अखुरथ संकष्टी चतुर्थी
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी क्या है
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी पौष महीने के कृष्ण पक्ष की चौथ है, जिस दिन गणेश जी के "अखुरथ" रूप की पूजा होती है। "आखु" यानी चूहा और "रथ" यानी सवारी — मूषक पर सवार गणपति। दिन भर व्रत रखकर रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाता है।
किस तिथि को
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह पौष कृष्ण चतुर्थी है; अमांत पंचांग (महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण) में इसी तिथि को मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी कहा जाता है — दिन एक ही है, सिर्फ़ महीने का नाम बदलता है। संकष्टी उस दिन मानी जाती है जिस रात चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि हो, इसलिए कभी-कभी व्रत तृतीया वाली तारीख़ पर भी पड़ जाता है। यह समय ज़्यादातर खरमास और कड़ाके की ठंड का होता है, तो चंद्रोदय अक्सर देर रात होता है।
पूजा कैसे करें
- सुबह स्नान करके संकल्प लें — निर्जल, फलाहार या एक बार भोजन, जैसी आपकी परंपरा हो।
- शाम को गणेश जी को दूर्वा की 21 गाँठें, लाल फूल, सिंदूर, मोदक या तिल-गुड़ के लड्डू चढ़ाएँ।
- संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा सुनें और जय गणेश जय गणेश देवा आरती करें।
- चंद्रमा निकलने पर जल में दूध, अक्षत और फूल मिलाकर अर्घ्य दें, फिर प्रसाद लेकर व्रत खोलें।
अगर यह चतुर्थी मंगलवार को पड़े तो इसे अंगारकी संकष्टी कहते हैं, जिसका फल और भी बड़ा माना गया है। हर महीने की संकष्टी की सूची और चंद्रोदय का समय संकष्टी चतुर्थी कैलेंडर पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी किस महीने में आती है?
अखुरथ नाम का क्या अर्थ है?
संकष्टी का व्रत कब खोलते हैं?
व्रत में क्या खा सकते हैं?
अगर चंद्रमा बादलों में छिप जाए तो क्या करें?
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