जितिया, जिसे जिउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहते हैं, माताएँ अपने बच्चों की लंबी उम्र और सुरक्षा के लिए रखती हैं। यह आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पड़ता है, यानी पितृ पक्ष के बीच। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह छठ के बाद सबसे कठिन व्रत माना जाता है, क्योंकि अष्टमी को पूरे दिन-रात बिना पानी के रहना होता है। तीन दिन का पूरा क्रम नीचे दिया गया है। अष्टमी और नवमी का सटीक समय हर साल बदलता है, इसलिए आज का पंचांग ज़रूर देखें।
तीन दिन: नहाय-खाय, निर्जला व्रत और पारण
| दिन | तिथि | क्या होता है |
|---|---|---|
| पहला दिन | सप्तमी | नहाय-खाय: स्नान के बाद एक बार सात्विक भोजन, रात में ओठगन की तैयारी |
| दूसरा दिन | अष्टमी | भोर से पहले ओठगन, फिर पूरा दिन और रात निर्जला व्रत; शाम को जीमूतवाहन पूजा और कथा |
| तीसरा दिन | नवमी | सूर्योदय के बाद पूजा, दान और पारण |
नहाय-खाय का तरीका कुछ-कुछ छठ पूजा जैसा ही है: नदी या घर पर स्नान, साफ़ चूल्हे पर बना भोजन, और उसके बाद मन को व्रत के लिए तैयार करना।
मड़ुआ और सतपुतिया: नहाय-खाय का खाना
सप्तमी के दिन का भोजन जितिया की पहचान है। ज़्यादातर घरों में ये चीज़ें बनती हैं:
- मड़ुआ (रागी) की रोटी घी या गुड़ के साथ
- सतपुतिया की सब्ज़ी (तोरई जैसी एक बेल वाली सब्ज़ी, जिसके गुच्छे में कई फल लगते हैं, इसलिए इसे संतान से जोड़ा जाता है)
- नोनी का साग, कहीं-कहीं कुशी केराव या झींगी
- अरवा चावल, दाल और दही
मिथिला में नहाय-खाय के दिन मछली और मड़ुआ की रोटी खाने की पुरानी परंपरा है, जबकि भोजपुर और पूर्वी यूपी के कई परिवार पूरी तरह शाकाहारी और बिना प्याज़-लहसुन का खाना बनाते हैं। दोनों अपनी-अपनी जगह मान्य हैं, अपने घर की रीत मानें।
ओठगन क्या है
ओठगन वह हल्का भोजन है जो अष्टमी की भोर में, सूर्योदय से पहले, व्रत शुरू होने से ठीक पहले किया जाता है। कुछ-कुछ करवा चौथ की सरगी जैसा। माँ, सास या घर की कोई बड़ी महिला रात में ही इसका सामान तैयार रख देती है। ओठगन में आम तौर पर दही-चूड़ा, मिठाई, फल, ठेकुआ या खीर, और पानी या शरबत लिया जाता है।
ध्यान रखें: ओठगन पेट भरकर ठूँसने का समय नहीं है। हल्का और पानी वाला खाना लें, जैसे दही, खीरा, फल, ताकि अगले 24 घंटे से ज़्यादा का निर्जल व्रत शरीर सह सके। ओठगन के बाद कुल्ला करके व्रत शुरू हो जाता है; उसके बाद पानी भी नहीं लिया जाता।
जितिया पूजा विधि
अष्टमी की शाम, सूर्यास्त के आसपास पूजा होती है। कई मोहल्लों में महिलाएँ किसी तालाब के किनारे या एक आँगन में साथ बैठकर पूजा करती हैं।
- दोपहर बाद स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें।
- आँगन या पूजा स्थान को गोबर या मिट्टी से लीपें और ज़मीन में एक छोटा गड्ढा खोदकर उसमें पानी भरें। यह छोटा पोखर (तालाब) माना जाता है।
- पोखर के किनारे कुश से बनी जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित करें।
- मिट्टी या गोबर से चील और सियारिन की छोटी आकृतियाँ बनाएँ और उन पर सिंदूर लगाएँ।
- जीमूतवाहन को जल, रोली, अक्षत, धूप, दीप, फूल, फल, ठेकुआ और मिठाई अर्पित करें।
- लाल-पीले धागे में सोने या चाँदी के जितिया (छोटे लॉकेट) पिरोकर पूजा में रखें। हर बच्चे के नाम का एक लॉकेट रखने का रिवाज़ है।
- सब मिलकर जीवित्पुत्रिका व्रत कथा सुनें: राजा जीमूतवाहन ने एक माँ के इकलौते बेटे को बचाने के लिए ख़ुद को गरुड़ के सामने भोजन बनाकर रख दिया था; साथ में चील और सियारिन की कथा भी सुनी जाती है।
- पूजा के बाद जितिया धागा गले में पहन लें। रात भर निर्जल रहें; कई महिलाएँ भजन गाकर रात बिताती हैं।
पारण
नवमी तिथि में सूर्योदय के बाद स्नान करके फिर से पूजा करें, सूर्य को जल दें और कुछ अनाज या पैसे दान करें। उसके बाद पारण होता है। पारण का खाना भी तय है: मड़ुआ की रोटी, नोनी का साग, सतपुतिया की सब्ज़ी, अरवा चावल और कुछ घरों में तोरई या कद्दू। पहले पानी या शरबत के कुछ घूँट लें, फिर धीरे-धीरे खाएँ। लंबे निर्जल व्रत के बाद एकदम भारी खाना न खाएँ।
कई बार अष्टमी तिथि लंबी होने से व्रत 30 घंटे से ज़्यादा का हो जाता है। ऐसे में पारण का समय पंडित जी या पंचांग से तय करें। जितिया धागा कई महिलाएँ अगली जितिया तक पहने रहती हैं।
नियम और सावधानियाँ
- एक बार व्रत शुरू करने पर हर साल रखने की परंपरा है। बीमारी या गर्भावस्था में घर की कोई और महिला पूजा कर सकती है या आप फलाहार से व्रत कर सकती हैं।
- व्रत के दिन घर में लहसुन-प्याज़ और मांस नहीं बनता (नहाय-खाय वाली मिथिला परंपरा अलग है)।
- मधुमेह, ब्लड प्रेशर या किसी दवा पर हैं तो निर्जल रहने से पहले डॉक्टर से बात करें।
- यह व्रत पितृ पक्ष में पड़ता है, इसलिए कई घरों में उसी समय श्राद्ध भी चल रहा होता है। श्राद्ध के नियम पितृ पक्ष श्राद्ध विधि में देखें।
बिहार, झारखंड और पूर्वी यूपी में जितिया
मिथिला (दरभंगा, मधुबनी, सहरसा) में नहाय-खाय पर मछली-मड़ुआ की रीत है और पूजा में चील-सियारिन को चूड़ा-दही चढ़ाने का चलन है। भोजपुर, बक्सर, आरा और बलिया-गाज़ीपुर की तरफ़ नोनी साग और सतपुतिया के बिना जितिया अधूरा माना जाता है। झारखंड में आदिवासी और गैर-आदिवासी दोनों समाज इसे मनाते हैं और कई जगह सामूहिक रूप से तालाब किनारे पूजा होती है। नेपाल के तराई क्षेत्र में भी यह व्रत उतने ही उत्साह से रखा जाता है। व्रत से जुड़े कुछ नियम अमावस्या जैसे दिनों से भी मिलते-जुलते हैं, जिनके बारे में अमावस्या के नियम लेख में पढ़ सकते हैं।

