हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी (बहुला चौथ)
हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी क्या है
भादों मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी के हेरम्ब रूप की पूजा होती है। उत्तर भारत और गुजरात में यही दिन बहुला चौथ के नाम से प्रसिद्ध है, जब माताएँ संतान की रक्षा के लिए व्रत रखकर गाय और बछड़े की पूजा करती हैं। राजस्थान-मालवा में इसे बोल चौथ भी कहते हैं। रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।
हेरम्ब रूप का अर्थ
हेरम्ब का अर्थ माना जाता है दीन-दुखियों और कमज़ोरों के रक्षक। गणेश जी के बत्तीस रूपों में हेरम्ब गणपति पाँच मुखों वाले हैं और सिंह पर सवार हैं; उनके हाथों में अभय और वरद मुद्रा है। यह रूप डर से छुटकारा और निडरता देने वाला माना जाता है, इसलिए संतान की रक्षा वाले इस व्रत से इसका मेल स्वाभाविक है।
बहुला चौथ की कथा
कथा है कि बहुला नाम की गाय जंगल में चरते हुए एक सिंह के सामने आ गई। उसने सिंह से विनती की कि घर पर उसका बछड़ा भूखा है, उसे दूध पिलाकर वह लौट आएगी। वचन निभाकर वह सचमुच लौटी, तो उसकी सच्चाई देखकर सिंह ने उसे छोड़ दिया। कई परंपराओं में यह सिंह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण बताए जाते हैं, जिन्होंने बहुला की परीक्षा ली थी। इसलिए इस दिन गाय का दूध और उससे बनी चीज़ें नहीं खाई जातीं; दूध बछड़े के हिस्से का माना जाता है।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग में भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी; अमांत पंचांग में यही श्रावण कृष्ण चतुर्थी कहलाती है। व्रत चंद्रोदय के समय चतुर्थी वाले दिन होता है। एक दिन पहले कजरी तीज और कुछ दिन बाद जन्माष्टमी आती है।
कैसे मनाते हैं
- सुबह गाय-बछड़े की पूजा, शाम को मिट्टी से बनी गाय, बछड़े और सिंह की मूर्तियों या गणेश जी की पूजा।
- जौ या चावल के सत्तू, मोदक और फल का भोग; गाय के दूध-दही से परहेज़।
- संकष्टी व्रत कथा या बहुला की कथा, फिर जय गणेश देवा।
- चंद्रोदय पर अर्घ्य और पारण।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बहुला चौथ और हेरम्ब संकष्टी क्या एक ही दिन हैं?
बहुला चौथ पर गाय का दूध क्यों नहीं पीते?
हेरम्ब गणपति कैसे दिखते हैं?
बहुला चौथ का व्रत कौन रखता है?
व्रत में क्या खाएँ?
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