कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी क्या है
आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी के कृष्णपिंगल रूप की पूजा होती है। यह बारिश के मौसम की शुरुआत में आने वाली संकष्टी है। भक्त दिन भर व्रत रखते हैं और रात को चंद्र दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं।
कृष्णपिंगल रूप का अर्थ
"कृष्ण" यानी साँवला और "पिंगल" यानी भूरा-सुनहरा। नारद पुराण के संकटनाशन गणेश स्तोत्र में गणेश जी के बारह नामों में तीसरा नाम "कृष्णपिंगाक्ष" है, यानी साँवले रूप और सुनहरी-भूरी आँखों वाले। यह रूप बताता है कि गणेश जी अँधेरे और उजाले, दोनों में साथ रहते हैं। बरसात से पहले के इस समय में लोग खेती, यात्रा और घर के कामों में आने वाली बाधाओं से रक्षा के लिए इस रूप की पूजा करते हैं।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग में आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी; अमांत पंचांग में यही ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी कहलाती है। व्रत उस दिन होता है जब चंद्रोदय के समय चतुर्थी हो। इसके कुछ दिन बाद आषाढ़ शुक्ल पक्ष में देवशयनी एकादशी से चातुर्मास शुरू होता है।
कैसे मनाते हैं
- सुबह स्नान, लाल या पीले वस्त्र पहनकर संकल्प।
- फलाहार व्रत; शाम को गणेश जी को सिंदूर, दूर्वा, जनेऊ, मोदक और केले का भोग।
- संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा और संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ, फिर जय गणेश देवा आरती।
- चंद्रोदय पर जल-दूध का अर्घ्य और पारण।
बरसात के कारण कई बार चंद्रमा दिखाई नहीं देता। ऐसे में पंचांग में दिए चंद्रोदय समय के बाद चंद्रमा की दिशा में अर्घ्य देने की परंपरा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कृष्णपिंगल संकष्टी कब होती है?
कृष्णपिंगल का क्या अर्थ है?
बादलों के कारण चाँद न दिखे तो क्या करें?
संकष्टी पर किस स्तोत्र का पाठ करें?
क्या व्रत में नमक खा सकते हैं?
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