करके संसार का पेट भरा। "शाक" यानी साग-सब्ज़ी और "भरी" यानी पालने वाली, इसलिए उनका नाम शाकम्भरी पड़ा।
कथा
देवी भागवत और दुर्गा सप्तशती की परंपरा में कथा आती है कि दुर्गम नाम के असुर ने ब्रह्मा जी से वेद छीन लिए। वेद न रहने से यज्ञ रुक गए, बारिश बंद हो गई और सौ बरस का अकाल पड़ा। ऋषियों की प्रार्थना पर देवी सौ आँखों वाले रूप में प्रकट हुईं और लोगों का दुख देखकर नौ दिन तक रोती रहीं; उनके आँसुओं से नदियाँ भर गईं, इसलिए वे शताक्षी कहलाईं। फिर उन्होंने अपने हाथों से साग-फल बाँटे और शाकम्भरी नाम पाया। बाद में उन्होंने दुर्गमासुर का वध किया और दुर्गा कहलाईं।
किस तिथि को
पौष शुक्ल पूर्णिमा, उदया तिथि से। इससे पहले पौष शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक आठ दिन की शाकम्भरी नवरात्रि चलती है, जिसका समापन इसी दिन होता है। यही दिन पौष पूर्णिमा और माघ स्नान की शुरुआत का दिन भी है।
कैसे मनाते हैं
- माँ को हरी सब्ज़ियाँ, मौसमी फल, कंद-मूल और अनाज चढ़ाए जाते हैं; कई मंदिरों में सब्ज़ियों से ही देवी का श्रृंगार होता है।
- दुर्गा सप्तशती का पाठ और जय अम्बे गौरी आरती।
- गरीबों को अन्न, सब्ज़ी और फल का दान; भंडारे में साग-पूरी और हलवा।
प्रमुख स्थान
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में शिवालिक की पहाड़ियों वाला शाकम्भरी देवी मंदिर, राजस्थान में साँभर झील के पास का मंदिर और सीकर ज़िले का सकराय धाम इस दिन भक्तों से भरे रहते हैं। देवी के और रूपों के लिए नवरात्रि पृष्ठ देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शाकम्भरी जयंती कब मनाई जाती है?
माँ शाकम्भरी कौन हैं?
शाकम्भरी देवी को क्या चढ़ाएँ?
शाकम्भरी देवी के प्रमुख मंदिर कहाँ हैं?
क्या इस दिन व्रत रखते हैं?
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